स्कन्द माता माता की उपासना से समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं 

(3 अप्रैल, वासंतिक चैत्र नवरात्र के पांचवें  दिन  स्कन्द माता  की आराधना पर विशेष)

स्कन्द माता माता की उपासना से समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं 

हिंदू धर्म ग्रंथ शास्त्रों की श्रृंखला में पुराणों का अपना एक विशेष स्थान है । इन पुराणों में हमारे हिंदू देवी देवताओं के संदेशों और कथाओं को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इन पुराणों में स्कंद पुराण का बहुत ही विशिष्ट स्थान प्राप्त है । नवरात्र पर माता दुर्गा के भक्तों को यह जानना चाहिए कि स्कंद पुराण का नामकरण किस आधार पर हुआ ? भगवान कार्तिकेय को माता पार्वती और शिव के पुत्र में सभी जानते हैं। भगवान कार्तिकेय ही स्कन्द कुमार हैं। माता पार्वती और भगवान शिव ने बहुत ही स्नेह से कार्तिकेय को स्कंद कुमार नामकरण किया था। तब से कार्तिकेय स्कंद कुमार के नाम से भी जाने जाते हैं। माता पार्वती और भगवान शिव,  कार्तिकेय को स्कंद कुमार के नाम से ही पुकारा करते थे। देवासुर संग्राम में जब देवताओं ने स्कंद कुमार को अपना मुख्य सेनापति नियुक्त किया था,  तब कार्तिकेय ने रणभूमि में जो शौर्य, पराक्रम और  वीरता प्रस्तुत किया था,  वह सिर्फ स्कंद कुमार से ही संभव था । भगवान कार्तिकेय ने  कुछ ही घंटों के भीतर समस्त दानवों का नाश कर एक कृतिमान स्थापित किया था । हमारे ऋषि मुनियों ने भगवान कार्तिकेय के इस पराक्रम, शौर्य और वीरता से प्रभावित होकर स्कंद पुराण की रचना की थी । 
  हमारे शास्त्रों में वासंतिक नवरात्र के पांचवें दिन स्कन्द  माता की पूजा का विधान हमारे उल्लेखित है।  माता स्कंद की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं । भक्त में और कोई अन्य सांसारिक सुख प्राप्त करने  की अभिलाषा शेष नहीं रह जाती है।  स्कंद कुमार की माता होने के कारण माता का नाम स्कंद माता पड़ा था । स्कंद माता की आराधना करने से भक्तों को माता स्कंद और भगवान कार्तिकेय दोनों के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।  नवरात्र के पांचवें दिन आदि शक्ति माता दुर्गा,  स्कंद माता के रूप में अपने भक्तों को दर्शन देती हैं। स्कंद माता  भुजाओं से युक्त हैं।  माता के दाहिनी तरफ की भुजा ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कंद को अपने गोद में पड़ी हुई हैं । दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई हैं, उसमें कमल पुष्प ली हुई हैं । बाएं तरफ की ऊपर वाली भुजा वर मुद्रा और नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई हैं, उसमें भी कमल पुष्प ली  हुई हैं । भक्तों को यहां यह जानना चाहिए कि आदिशक्ति माता दुर्गा, अपना नाम अपने बेटे स्कंद कुमार के नाम पर रखकर यह बताना चाहती हैं कि माता के लिए पुत्र सबसे प्रिय है। इसलिए भारत में प्रचलित माता को उनके ज्येष्ठ पुत्र व पुत्री की माता के रूप में भी बुलाया जाता है। दुर्गा सप्तशती में वर्णन है कि पुत्र  कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता हो नहीं सकती है। नवरात्र पर भक्तों को अपनी माता  की सेवा का भी सच्चे मन से संकल्प लेना चाहिए। 
   स्कंद माता  को प्रकृति प्रदत्त कमल पुष्प बहुत ही प्रिय है ।‌ नवरात्र के पांचवें दिन भक्तों को चाहिए कि स्कंदमाता की पूजा में कम से कम एक कमल पुष्प जरुर अर्पित करें। स्कंद  माता शेर पर सवार होकर अपने भक्तों को दर्शन दे रही हैं। शेर युद्ध के लिए उद्धत है।‌ शेर, राक्षसों और दानवों का  नाश  करने के लिए भी उद्धत है।  शेर के हूंकार  सुनकर कोसों दूर रह रहे राक्षस और दानव डर से भाग खड़े होते हैं।  स्कंदमाता अपने पुत्र स्कंद कुमार को गोद में लिए अपने भक्तों को बल, बुद्धि, यश, शौर्य, पराक्रम, और वीरता का आशीर्वाद दे रही होती हैं ।‌ इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है।  इसलिए साधक को पूरी सावधानी के साथ स्कंद माता की उपासना करनी चाहिए।   हमारे शास्त्रों में नवरात्र पूजन के पांचवें दिन को पुष्कल महत्व का बताया गया है । इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक को समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्र वृत्तियों का लोप हो जाता है । वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। उसका मन समस्त लौकिक सांसारिक मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासन मां स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है।‌ इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिए।‌ भक्तों  को अपनी समस्त ज्ञान चित्त वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।
  स्कंद माता की उपासना उनके प्रादुर्भाव काल से लेकर अनंत काल तक  होती रहेगी । साधक माता को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के अनुष्ठान, व्रत आदि करते रहते हैं । माता सभी भक्तों पर एक दृष्टि प्रदान करती है।  नवरात्र पर  नौ दिनों की माता की उपासना करते हुए विशेष रूप ध्यान पर एकाग्र चित्त होने की बात बताई गई है।भक्तों को पूरे ध्यान से मां की भक्ति करनी चाहिए। ध्यान का यहां बहुत ही महत्व है।  माता की भक्ति करते समय अगर सांसारिक बातें मन मस्तिष्क में चलती रहती हैं, तब यह भक्ति पूर्णतः में नहीं कहीं जा सकती है।  इसलिए भक्तों को अपने चित्र वृत्तियों से सांसारिक बातों  को  पूर्णतः हटा देना चाहिए । निर्मल और शांत मन से माता  की भक्ति करनी चाहिए।  भक्ति का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ है । इसी मार्ग पर चलकर ही स्वयं को मां के श्री चरणों पर समर्पित किया जा सकता है। 
  भक्तों को यह जानना चाहिए कि माता हर भक्त के रोम रोम में निवास करती हैं । शरीर का ऐसा कोई भी भाग शेष नहीं बचता है, जहां माता निवास नहीं करती हैं । माता शरीर के हर एक भाग का रक्षा भी करती हैं ।भक्तों को माता की इस कृपा पर ध्यान देने की जरूरत है।‌ माता के बिना न इस संसार का अस्तित्व है और न ही मनुष्य का अस्तित्व ।  जगत में जो भी चीजें दिखती हैं, सारी चीजें माता की ही कृपा से ही है । कुछ चीज ऐसी हैं, जिसे खुले नेत्रों से नहीं देखा जा सकता है ।‌ वहां तक माता उनकी  करती रहती हैं । इसलिए भक्तों को चाहिए कि प्रकृति निर्मित चीजों का इस्तेमाल उतना ही करें, जितना उसे जरूरत है। शेष को अन्य के लिए छोड़ दीजिए। सच्चे अर्थों में नवरात्र का उद्देश्य भी यही है । 
    स्वयं से जाने अनजाने किसी का अहित न हो । इसका हर पल ख्याल हो। इस ब्रह्मांड में निवास करने वाले सभी जीव - जंतु, जड़ - चेतन सब माता का ही रूप हैं  तब प्रकृति की रक्षा की जवाब देगी भी हमारी ही बनती है।  आज पर्यावरण में जो प्रदूषण फैलता चला जा रहा है। यह किस कारण हुआ है ? इसे समझने की जरूरत है।‌ नवरात्र पर हम सबों को यह भी विचार करना चाहिए कि  पर्यावरण की  रक्षा कैसे कर सकते हैं ?  पर्यावरण की रक्षा भी माता की भक्ति के समान है । अगर हम सब प्रकृति की रक्षा करते हैं, तो यह भी नवरात्र  अनुष्ठान के समान ही होगा। नवरात्र पर पर्यावरण को बेहतर बनाने का हम सबों को संकल्प लेना चाहिए। 
   स्कंद माता के भक्त विपत्तियों का सामना बहुत ही हंसी खुशी करते हैं। भक्तों  को इस मृत्यु लोक में ही परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है।  उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वयंमेव  में सुलभ हो जाता है। सूर्य मंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनके उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाते हैं।  माता के उपासकों में एक अलौकिक प्रभामंडल अदृश्य भाव से सदैव उसके चतुर्दिक परिव्याप्त रहता है। यह प्रभामंडल प्रतिक्षेम का  निर्वहन करता रहता है ।‌ इसके उपासक कभी पराजित नहीं होते हैं।‌ भक्तों को पूरे मन से स्कंद माता की उपासना करनी चाहिए।