'होलिका दहन' अच्छाई की जीत का संदेश देता है

(13 मार्च, फाल्गुन पूर्णिमा,'होलिका दहन' मनाने की गौरवशाली परंपरा पर विशेष )

'होलिका दहन' अच्छाई की जीत का संदेश देता है

रंगों का त्यौहार होली का नाम ही मन मस्तिष्क को हर्षोल्लास से सराबोर कर देता है। रंगो का यह पर्व मिलने और मिलाने के पर्व के रूप में भी जाना जाता है। लोग इस दिन अपनी दुश्मनी भुलाकर दोस्ती की नई शुरुआत करते हैं । रंग अपने विविध रूपों में होते हुए भी  होली पर्व को एक ही रंग में रूपायित कर जाता है। और वह रंग है सामाजिक सौहार्द्र और भाई-चारे का। यह हम सबों को विविधता में रहकर भी एकता और अखंडता की सीख दे जाता है। होली पर्व का होलिका दहन से बहुत ही गहरा रिश्ता है। झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा आदि प्रदेशों में होलिका दहन की परंपरा लगभग एक समान है।  इसके साथ ही  देश के विभिन्न प्रांतों में होली से एक दिन पूर्व कुछ फेरबदल के साथ होलिका दहन मनाने की परंपरा है । 

  हम सबों को यह जानना चाहिए कि होलिका दहन के लिए प्रदोष काल का समय चुना जाता है, जिसमें भद्रा का साया नहीं हो। हिंदू धर्म ग्रंथो के अनुसार  होलिका दहन करने से पहले होलिका की पूजा करने से लोगों के  मन से सभी प्रकार के भय दूर होते हैं । इसके साथ ही लोगों को ग्रहों के अशुभ प्रभाव में भी राहत मिलती है। हमारे धर्म ग्रंथो के अनुसार होलिका  महा प्रतापी राजा  हिरण्यकश्यप की बहन थी। हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर मानता था। प्रजा को  उसे ईश्वर मानने लिए दण्डित करता रहता  था । हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु का घोर विरोधी था। संयोग से उनका पुत्र भक्त प्रहलाद  भगवान विष्णु के  अन्यन भक्त थे। यह हिरण्यकश्यप को बर्दाश्त नहीं हो रहा था।  उन्होंने  भक्त प्रहलाद को मारने की बहुत कोशिशें कीं, लेकिन  कामयाब नहीं हो पाए थे । तब उन्होंने अपनी बहन होलिका को भक्त प्रहलाद को अग्नि में जलाकर मार देने का आदेश दिया। होलिका के पास एक ऐसा चादर था, जिसे ओढ़ कर होलिका अग्नि में कभी जल नहीं सकती थी।  होलिका ने छल से भक्त प्रहलाद को अपनी गोद में रखकर जलती हुई अग्निकुंड में बैठे गई, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से हवा के झोंके से उड़कर चादर ने होलिका के शरीर से उड़ कर भक्त प्रहलाद को ढक  लिया। अंततः होलिका स्वयं ही इस अग्नि में जलकर स्वाहा हो गई । वहीं दूसरी ओर भक्त प्रहलाद जलती हुई अग्नि से बाहर आ गया था। यह घटना फाल्गुन मास पूर्णिमा के दिन प्रदोष काल में घटित हुई थी। इसीलिए  होलिका दहन, प्रदोष काल में ही किया जाता है, इसके साथ ही हमारे ज्योतिषी यह विशेष रूप से ध्यान रखते हैं कि इस अवधि में भद्रा की साया न हो।
 हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार होलिका दहन करते समय  नरसिंह मंत्र जाप करने का उल्लेख मिलता है। इस मंत्र के जाप से भक्तों को दैहिक मानसिक और सभी तरह की व्याधियों से मुक्ति मिलती हैं। नमस्ते नरसिंहाय प्रह्लादाह्लाद दायिने/ हिरण्यकशिपोर्वक्षः शिला-टङ्क-नखालये/ इतो नृसिंहः परतो नृसिंहो/ यतो यतो यामि ततो नृसिंहः/बहिर्नृसिंहो हृदये नृसिंहो/नृसिंहमादिं शरणं प्रपद्ये ।  होलिका दहन सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन में अच्छाई और सकारात्मकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा भी है। इस दिन हम अपने दिल और दिमाग की सारी नफरत, द्वेष और बुराई को जलाकर एक नए अध्याय की शुरुआत करते हैं।
  झारखंड प्रांत में  होलिका दहन को 'अगजा' के नाम से जाना जाता है। झारखंड में प्रचलित यह परंपरा काफी पुरानी है। होलिका दहन झारखंड के लगभग सभी चौबीसों जिलों में बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। झारखंड के चौबीसों जिलों में होलिका दहन मनाने की परंपरा की शुरुआत कब  हुई थी ? इस संबंध में अलग-अलग तिथियां मिलती हैं । झारखंड में प्रचलित होलिका दहन के गौरवशाली इतिहास पर शोध करने से कई नई जानकारियां मिल सकती हैं।  इस आलेख में मैं हजारीबाग जिले में होलिका दहन की परंपरा कब प्रारंभ हुई थी , इस संबंध में जो जानकारियां हुईं, उसे उसी रूप में रख रहा हूं ।
हजारीबाग जिले का नाम हजारीबाग इसलिए पड़ा था कि हजारों बागों से  लदे होने के कारण ही इसका नाम हजारीबाग पड़ा था । बेतहाशा वृक्षों की कटाई के बाद भी हजारीबाग का प्राकृतिक सौंदर्य बरकरार है। हजारीबाग जिले में होली पर्व मनाने की परंपरा तो काफी पुरानी है, लेकिन आज से लगभग 126 वर्ष पूर्व हजारीबाग नगर में  पंच मंदिर चौक से होलिका दहन परंपरा की शुरुआत हुई थी। इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार  राधा कृष्ण पंच मंदिर  से होलिका दहन  की प्रारंभ होने की कहानी जुड़ी हुई है। राधा कृष्ण पंच मंदिर  का निर्माण 1880 से प्रारंभ हो गया था । लगभग 20 वर्षों बाद यह मंदिर बनकर तैयार हुआ था।  सन 1901  में राधा कृष्ण पंच मंदिर में स्थापित मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा और पूजा पाठ  के साथ ही  पंच मंदिर चौक पर सामूहिक रूप से होलिका  दहन का शुभारंभ हुआ था।   इस चौराहे का नामकरण राधा कृष्ण पंच मंदिर के शुभ  उदघाटन के बाद ही  पंच मंदिर चौक पड़ा था। 
  126 वर्ष पूर्व  पंच मंदिर चौक में  होलिका दहन जिस  विधि विधान के साथ शुरू की गई थी, आज भी यह परंपरा जारी है। पंच मंदिर चौक से ही प्रेरणा लेकर हजारीबाग के अन्य चौराहों पर होलिका दहन की यह परंपरा शुरू की गई थी। पंच मंदिर चौक में शुरू की गई होलिका दहन परंपरा की शुरुआत  स्व  हरसहाय मल,स्व मैदा कुंवरी, स्व पंडित गोपीनाथ शर्मा के पिता आदि ने मिलजुल कर की थी। पुरोहित के रूप में स्वर्गीय पंडित गोपीनाथ लंबे समय तक पंच मंदिर चौक पर होलिका दहन की पूजा करते रहे थे। आज उनके ही वंशज पंडित पुरुषोत्तम शर्मा बीते पच्चीस वर्षों से होलिका दहन की पूजा कर रहे हैं ।
   1880 के आसपास राजस्थान से कई अग्रवाल और जैन समाज के लोग हजारीबाग आकर बसे थे। तब हजारीबाग नगर एक गांव के समान था। नगर के अधिकांश मकान खपरैल के ही थे। पूरे नगर में आम, इमली, पीपल, बरगद, बेल आदि के हजारों  पेड़ लगे हुए थे। । होलिका दहन एक पवित्र पूजा विधान के रूप में माना जाता है। राजस्थान से आकर बसे अग्रवाल  समाज की महिलाएं इस दिन का इंतजार बहुत ही बेसब्री के साथ करती रही हैं। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन रेड़ी की डाल को इस चौक पर बहुत ही विधि विधान के साथ स्थापित किया जाता है ।‌ मारवाड़ी महिलाएं  एक महीना पूर्व  से ही गाय के गोबर से बड़कुल्या बना कर सुखा रखतीं  हैं । होलिका दहन के दिन रेड़ी की डाल की पूजा कर बड़कुल्या अर्पित कर देती हैं।  उसके बाद कुछ लकड़ियां वहां जमा कर दी जाती हैं। होलिका दहन से पूर्व  आसपास के हिंदू धर्मावलंबी  अपने-अपने घरों में  बने पकवान  अगजा पर समर्पित कर देते हैं।  ऐसी मान्यता है कि अगजा पर पकवान समर्पित करने से उनके घर में कभी भी अन्न धन की कमी नहीं होगी।
  देश की आजादी के बाद स्व फूल चंद्र अग्रवाल, स्व नाथूलाल अग्रवाल,स्व कस्तूरमल,स्व  हीरालाल महाजन, स्व पांचू गोप,स्व यदुनाथ बाबू, स्वर्गीय गुरु सहाय ठाकुर आदि ने अपने-अपने मुहल्ले  के चौराहों पर होलिका दहन को विस्तार दिया था। इसी कालखंड में हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और भक्त प्रहलाद की मूर्ति अगजा  में समर्पित होनी शुरू हो गई थी। जबकि होलिका दहन के पश्चात भक्त प्रहलाद की मूर्ति को वहां से तुरंत निकाल लिया जाता है।‌ यह परंपरा आज भी उसी रूप में अनवरत जारी है। वर्तमान समय में नई  युवा पीढ़ी होलिका दहन कार्यक्रम से जुड़ी हैं।  आज हजारीबाग नगर में सौ  से अधिक जगहों पर होलिका दहन की जाती है । इसके बाद ही लोग  होली पर्व  मनाते  हैं। झारखंड के अन्य तेइसों जिलों में लगभग इसी परंपरा का निर्वहन हो रहा है।