जीवन में उल्लास भरती  'होली'

(14- 15 मार्च, 'होली' पर्व पर विशेष)

जीवन में उल्लास भरती  'होली'

होली पर्व का नाम जेहन में आते ही एक सुंदर सी मुस्कान चेहरे पर उभर आती है और मन - मस्तिष्क में खुशियां छा जाती हैं । भारत विविध संस्कृति वाला देश है। हमारे देश में ऐसे कितने पर्व  हैं, जो बड़े ही धूमधाम के साथ मनाएं जाते हैं,लेकिन होली की बात ही कुछ निराली  है। होली मनुष्य के जीवन में उल्लास भर देती। होली मस्ती और  आनंद से  भरा एक त्यौहार  है। इस  पर्व में रंगों का बहुत ही महत्व है।  लोग एक दूसरे को रंग लगाकर  आनंदित होते हैं। एक दूसरे के साथ हंसी-मजाक और  ठिठोली करते हैं। इसके साथ ही एक दूसरे से बड़े आदर के साथ गले मिलते हैं। छोटे, बड़े का पैर छूकर आशीर्वाद भी लेते हैं। पति - पत्नी एक दूसरे को रंग लगाकर स्वर्ग के समान आनंद का अनुभव करते हैं। पिता अपने पुत्र के माथे पर अबीर लगा कर लंबी उम्र का आशीर्वाद देते हैं। बहुएं अपनी सास के पैर पर अबीर लगाकर सदा सुहागिन होने का आशीर्वाद प्राप्त करती है।

  होली पर्व घर के माहौल को बिल्कुल ही खुशनुमा बना देता है। जीवन में चाहे कितनी परेशानियां  क्यों न हो ? होली उन तमाम परेशानियों को कम से कम एक-दो - दिनों के लिए पीछे कर देती है।  होली  मतलब है, एक आनंद का पर्व ।  होली एक दूसरे से मिलने का अवसर प्रदान करती है।  हममें से कुछ लोग  रोजी - रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों में चले जाते हैं। कुछ लोग तो विदेश भी चले जाते हैं । लेकिन सबकी तमन्ना होती है कि होली में अपने गांव - घर की ओर लौटें। इनमें कई लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। लेकिन कई लोग अपने गांव - घर नहीं लौट पाते हैं । जो होली पर्व पर घर लौट पाते हैं। अपनों से मिलकर होली खेलते हैं । वे साथ मिलकर खाते हैं। अपनों को गुलाल लगाते हैं। उनके इस आनंद की अनुभूति को शब्दों में  बयान नहीं किया जा सकता है । होली पर्व अपने - पराये का भेद मिटा देती है । आप खुद से अनुभव कर सकते हैं , जब होली पर आपके कोई रिश्तेदार पिछले कई वर्षों से साथ नहीं होली मना पाए हैं। अगर होली में वे, आपके साथ होते हैं, तब दोनों जन  कितना आनंदित  होते हैं।
   होली पर्व के संबंध में कई तरह की बातें प्रचलित है।यह पर्व संपूर्ण भारत में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। विदेशों में भी जहां भारतीय मूल के लोग जहां जहां बसे हैं, वे सभी बड़े ही धूमधाम के साथ होली पर मनाते हैं । होली पर्व की शुरुआत भारतवर्ष में कब से शुरू हुई ? कहना बड़ा मुश्किल है । यह एक शोध का विषय है। होली पर्व से जुड़ी कई किस्से - कहानियां भगवान कृष्ण - माता राधा से प्रचलित है । राधा - कृष्ण की होली विश्व भर में प्रसिद्ध है।   द्वापर युग में राधा - कृष्ण की होली से जुड़े गीत आज भी मथुरा वृंदावन सहित देश के विभिन्न राज्यों में गाए जाते हैं।  राधा - कृष्ण की होली आज भी लोगों के बीच मशहूर है। राधा - कृष्ण एक दूसरे को गुलाल लगाते थे। एक दूसरे के साथ अठखेलियां करते थे। राधा - कृष्ण के साथ पूरे मथुरा वृंदावन के लोग  एक रंग में रंग जाया करते थे । यह मथुरा वृंदावन के निवासियों का राधा कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम का रंग था । आज भी मथुरा वृंदावन की होली सबसे नामी होली है । फूल से बने रंगों से होली खेलने की परंपरा यहीं से शुरू हुई  थी । आज भी मथुरा में लोग फूलों की होली खेलते नजर आते हैं । मथुरा में काफी संख्या में विदेशी पर्यटक भी आकर मथुरा की होली शामिल होते हैं और संग - संग होली खेलते हैं। देश में मुंबई महानगरी की होली भी बहुत मशहूर है। फिल्म इंडस्ट्री के नायक - नायिकाएं और अन्य कलाकार एक जगह जमा होकर शानदार तरीके से होली खेलते नजर आते हैं । इस तरह देश के विभिन्न प्रदेशों में होली बनाने का रिवाज है। होली मनाने के तरीके अलग-अलग होते जरूर हैं, लेकिन सब में एक दूसरे को रंग लगाने की परंपरा होती है।
    त्रेता युग में भी होली खेलने की परंपरा रही थी। अर्थात भारत में होली खेलने की परंपरा हजारों साल पुरानी है , जो आज भी अनवरत जारी है।  होली के एक दिन पूर्व अगजा जलाने की परंपरा हमारे देश में प्रचलितत है । लोग चौक - चौराहे पर लकड़िया एक जगह एकत्रित  करते हैं । स्त्रियां उसमें गोबर से बने ऊपले को रखती हैं।  संध्या में घर में बने पकवान को एकत्रित लकड़ियों पर चढ़ाते हैं । लकड़ियों के बीच होलीका की प्रतिमा को  रखते हैं।  होलिका के गोद पर भक्त प्रल्हाद लेटे हुए रहते हैं । एकत्रित लकड़ियों की विधि विधान से पूजा की जाती है।  तत्पश्चात होलीका दहन किया जाता है। होलिका दहन से पूर्व भक्त प्रल्हाद की प्रतिमा को हटा दी जाती है। इस पूजा विधान के प्रति लोगों की यह आस्था है कि होलिका असत्य के प्रतीक है। भक्त प्रल्हाद सत्य के प्रतीक है। इसलिए असत्य की प्रतीक होलीका अग्नि में जल कर समाप्त हो जाती है।  सत्य के प्रतीक भक्त प्रल्हाद भगवान श्री के चरणों में समर्पित हो जाते हैं। लोगों की यह भी कामना होती है कि बीता वर्ष अच्छा या खराब जैसा रहा ,बीत गया । अब उसे याद करने की जरूरत नहीं।  आने वाला कल मंगलमय हो ।
     अगजा से निकलती अग्नि को लोग बड़े ही श्रद्धा के साथ प्रणाम करते हैं।  लोग यह कामना करते हैं कि सबके घर में सुख, समृद्धि और शांति की स्थापना हो ।  लोग प्रज्वलित अग्नि से थोड़ा अग्नि अपने घर ले जाकर चूल्हा में स्थापित करते हैं।  इस प्रथा के पीछे लोगों में यह  आस्था है कि इस अग्नि से बने भोजन खाकर घर के सभी लोग रोग मुक्त हों और स्वस्थ रहें।  शहर और गांवों में आज भी यह परंपरा है।  अगजा में लोग ऋतु के नए फल भी  समर्पित करते हैं । इस समय तक चना और गेहूं की कटाई हो जाती  है । इसलिए अधिकांश लोग गेहूं और चना अगजा में समर्पित करते हैं । लोग रात भर अगजा के समीप जागकर गीत - भजन गाते नाचते नजर आते हैं।
      होली पर्व हम सबों को सांप्रदायिक सौहार्द्र की भी सीख देता नजर आता है । लोग होली पर्व पर जात - पात, छोटे - बड़े के भेद को भूलकर एक दूसरे के घरों में जाते हैं। भारत जैसे विशाल देश में जहां विभिन्न धर्म, पंथ, विचार के लोग रहते हैं । यहां होली पर्व की प्रासंगिकता बहुत ही बढ़ जाती है । होली पर्व पर कई जगहों पर होली मिलन समारोह का आयोजन किया जाता है । ऐसे देखा जाए तो फाल्गुन मास पड़ते ही होली मिलन समारोह का आयोजन विभिन्न जगहों में होने शुरू हो जाते हैं। होली मिलन समारोह में समाज के सभी धर्म और विचारों के लोग सम्मिलित होते हैं । समारोह में लोग अपने अपने उद्बोधन से समाज को एक करने की सीख देते हैं। होली पर कई जगहों पर बड़े ही व्यापक स्तर पर काव्य गोष्ठियों आयोजित की जाती है।  जिसमें देश के बड़े बड़े कवियों को आमंत्रित किया जाता है । इस अवसर पर कवि गण  होली पर एक से एककविताएं प्रस्तुत करते है । लोग मंत्रमुग्ध होकर इन गोष्ठियों में कविताओं का आनंद लेते हैं। कई  जगहों पर महामूर्ख सम्मेलन का भी आयोजन किया जाता है । जिसमें समाज के किसी एक विद्वत जन को महामूर्ख  की उपाधि दी जाती है । इसके पीछे उद्देश्य  यह कि मूर्ख भी समाज के मजबूत आधार स्तंभ है । उन्हें भी नजरअंदाज करना उचित नहीं ।उन्हें भी समाज के मुख्यधारा में लाने की जरूरत है । अगर समाज के ज्ञानवान और श्रेष्ठ लोगों को यह घमंड हो गया है कि वे बहुत बड़े ज्ञानी हो गए हैं, तो यह महामूर्ख सम्मेलन उन्हें महामूर्ख अलंकार से अलंकृत कर उनके अहम को तोड़ने की भी सीख प्रदान करता है ।