विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने के निहितार्थ 

विनोद कुमार शुक्ल आधुनिक हिंदी साहित्य के चुनिंदा कथाकारों और कवियों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी विशिष्ट भाषा शांत गहनता और अद्भुत कल्पना शीलता के बल पर साहित्य को नई संवेदना दी है।

विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने के निहितार्थ 

देश के जाने-माने लब्ध प्रतिष्ठित कवि, कथाकार,लेखक विनोद कुमार शुक्ल को हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। जैसे ही इस सम्मान की खबर हिंदी साहित्य सेवियों के बीच आई,  खुशी की लहर दौड़ पड़ी है। शुक्ल जी का अब तक का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य लेखन को समर्पित रहा है । उनका विस्तृत रचना संसार पर सदा हिंदी सेवियों को गौरवान्वित करता रहेगा । इसके साथ ही उनकी कृतियों से  लेखकों को कुछ नया लिखने की प्रेरणा भी मिलती रहेगी।  ज्ञानपीठ पुरस्कार समिति ने शुक्ल जी को यह पुरस्कार देने में थोड़ा विलंब जरूर किया ।  अंततः ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए उनके नाम पर मुहर लगाकर खुद को भी सम्मानित करने जैसा कार्य किया है। सच्चे अर्थों में विनोद कुमार शुक्ल इस पुरस्कार के वास्तविक हकदार हैं।‌ देशभर में हिंदी साहित्यकारों के बीच ज्ञानपीठ पुरस्कार पर उंगलियां इसलिए उठ रही थी कि अब तक विनोद कुमार शुक्ल  को हिंदी साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया है ? शुक्ल जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान कर  उनकी  कृतियों को एक तरह से सम्मानित करने जैसा कार्य किया गया है। उन्होंने हिंदी साहित्य को अपने लेखनी के माध्यम से जो दिया है, अद्वितीय है।
   यह पुरस्कार विनोद कुमार शुक्ल को  हिंदी साहित्य में उनके अद्वितीय योगदान, रचनात्मकता और विशिष्ट लेखन शैली के लिए दिया गया है। विनोद कुमार शुक्ल आधुनिक हिंदी साहित्य के चुनिंदा कथाकारों और कवियों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी विशिष्ट भाषा शांत गहनता और अद्भुत कल्पना शीलता के बल पर साहित्य को नई संवेदना दी है। वे छत्तीसगढ़ से यह पुरस्कार पाने वाले पहले व्यक्ति हैं । वे हिंदी साहित्य के 12 वें साहित्यकार हैं, जिन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। । इसके साथ ही वे 59 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने साहित्यकारों की श्रेणी में आ गए हैं। वे छत्तीसगढ़ से यह पुरस्कार पाने वाले पहले लेखक हैं। शुक्ल जी के प्रमुख उपन्यासों में 'नौकर की कमीज़', 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' और 'खिलेगा तो देखेंगे' शामिल हैं। वे अपने उपन्यासों के माध्यम से जीवन की विसंगतियों को बहुत ही मार्मिक ढंग से उठाते रहे हैं । वे सहज और सरल विशिष्ट शैली के लिए जाने जाते हैं। वे अपनी बातों को बहुत ही सहजता के साथ कह गुजरते हैं।  उनकी सहजता में बड़ी बात छुपी होती है।  उनका गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर समान रूप से अधिकार है । उन्होंने दोनों विधाओं पर  बहुत ही महत्वपूर्ण और सार्थक विचारों को दर्ज कर एक नई बात कहने की कोशिश की है।
  विनोद कुमार शुक्ल, वयोवृद्ध लेखकों की श्रेणी में  हैं।  वे उम्र के हिसाब से वयोवृद्ध हैं,साथ ही लेखन के हिसाब से भी काफी लंबे समय से लिखते चलते आ रहे हैं। उनका जन्म  देश की आजादी से पूर्व 1 जनवरी 1937 को हुआ छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में हुआ था। उन्होंने प्राध्यापन को रोज़गार के रूप में चुनकर अपना पूरा ध्यान साहित्य सृजन में लगाया। अभी वे ज्यादा इधर-उधर आ - जा नहीं सकते हैं।  इसलिए ज्ञानपीठ पुरस्कार समिति के पदाधिकारियों ने छत्तीसगढ़ स्थित उनके आवास में आकर यह सम्मान उन्हें प्रदान किया। विनोद कुमार शुक्ल को हिंदी भाषा के एक ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य में उनके अनूठे और सादगी भरे लेखन के लिए जाना जाता है। शुक्ल ने उपन्यास एवं कविता विधाओं में साहित्य सृजन किया है। उनका पहला कविता संग्रह 1971 में लगभग जय हिन्द नाम से प्रकाशित हुआ। 1979 में नौकर की कमीज़ नाम से उनका उपन्यास आया जिस पर फ़िल्मकार मणिकौल ने इसी से नाम से फिल्म भी बनाई। शुक्ल के दूसरे उपन्यास 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है
   विनोद कुमार शुक्ल हिंदी कविता के वृहत्तर परिदृश्य में अपनी विशिष्ट भाषिक बनावट और संवेदनात्मक गहराई के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने समकालीन हिंदी कविता को अपने मौलिक कृतित्व से सम्पन्नतर बनाया है और इसके लिए वे पूरे भारतीय काव्य परिदृश्य में अलग से पहचाने जाते हैं। उनकी एकदम भिन्न साहित्यिक शैली ने परिपाटी को तोड़ते हुए ताज़ा झोकें की तरह पाठकों को प्रभावित किया, जिसको 'जादुई-यथार्थ' के आसपास की शैली के रूप में महसूस किया जा सकता है। वे एक कवि होने के साथ-साथ शीर्षस्थ कथाकार भी हैं। उनके उपन्यासों ने हिंदी में पहली बार एक मौलिक भारतीय उपन्यास की संभावना को राह दी है। उन्होंने एक साथ लोक आख्यान और आधुनिक मनुष्य की अस्तित्वमूलक जटिल आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति को समाविष्ट कर एक नये कथा-ढांचे का आविष्कार किया है। अपने उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने हमारे दैनंदिन जीवन की कथा-समृद्धि को अद्भुत कौशल के साथ उभारा है। मध्यवर्गीय जीवन की बहुविध बारीकियों को समाये उनके विलक्षण चरित्रों का भारतीय कथा-सृष्टि में समृद्धिकारी योगदान है। वे अपनी पीढ़ी के ऐसे अकेले लेखक हैं, जिनके लेखन ने एक नयी तरह की आलोचना दृष्टि को आविष्कृत करने की प्रेरणा दी है। आज वे सर्वाधिक चर्चित लेखक हैं। अपनी विशिष्ट भाषिक बनावट, संवेदनात्मक गहराई, उत्कृष्ट सृजनशीलता से श्री शुक्ल ने भारतीय वैश्विक साहित्य को अद्वितीय रूप से समृद्ध किया है।
 उनकी कृतियों की एक लंबी सूची है। एक आलेख में उसे प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। फिर भी कुछ प्रमुख कृतियों के नाम दर्ज कर रहा हूं।
कविता संग्रह :  'लगभग जयहिंद ' वर्ष 1971 ।  'वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह' वर्ष 1981 । 'सब कुछ होना बचा रहेगा ' वर्ष 1992 । 'अतिरिक्त नहीं ' वर्ष 2000 । 'कविता से लंबी कविता ' वर्ष 2001 । 'आकाश धरती को खटखटाता है ' वर्ष 2006। 'पचास कविताएँ' वर्ष 2011 । 'कभी के बाद अभी ' वर्ष 2012। 'कवि ने कहा ' -चुनी हुई कविताएँ वर्ष 2012। 'प्रतिनिधि कविताएँ ' वर्ष 2013।
उपन्यास :  'नौकर की कमीज़ ' वर्ष 1979। 'खिलेगा तो देखेंगे ' वर्ष 1996। 'दीवार में एक खिड़की रहती थी ' वर्ष 1997।' हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ ' वर्ष 2011। 'यासि रासा त ' वर्ष 2016। 'एक चुप्पी जगह' वर्ष 2018। कहानी संग्रह : 'पेड़ पर कमरा ' वर्ष 1988। 'महाविद्यालय ' वर्ष 1996 । 'एक कहानी ' वर्ष 2021 । 'घोड़ा और अन्य कहानियाँ ' वर्ष 2021। कहानी/कविता पर पुस्तक : ‘गोदाम’, वर्ष 2020। 'गमले में जंगल’,  आदि। इसके साथ ही उनकी कई कृतियां विविध भाषाओं में अनुवाद की गई हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की हैं।
 विनोद कुमार शुक्ल  को समय-समय पर विविध पुरस्कारों से सम्मानित किया । 'गयागजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप ' म.प्र. शासन । रज़ा पुरस्कार ' मध्यप्रदेश कला परिषद। शिखर सम्मान ' म.प्र. शासन। राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान ' म.प्र. शासन। 'दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान' मोदी फाउंडेशन, साहित्य अकादमी पुरस्कार', भारत सरकार। हिन्दी गौरव सम्मान' उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, उ.प्र. शासन।  मातृभूमि' पुरस्कार, वर्ष 2020, अंग्रेजी कहानी संग्रह ‘Blue Is Like Blue’ । साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सर्वोच्च सम्मान “महत्तर सदस्य” चुने गये, वर्ष 2021।  इसके साथ ही उनका एक उपन्यास ' नौकर की कमीज़ ' एवं कहानी 'बोझ' पर विख्यात फिल्मकार मणिकौल द्वार फिल्म का निर्माण वर्ष 1999 किया गया था। इस फिल्म को फिल्म 'केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह ' में पुरस्कृत किया गया था। उनकी एक  कहानी'आदमी की औरत' एवं 'पेड़ पर कमरा' पर राष्ट्रीय फिल्म इंस्टीट्यूट, पूना द्वारा अमित दत्ता के निर्देशन में फिल्म का निर्माण। फिल्म वेनिस अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह 2009 में ‘स्पेशल मेनशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया था। उनका एक बहुचर्चित उपन्यास  ' दीवार में एक खिड़की रहती थी' पर प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक मोहन महर्षि सहित अन्य रचनाओं पर निर्देशकों द्वारा नाट्य मंचन किया गया 
 विनोद कुमार शुक्ल  हिंदी साहित्य के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर भी हिंदी साधना में रत है।  उन्होंने इस उम्र में भी लिखना बंद नहीं किया है। उनकी कल्पना की उड़ान अनवरत  जारी है। बढ़ती उम्र भी उनकी कल्पना की उड़ान को रोक नहीं पा रही है। वे एक हिंदी तपस्वी के रूप में अपनी साधना में रत हैं । उनका अब तक का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उनके जीवन से हम सबों को सहजता सरलता की सीख लेनी चाहिए । वे एक कर्मयोगी हैं। एक सधे हुए लेखक हैं।  एक बड़े विचारक हैं। इसकी सीख हम सबों को विनोद कुमार शुक्ल के जीवन से लेनी चाहिए।