सरोजनी नायडू का संपूर्ण जीवन भारतीय राजनीति को समर्पित रहा था

(13 फरवरी, महान स्वाधीनता वीरांगना सरोजनी नायडू की 147 वीं जयंती पर विशेष) 

सरोजनी नायडू का संपूर्ण जीवन भारतीय राजनीति को समर्पित रहा था

 राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के परम शिष्यों में एक सरोजिनी नायडू का संपूर्ण जीवन भारत की राजनीति को समर्पित रहा था। वह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में एक वीरांगना के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थीं। महात्मा गॉंधी की तरह उन्होंने भी राजनीति को जन सेवा का आधार माना था। वह आजीवन राजनीति के माध्यम से जन सेवा को ओर ही  उन्मुख रहीं थी। सरोजिनी नायडू न सिर्फ एक राजनीतिज्ञ बल्कि वह विविध भाषाओं की जानकार भी थीं। वह हिन्दी,अंग्रेजी, बांग्ला, गुजराती सहित कई अन्य भाषाओं में धारा प्रवाह अपनी बातों को मंचों से रखा करती थीं। जिस काल खंड में उनका भारत की राजनीति में आगमन हुआ था, महिलाओं पर सामाजिक तौर पर कई पाबंदियां थीं। उस कालखंड में महिलाओं का घर से निकलने पर कई किस्म की पाबंदियां थीं। महिलाएं पर्दा कर निकला करती थीं। इस विषम परिस्थिति में भी उन्होंने विदेश में जाकर उच्च शिक्षा हासिल की थीं। उन्हें महिलाओं की नेत्री होने का गौरव भी प्राप्त हुआ । वह एक लोकप्रिय कवयित्री के रूप में राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाने में सफल रही थीं। आज भी उनकी कविताएं भारत सहित कई देशों  में बहुत ही चाव से पढ़ी जाती हैं। 
   उनका भारतीय राजनीति में आना एक संयोग था। 1914 में वह पहली बार इंग्लैंड में गांधी जी से मिलीं थीं । वहीं उनके विचारों से प्रभावित होकर वह भारतीय राजनीति में प्रवेश की थीं। वह एक संकल्प के साथ स्वाधीनता आंदोलन में आई  थी। उनका संकल्प था कि जब तक देश ब्रिटिश हुकूमत से मुक्त नहीं हो जाता है, तब तक चैन से नहीं बैठूँगी। ब्रिटिश हुकूमत से लड़ते हुए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा था। वह जेल जाने से बिल्कुल घबराई  ही नहीं बल्कि खुद को और मजबूत कर पूरी शक्ति के साथ आंदोलन में जुट  गई थी। देश की आजादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रथम राज्यपाल होने का गौरव प्राप्त हुआ था। उन्होंने न सिर्फ राजनीति बल्कि देश की आजादी में भी अहम भूमिका निभाई थी। सावित्रीबाई फुले के बाद सरोजिनी नायडू देश की ऐसी दूसरी भारतीय महिला रहीं, जो महिलाओं की शिक्षा पर जोर दी थीं। एक समाज सुधारक के रूप में भी उन्होंने समाज से रूढ़िवादिता और अंधविश्वास को जड़ से उखाड़ फेंकने में महती भूमिका का अदा की थीं। उन्होंने नारी शिक्षा पर बहुत ही जोर दिया था। साथ ही उन्होंने कम उम्र में लड़कियों की शादी कर दिए  जाने जैसी प्रथा  विरोध किया था। वह चाहती थी कि भारतीय समाज में  लड़कों की तरह  लड़कियों की शिक्षा की व्यवस्था हो। 
  वीरांगना सरोजिनी नायडू  जन्म  13 फरवरी 1879 को हैदराबाद नगर में हुआ था। वह इस धरा पर सत्तर वर्षों तक  रही थी।  2 मार्च 1949 में उनका निधन हुआ था। उनकी विलक्षण प्रतिभा के चलते ही देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें  स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल ( उत्तर प्रदेश)  बनने का अवसर प्रदान किया था। सरोजिनी नायडू के पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक नामी विद्वान व शिक्षाविद थे। उनकी ख्याति देश भर में फैली हुई थी । वहीं दूसरी ओर उनकी मां बांग्ला की एक लोकप्रिय कवयित्री थीं । वह बचपन से ही कुशाग्र-बुद्धि की थी। उन्होंने बारह वर्ष की अल्पायु में ही बारहवीं  की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली थी। वह तेरह वर्ष की आयु में 'लेडी ऑफ दी लेक' नामक कविता रच डाली थी। सर्जरी में क्लोरोफॉर्म की प्रभावकारिता साबित करने के लिए हैदराबाद के निज़ाम द्वारा प्रदान किए गए दान से सरोजिनी नायडू को इंग्लैंड भेजा गया था । उन्हें पहले लंदन के किंग्स कॉलेज और बाद में कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज में अध्ययन करने का मौका मिला था। 
    1895 में वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड गईं थीं। वह पढ़ाई के साथ-साथ कविताएँ भी लिखती रहीं। गोल्डन थ्रैशोल्ड उनका पहला कविता संग्रह था। उनके दूसरे तथा तीसरे कविता संग्रह बर्ड ऑफ टाइम तथा ब्रोकन विंग ने उन्हें एक सुप्रसिद्ध कवयित्री बना दिया। 1898 में सरोजिनी नायडू का विवाह डॉ.गोविंदराजुलू नायडू से हुआ था। वह ऐसे जीवन साथी पाकर धन्य हो गई थी। उनका वैवाहिक जीवन बहुत ही सफल रहा था । उनके पति उन्हें हर कदम पर सहयोग करते रहे थे। 
  1914 में वह इंग्लैंड में  पहली बार गाँधीजी से मिलीं थी। वह गांधीजी के विचारों से काफी प्रभावित हुई थी। इसके बाद उन्होंने शेष जीवन को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वाधीनता आंदोलन के संघर्ष को समर्पित कर दिया था । उन्होंने एक कुशल सेनापति की भांति हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय हर दिया था। सत्याग्रह हो या संगठन की बात, हर मोर्चा पर नेतृत्व प्रदान कर रही थीं। । उन्होंने अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया और जेल भी गयीं थीं। संकटों से न घबराते हुए वह  एक धीर - वीर  वीरांगना की भाँति गाँव-गाँव घूमकर  देश-प्रेम का अलख जगाती रहीं और देशवासियों को उनके कर्तव्य की याद दिलाती रहीं थी। उनके वक्तव्य जनता के हृदय को झकझोर देते थे । वह देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर एक प्रेरक पूंज बन गयी थी। वह बहुभाषाविद थी। इसलिए क्षेत्रानुसार अपना भाषण अंग्रेजी, हिंदी, बंगला, गुजराती  सहित अन्य भाषाओं में दिया करती थीं।  उनके भाषणों का देशवासियों पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता था। उनकी जनसभाओं में काफी संख्या में लोग जूटा  करते थे। एक बार उन्होंने लंदन की एक महती सभा में अंग्रेजी में बोलकर  वहाँ उपस्थित सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
 उनकी देश भर में  बढ़ती  लोकप्रियता और प्रतिभा के कारण  1925  में कानपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्षता करने सुअवसर प्राप्त हुआ था। 1932 वह  में भारत की प्रतिनिधि बनकर दक्षिण अफ्रीका भी गईं थीं । श्रीमती एनी बेसेन्ट की प्रिय मित्र और गाँधीजी की इस प्रिय शिष्या ने अपना सारा जीवन देश के लिए अर्पण कर दिया था। जब वह कानपुर के अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर रही थीं, इसकी खबर उस  कालखंड के देश -विदेश के  तमाम बड़े खराब अखबारों में प्रकाशित हुई थी। सरोजिनी नायडू अब सिर्फ देश की ही महिला नेत्री नहीं  बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें काफी ख्याति मिली थी। 
 लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली थी। लेकिन आजादी दो टुकड़ों में बंटी हुई थी। महात्मा गांधी की तरह सरोजिनी नायडू भी नहीं चाहती थी कि देश के दो टुकड़े हों। लेकिन मुस्लिम लीग के  नेताओं की हठ धर्मिता के कारण देश दो टुकड़ों में बंट चुका था ।  संभवत : ब्रिटिश हुकूमत यही चाहती थी। वह इस कूटनीति में सफल रही थी। स्वाधीनता की प्राप्ति के बाद, देश को उस लक्ष्य तक पहुंचाने वाले नेताओं के सामने अब दूसरा ही कार्य था। आज तक उन्होंने संघर्ष किया था। किन्तु अब राष्ट्र निर्माण का उत्तरदायित्व उनके कंधों पर आ गया था। कुछ नेताओं को सरकारी तंत्र और प्रशासन में नौकरी दे दी गई थी। उनमें सरोजिनी नायडू भी एक थीं। उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया। वह विस्तार और जनसंख्या की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा प्रांत था। उस पद को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि 'मैं अपने को 'क़ैद कर दिये गये जंगल के पक्षी' की तरह अनुभव कर रही हूँ।' लेकिन वह प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की इच्छा को टाल न सकीं थी, जिनके प्रति उनके मन में गहन प्रेम व स्नेह था। इसलिए वह लखनऊ में जाकर बस गईं और वहां सौजन्य और गौरवपूर्ण व्यवहार के द्वारा अपने राजनीतिक कर्तव्यों को निभाया। एक राज्यपाल के रूप में उनके समक्ष विचारार्थ   संचिकाएँ आईं, उन्होंने उन तमाम संचिकाओं को ध्यान से पढ़ा और अपनी राय दी थी। वह एक कर्तव्य निष्ठ स्वाधीनता सेनानी के साथ कुशल प्रशासिका  भी सिद्ध हुई थी।