स्वाधीनता आंदोलन के प्रथम उदघोषक तिलका मांझी की अमर गाथा
देशवासियों को तिलका मांझी के गौरवशाली इतिहास से जरूर परिचित होना चाहिए। साथ ही नई पीढ़ी को तिलका मांझी की शहादत से भी परिचित कराना चाहिए।
महान स्वाधीनता सेनानी तिलका मांझी का संपूर्ण जीवन ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत में बीता था। उन्होंने मात्र पैंतीस वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। तिलका मांझी ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ तब बगावत की शुरुआत की थी, जब अंग्रेजी हुकूमत भारत वर्ष अपना में पैर पूरी तरह से स्थापित भी नहीं कर पाई थी। तिलका मांझी ने देश की आजादी से लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व बगावत का ऐलान किया था । सच कहा जाए तो स्वाधीनता आंदोलन के प्रथम उधोषक तिलका मांझी थे। लेकिन एक साजिश के तहत तिलका मांझी के इस संघर्ष की कहानी को इतिहास के पन्नों में ढक दिया गया था। उन्होंने जिस बहादुरी और साहस के साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत की थी, अंग्रेजों ने तभी यह स्वीकार कर लिया था कि भारत में शासन करने के लिए बगावत के स्वर को बहुत ही सख्ती के साथ कुचलना होगा। आगे चलकर अंग्रेजों ने हुकूमत के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को बहुत ही सख्ती के साथ कुचलना शुरू कर दिया था । इसी रणनीति पर चलकर अंग्रेज लंबे समय तक भारतवर्ष में शासन कर पाए थे।
ध्यातव्य है कि धोखे और छल के बल पर अंग्रेजी हुकूमत ने भारत का शासन प्रचालन अपने हाथों में ले लिया था। जिसकी बहुत बड़ी कीमत देशवासियों को चुकानी पड़ी थी। बदले में लंबे समय तक भारत वर्ष को अंग्रेजों की दासता झेलना पड़ा था। लंबे संघर्ष और हजारों कुर्बानियों के बाद देश को आजादी मिली थी। छोटे-छोटे रियासतों में बंटा भारत बाहरी तौर पर बहुत मजबूत दिखता था, लेकिन आंतरिक तौर पर कई रियासतों में बंटे रहने के कारण अंग्रेजों को यहां का शासन अपने हाथों में लेने में बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ी थी। हमारे आंतरिक फूट ने उनके हाथों में सत्ता की बागडोर सौंप दी थी। मुट्ठी भर अंग्रेजों ने हमारे ही रियासतों के राजाओं, जमीनदारों और सिपाहियों के बल पर भारतवर्ष में शासन किया था। यह अपने आप में एक विचित्र स्थिति थी । हमारे ही रियासत के राजा और जमींदार अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर अपने ही देश वासियों पर जुल्म ढा रहे थे। एक ओर धीरे धीरे कर देशवासी गरीब और कमजोर होते चले जा रहे थे । वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी हुकूमत मालामाल होती चली जा रही थी।
देशवासियों को तिलका मांझी के गौरवशाली इतिहास से जरूर परिचित होना चाहिए। साथ ही नई पीढ़ी को तिलका मांझी की शहादत से भी परिचित कराना चाहिए। उनका जन्म 11 फ़रवरी 1750 को संथाल में हुआ था। वे मात्र पैंतीस वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष करते हुए 13 जनवरी 1785 को शहीद हुए थे। तिलका मांझी उर्फ जबरा पहाड़िया उन्होंने सबसे पहले राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लिया था। वे भारत में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाले माल पहाड़ियां के वीर आदिवासी थे। 1771 से 1784 तक उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबी और कभी न समर्पण करने वाली लड़ाई लड़ी और स्थानीय महाजनों-सामंतों व अंग्रेजी शासक की नींद उड़ाए रखा था । पहाड़िया लड़ाकों में सरदार रमना अहाड़ी और अमड़ापाड़ा प्रखंड,पाकुड़, संताल परगना के आमगाछी पहाड़ निवासी करिया पुजहर और सिंगारसी पहाड़ निवासी जबरा पहाड़िया भारत के आदिविद्रोही थे। ऐसे दुनिया का पहला आदिविद्रोही रोम के पुरखा आदिवासी लड़ाका स्पार्टाकस को माना जाता है। भारत के औपनिवेशिक युद्धों के इतिहास में जबकि पहला आदिविद्रोही होने का श्रेय पहाड़िया आदिम आदिवासी समुदाय के लड़ाकों को जाता हैं, जिन्होंने राजमहल, झारखंड की पहाड़ियों पर ब्रितानी हुकूमत से लोहा लिया। इन पहाड़िया लड़ाकों में सबसे लोकप्रिय आदिविद्रोही जबरा या जौराह पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी थे। लेकिन इनके गौरवशाली इतिहास को एक साजिश के तहत छुपाने का काम किया गया ।
1778 में तिलका मांझी ने पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों को खदेड़ कर कैंप को मुक्त कराया। 1784 में जबरा ने क्लीवलैंड को मार डाला। बाद में आयरकुट के नेतृत्व में जबरा की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ था, जिसमें कई लड़ाके मारे गए और जबरा को गिरफ्तार कर लिया गया। लोगों कथन हैं कि उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया था। पर मीलों घसीटे जाने के बावजूद वह पहाड़िया लड़ाका जीवित था। खून में डूबी उसकी देह तब भी गुस्सैल थी । उसकी लाल-लाल आंखें ब्रितानी राज को डरा रही थी। भय से कांपते हुए अंग्रेजों ने तब भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष पर सरेआम लटका कर उनकी जान ले ली थी । अंग्रेजी हुकूमत ने 13 जनवरी, 1785 को हजारों की भीड़ के सामने तिलका मांझी को फांसी पर झूला दिया था। गए। बाद के कालखंड में आजादी के हजारों युवा स्वाधीनता सेनानियों ने तिलका मांझी का अनुसरण कर फांसी पर चढ़ते चले गए थे।
पहाड़िया समुदाय का यह गुरिल्ला लड़ाका एक ऐसी किंवदंती है,जिसके बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज सिर्फ नाम भर का उल्लेख करते हैं, पूरा विवरण नहीं देते। लेकिन पहाड़िया समुदाय के पुरखा गीतों और कहानियों में इसकी छापामार जीवनी और कहानियां सदियों बाद भी उसके आदि विद्रोही होने का अकाट्य दावा पेश करती है। यहाँ यह लिखना जरूरी हो जाता है कि तिलका मांझी संताल व पहाड़िया थे ? इसे लेकर विवाद है। इस संबंध में कोई लिखित दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण दोनों ही मान्य है । आम तौर पर तिलका मांझी को मुर्मू टोटेल का बताते हुए अनेक लेखकों ने उन्हें संताल आदिवासी बताया है। तिलका मांझी के पिता का नाम सुंदरा मुर्मू और माता का नाम पानो मुर्मू थे। सुंदरा मुर्मू तिलकपुर गांव के ग्राम प्रधान आतु मांझी थे। तिलका मुर्मू के माता पानो मुर्मू गृहणी थी। उनके पिता और माता के नाम से साफ पता चलता है कि तिलका मांझी संथाल परिवार में जन्मे एक संथाल आदिवासी समुदाय के थे। झारखंड सरकार को चाहिए कि तिलका मांझी के गौरवशाली इतिहास का गहराई से इतिहासकारों से शोध करवाएं और प्रमाणिकश इतिहास का मार्ग प्रशस्त हो सके।
खोज यह बताता है कि बिहार के सुल्तानगंज, भागलपुर क्षेत्र में पहाड़िया जनजाति के लोगों का भी निवास थे, तिलका मांझी संथाल और उन पहाड़िया जनजाति के बीच में रहकर पले बढ़े थे। इसीलिए ही कुछ गैर आदिवासी इतिहासकारों को लगता है तिलका मांझी पहाड़िया जनजाति के थे । संतालों का लिखित इतिहास अधिक नहीं है। लेकिन फिर भी संतालों को याद है कि अपना गुजारा हुआ इतिहास कितना पुराना था ? तिलका मांझी संतालों के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने में कभी पीछे नहीं हटे थे। संताल एवं आदिवासी समुदाय में इतिहासकारों की कमी होने के कारण दूसरे जाति समुदाय के इतिहासकारों द्वारा इस संथाल समुदाय के इतिहास को तोड़ मरोड़ा जा रहा है। इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया जा रहा है। यह बेहद चिंता की बात है। इसलिए ही तिलका मांझी को पहाड़िया जनजाति के साथ कुछ इतिहासकारों द्वारा जोड़ा जा रहा है, जो गलत जानकारी है। मांझी और मुर्मू सरनेम संतालों का है और तिलका, पानो और सुंदरा नाम भी अभी भी संतालों के बीच मौजूद हैं। तिलका मांझी का असली नाम तिलका मुर्मू है । जबरा पहाड़िया नहीं। तिलका मांझी संतालो के बीच काफी लोकप्रिय हैं, और उनका पुजा भी किया जाता है, लेकिन पहाड़िया जनजाति के लोग तिलका मांझी का पुजा पाठ या कोई अन्य उनके नाम पर समारोह आयोजित नहीं देखने को मिलता है। संथालों के अनेकों लोक गीतों में उनका नाम है। और रही बात इतिहास की तो भारत देश मे सदैव उच्च जाति और पैसे वालों के आगे झुकता रहा है। शुरू में संतालों का स्थाई निवास स्थान नहीं था, स्थाई नहीं होने का कारण संतालों को दूसरे जाति समुदाय के लोगों द्वारा अनेकों स्थानों से भागाया जाता रहा है।
