धरती आबा के सपनों का झारखंड… उम्मीदें हुई जवां, विकास के नई उड़ान की तैयारी .

लंबे संघर्ष के बाद नवगठित भगवान बिरसा मुंडा के सपनों का झारखंड अपने स्थापना काल के 19 वर्ष पूरे कर चुका है। इस दौरान राज्य ने कई उतार-चढ़ाव देखे। इस बीच विभिन्न सरकारों ने विकास की नई गाथाएं भी लिखी। लेकिन अभी भी कई चुनौतियां सामने हैं। आशा जताई जा रही है कि आने वाले चुनावी महासंग्राम के पश्चात गठित होने वाली नई सरकार झारखंडवासियों के सपने को नया पंख लगाएगी। विकास की नई उड़ान भरेगी। झारखंड आंदोलन के इतिहास पर गौर करें तो पता चलता है कि वर्ष 1930 में आदिवासी महासभा ने अलग झारखंड राज्य का सपना देखा था। कालांतर में क्षेत्र की स्थानीय जनता के लंबे संघर्ष और इंतजार के बाद बिहार के दक्षिणी भाग को विभाजित कर वर्ष 2000 में आदिवासी नायक और सर्वमान्य जननेता भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर झारखंड नवोदित राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। वनाच्छादित क्षेत्र और खनिज संपदा झारखंड राज्य की एक विशिष्ट पहचान है। लेकिन कमोबेश यही खनिज संपदा ही झारखंड के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में भी बन गई। यह सर्वविदित है कि नवोदित राज्य झारखंड अस्तित्व में आने के साथ ही राजनीतिक अस्थिरता के भंवर जाल में फंस गया। यहां भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया। खासकर खनिज और वन संपदा के क्षेत्र में जमकर घोटाला भी हुआ। इसके अतिरिक्त उग्रवाद,नक्सलवाद, गरीबी,पिछड़ापन, विस्थापन-पलायन, प्रशासनिक विफलता आदि समस्याओं से राज्य जूझता रहा। नतीजतन यहां विकास को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी। इस वजह से झारखंड अपने समकालीन राज्यों उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ से भी विकास के मायने में पिछड़ गया। हालांकि कई अवसरों पर सरकारी प्रयासों से विकास योजनाओं की गति तेज करने की कोशिशें भी की जाती रही, लेकिन इसका ठोस सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ सका। अलबत्ता शिक्षा के क्षेत्र में कुछ काम जरूर हुए। नए विश्वविद्यालयों और मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की गई। उच्च शिक्षा से लेकर माध्यमिक और प्राथमिक स्कूलों के स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति भी की गई। वहीं, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कुछ उपलब्धियां हुई हैं। स्वास्थ्य केंद्रों को आधुनिक सुविधा युक्त किया गया है। शिशु और मातृ मृत्यु दर में आशातीत सुधार भी हुआ है। स्वास्थ्य के विभिन्न सूचकांकों में झारखंड ने उन्नति की सीढ़ियां चढ़ी हैं। स्वच्छता के पैमाने पर भी झारखंड राज्य आगे बढ़ा है। सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य व्यवस्था में एक हद तक सुधार हुआ है। पूर्व की तुलना में अब मरीजों को कई सुविधाएं सरकारी अस्पतालों में मिलने लगे हैं। इसके बाद भी कुछ बिंदुओं पर सरकार और विभाग को और भी सुधार करने की आवश्यकता है। नक्सलवाद की समस्या से जूझते राज्य में नक्सली गतिविधियां कम हुई है। नक्सलियों का तिलिस्म काफी हद तक टूटा है और राष्ट्रवाद की बयार सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में भी बहने लगी है। विकास योजनाओं के मूर्त रूप लेने से ग्रामीणों के आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई है। नक्सल प्रभावित इलाकों में अब लोकतंत्र के तराने गूंजने लगे हैं। यद्यपि साक्षरता, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की गरीबी के राष्ट्रीय स्तर से झारखंड अभी भी काफी पीछे चल रहा है। हालांकि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर के मामले में झारखंड का प्रदर्शन पूर्व की अपेक्षा बेहतर हो रहा है। अभी भी राज्य के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां मुंह बाए खड़ी है, जिसका ठोस समाधान किया जाना राज्य के सर्वांगीण विकास की गति तेज करने में काफी सहायक साबित होगा।

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