भारत में सभी धर्म समान रूप से पुष्पित पल्लवित हो रहे हैं
(16 जनवरी, 'राष्ट्रीय धार्मिक दिवस' पर विशेष)
राष्ट्रीय धार्मिक दिवस हम सबों को यह विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि देश में सभी धर्म के मानने वाले लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ अपने - धर्म मना रहे हैं अथवा नहीं ? भारत एक हिंदू बहुल देश होने के बावजूद इस देश में निवास करने वाले विभिन्न धर्मावलंबी के लोग पूरी आजादी के साथ अपने-अपने पर्वों व त्योहारों को मानते चले आ रहे हैं। यह लिखते हुए गर्व होता है कि विश्व भर में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहां विभिन्न धर्मावलंबियों के लोग एक साथ रहकर अपने-अपने धर्म को मनाते चले आ रहे हैं। भारत वर्ष इस मामले में एक कदम और आगे है। भारत में निवास करने वाले विभिन्न विचार, पंथ के लोग भी अपने-अपने विचार और पंथ के अनुसार पूरी स्वतंत्रता के साथ कार्यक्रम आयोजित करते हैं। सभाएं आयोजित करते हैं । उत्सव मनाते हैं। उनके कार्यक्रमों में किसी भी तरह का कोई व्यवधान किसी भी धर्मावलंबी द्वारा उत्पन्न नहीं किया जाता है । यह अपने आप में बड़ी बात है।
आज से लगभग दो वर्ष पूर्व से विभिन्न देशों के व्यवसायी व्यापार के सिलसिले में भारत आते रहे थे। तब आवा गमन का उतनी सुदृढ़ व्यवस्था नहीं थी। ज्यादातर विदेशी व्यवसायी जल मार्ग से भारत में प्रवेश करते थे तब अन्य देशों की अपेक्षा भारत में उन्हें सुरक्षा ज्यादा मिलती थी। वे सभी अपने माल बहुत ही आसानी के साथ बेचकर सकुशल इस देश से लौट जाते थे। भारत की संस्कृति प्रारंभ से ही सह अस्तित्व वाली रही है। उसी का प्रतिफल यह रहा कि कई देशों के धर्मावलंबी यहां आए और भारत के होते चले गए। वहीं दूसरी ओर भारत के व्यवसायी जब जल मार्ग से दूसरे देश व्यवसाय करने के लिए जाया करते थे, तो उन देशों में बड़ी कठिनाइयों के दौर से उन्हें गुजरना पड़ता था। कई बार उनके माल लूट लिए जाते थे। कई बार माल बेच देने के बाद उनकी जमा धन राशि लूट ली जाती थी। लेकिन भारतीय व्यवसायियों के माल बेहतर गुणवत्ता के कारण ही विदेश में इसकी मांग बढ़ी थी। भारतीय व्यवसायियों को विदेशों में अपना माल बेचने के लिए अपमान का दंश झेलना पड़ा था। यह अपमान उन्हें सिर्फ और सिर्फ हिंदू होने के कारण झेलना पड़ा था।
आज भी भारतीय मूल के लोग विदेशों में जहां-जहां भी रह रहे हैं, उन्हें अपने-अपने उत्सवों को मनाने में जो आजादी मिलनी चाहिए, मिल नहीं पा रही है। यह वैश्विक चिंता की बात है। विश्व के अन्य देशों को भारत से यह सीख लेनी चाहिए कि भारत में रहने वाले विभिन्न धर्मावलंबी के लोग अपने-अपने उत्सवों को पूरी निष्ठा के साथ मनाते चले आ रहे हैं। राष्ट्रीय धार्मिक दिवस पर विश्व में निवास करने वाले सभी लोगों को यह विचार करना चाहिए कि सभी लोगों को अपने-अपने धर्म को मानने और मनाने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। धर्म, विचार और पथ एक दृष्टिकोण है। दुनिया में जितने भी महापुरुष हुए, सभी ने मानव कल्याण के उत्थान और शांति के लिए एक विचार दिया। यही विचार आगे चलकर धर्म, पंथ और संप्रदाय का रूप धारण कर लिया।
भारत का गौरवशाली इतिहास बताता है कि भारत में राज करने वाले मूल हिंदू राजवंशों ने कभी भी दूसरे धर्मलंबियों को उनके पर्वों व त्योहारों को मनाने के लिए रोका नहीं बल्कि पूरी आजादी प्रदान किया। यही कारण है कि भारतवर्ष में अन्य देशों की तुलना में हिंदू मंदिरों के अलावा मस्जिदें गिरजाघर, गुरुद्वारा एवं अन्य संप्रदायों के उपासना भवनों की संख्या सबसे ज्यादा है । भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में भारत वर्ष में रहने वाले विभिन्न धर्मावलंबियों ने समान रूप से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। लेकिन जब आजादी मिली तो मुस्लिम संप्रदाय के लोगों ने धार्मिक आधार पर एक अलग देश पाकिस्तान का निर्माण कर लिया। बात सिर्फ यही रुकती नहीं है । नवनिर्मित मुस्लिम देश ने खुद को एक इस्लामिक कंट्री घोषित कर दिया था । वहीं दूसरी ओर भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। यहां का माहौल काफी खुशनुमा और शांति प्रिय है।
आज विश्व के कई देशों में राष्ट्रीय धार्मिक दिवस मनाया जाता है । अमेरिका में भी 16 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिवस हर किसी को अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने के अधिकार पर जोर देता है। भारत से विश्व भर के देशों को 'राष्ट्रीय धार्मिक दिवस' पर कार्यक्रम आयोजित कर अपने-अपने देशों के नागरिकों को दूसरे धर्म के प्रति आदर करने का भाव सीखाना चाहिए। भारत वर्ष में दिवाली, होली, ईद, क्रिसमस आदि त्योहारों पर विभिन्न धर्मावलंबी मिलजुलकर बनाते हैं। यह दिन धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और शांति व सहिष्णुता के संदेश को बढ़ावा देता है, यह याद दिलाता है कि हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने का अधिकार है, जैसे कि चर्च, मस्जिद या मंदिर जाना। उदाहरण स्वरूप थॉमस जेफरसन के 'वर्जीनिया क़ानून' की याद दिलाता है, जिसने अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन का आधार बनाया।
हम सबों को यह जानना चाहिए कि भारत में कोई एकल राष्ट्रीय धार्मिक दिवस नहीं है, बल्कि यह विविध धार्मिक त्योहारों का देश है। भारत की विविधता में एकता ही एक पहचान है। इस पहचान को बनाए रखने के लिए हर एक भारतवासी संकल्पित हैं। इस देश में मनाए जाने वाले दिवाली, होली, ईद, क्रिसमस, दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी, मकर संक्रांति आदि जो विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। राष्ट्रीय धार्मिक दिवस पर हम सबों को यह विशेष रूप से विचार करना चाहिए कि हम जो अपने-अपने धर्म के उत्सव मनाते है, उससे तो किसी अन्य धर्मावलंबियों को कोई परेशानी तो नहीं हो रही है। ऐसा ख्याल रखने से दूसरे धर्मावलंबी के लोग भी उनके उत्सवों के मनाने के क्रम में सहयोग ही करेंगे। राष्ट्रीय धार्मिक दिवस का संदेश यह है कि लोगों के धार्मिक स्वतंत्रता पर किसी भी रूप में आंच नहीं आनी चाहिए बल्कि सभी धर्मों के लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ अपने-अपने धर्म को लेकर आगे बढ़ें।
राष्ट्रीय धार्मिक दिवस पर पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश का जिक्र करना उचित समझता हूं। बांग्लादेश एक इस्लामिक देश के रूप में हमारे सामने है। बांग्लादेश अपने स्थापना काल से ही वहां रह रहे हिंदू, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता रह रहा है। बीते एक दशक में वहां रह रहे अल्पसंख्यकों के साथ और भी अत्याचार के मामले सामने आ रहे हैं। पिछले दिनों कई मंदिरों और गिरजाघरों को ध्वस्त कर दिया गया। हिंदू बांग्लादेशियों को घर से निकाल निकाल कर पीटा जा रहा है। जान से मारा जा रहा है । हिंदू औरतों के साथ बलात्कार जैसी घटनाएं भी सामने आ रही है। राष्ट्रीय धार्मिक दिवस पर इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। भारत सरकार को भी बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों के साथ जो दुर्व्यवहार किया जा रहा है, उसके रोकथाम के लिए आगे आना चाहिए। तभी राष्ट्रीय धार्मिक दिवस की सार्थक बनी रहेगी। संयुक्त राष्ट्र संघ को बांग्लादेश जैसे देशों पर गंभीरतापूर्वक संज्ञान लेने की जरूरत है । संयुक्त राष्ट्र संघ को तत्काल बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर विराम लगाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने की जरूरत है।