राजनेताओं की दलीय निष्ठा ताक पर . संदर्भ : झारखंड में पाला बदल का खेल.

रांची। झारखंड विधानसभा चुनाव के मद्देनजर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच चल रहे शह और मात के खेल में मोहरे बहुत ही सधे अंदाज में चले जा रहे हैं। यूपीए और एनडीए दोनों ही फोल्डर में शामिल राजनीतिक दलों ने ऐसी रणनीति अख्तियार कर ली है कि राहें जुदा-जुदा होने की स्थिति में तत्काल उस पर अमल किया जा सके। एक तरफ यूपीए के प्रमुख घटक दल झामुमो, कांग्रेस व राजद ने झाविमो से अलग रहकर चुनावी जंग में कूदने का ऐलान कर दिया है, वहीं, दूसरी तरफ भाजपा के प्रमुख सहयोगी दल आजसू और लोजपा ने गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर भाजपा की परेशानियां बढ़ा दी हैं। एनडीए के गठबंधन में गांठ अभी भी बरकरार है। अपनी पसंद की सीटों को लेकर आजसू पार्टी अभी अपने स्टैंड पर कायम है। वहीं, लोजपा ने भी प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी कर भाजपा पर दबाव बढ़ा दिया है। पार्टी सुप्रीमो चिराग पासवान ने पूर्व में ही घोषणा कर दी है कि झारखंड में 50 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे। वर्तमान में झारखंड की सियासत का सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा और आजसू का गठबंधन रहेगा या नहीं। सियासी बिसात पर दोनों दल एक दूसरे से आगे रहना चाहते हैं। सहयोगी दल के दावे वाली सीट पर प्रत्याशी उतारना, उनके नेताओं को अपने दल में शामिल कराने की कवायद जारी है। जैसे-जैसे झारखंड विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सियासी पाला बदल का खेल भी गति पकड़ रहा है। चुनाव के प्रथम चरण में नामांकन की प्रक्रिया पूरी हो गई है। लेकिन अभी तक भाजपा के चुनावी गठबंधन पर छाया धुंध छंट नहीं रहा है। एनडीए के हर बंधन में गांठें ही नजर आ रही है। वर्तमान राजनीतिक हालात देखते हुए यह कहा जा सकता है कि स्वहित साधने में नेताओं की अपने दलों के प्रति निष्ठा समाप्त होने लगी है। कमोबेश यह स्थिति सभी प्रमुख दलों में है। सियासी प्रयोगशाला की पहचान बन चुके झारखंड में इस विधानसभा चुनाव को लेकर नित हो रहे नए सियासी प्रयोग से तरह-तरह की आशंकाओं को भी बल मिल रहा है। इससे राजनीतिक दलों की साख भी प्रभावित हो रही है और आम जनता का भला भी होता नहीं दिख रहा। यही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक फलक पर सूबे की प्रतिकूल सियासी छवि उजागर हो रही है। राजनीतिक दलों के लिए नीति-सिद्धांत, आचार-विचार आदि की बातें लिए बेमानी साबित होने लगी है। राजनेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा हावी हो रही है। सियासी दलों के पाला बदलने के खेल से मतदाताओं में भी गलत संदेश जा रहा है। ऐसे में जनता-जनार्दन की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। जनता को राज्य के विकास की जगह स्वहित को महत्त्व देने वाली सियासी ताकतों के मंसूबे को ध्वस्त करने की दिशा में आगे आने की आवश्यकता है। तभी इस सियासी पाला बदल के खेल पर विराम लग सकता है। यह जगजाहिर है कि बेमेल गठजोड़ की विसंगति से झारखंड की जनता का भला नहीं होने वाला है। नेताओं की कथनी और करनी में अंतर को पहचान कर मतदान करने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता सर्वोपरि होती है। मतदाताओं को जागरूक होकर मतदान करना होगा। यह काम तभी संभव हो सकता है, जब हर मतदाता वोट डालने के लिए खुद को संकल्पित करें।

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