शिवाजी का संपूर्ण जीवन मातृभूमि की रक्षा में समर्पित रहा था

(19 फरवरी, छत्रपति शिवाजी की 396 वीं जयंती पर विशेष)

शिवाजी का संपूर्ण जीवन मातृभूमि की रक्षा में समर्पित रहा था

महान योद्ध छात्रपति शिवाजी का संपूर्ण जीवन मात्रभूमि की रक्षा में समर्पित रहा था।  उनका जीवन बहुत लंबा नहीं था। उन्होंने मात्र पचास वर्ष इस धरा में रह कर मात्रभूमि की जिस अदम्य साहस के साथ रक्षा की थी, सदैव भारत वासियों को गौरान्वित करता  रहेगा। उनका  जीवन त्याग, तपस्या और बलिदान से ओतप्रोत था। मुगलों से उनकी लड़ाई भारत की अस्मिता की रक्षा की लड़ाई थी। जिस कालखंड में उन्होंने मुगलओं के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की थी, ब्रिटिश हुकूमत  व्यापार के माध्यम से धीरे-धीरे कर भारत को अपने गिरफ्त में ले  चुकी  थी। छत्रपति शिवाजी इस बात को बखूबी जानते थे। वे भारतीय हिंदू शासकों को इस बात के लिए सावधान भी  किए थे। भारत के हिंदू शासक छत्रपति शिवा जी की यह  दूरदर्शिता समझ में नहीं पाए थे। कई हिस्सों में बंटे भारत के अधिकांश राजवाड़े सिर्फ अपने-अपने रजवाड़ों की रक्षा तक ही सीमित रह गए थे ।  जिसकी बहुत भारी कीमत भारतवर्ष को चुकानी पड़ी थी। इसके बावजूद छत्रपति शिवाजी महाराज  संपूर्ण हिंदुस्तान को एक सूत्र में बांधने के साथ  भारत के गौरव की वापसी की लड़ाई लड़ते रहे थे। उन्होंने मुगलों और बीजापुर के आदिलशाही के खिलाफ संघर्ष कर हिंदवी स्वराज्य  की स्थापना की थी।  1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक  और छत्रपति  की उपाधि से अलंकृत किया गया था।  उन्हें मराठा साम्राज्य के संस्थापक के रूप में भी याद किया जाता है। 

   छत्रपति शिवाजी का जन्म पुणे के शिवनेरी दुर्ग में माता जीजाबाई और पिता शाहजी भोंसले के घर शिवनेरी किले में 19 फरवरी 1630  को हुआ था। माता जीजाबाई ने उनमें वीरता और कूटनीति के संस्कार डाले, जबकि दादाजी कोंडदेव ने उन्हें प्रशासनिक और युद्ध कला में निपुण बनाया। उन्होंने कम उम्र में ही बीजापुर के किलों पर विजय प्राप्त करना शुरू कर दिया। 1659 में उन्होंने अफजल खान का वध  कर दिया था। उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब के खिलाफ कई लड़ाइयाँ लड़ीं थीं।शिवाजी महाराज को  छापामार युद्ध का विशेषज्ञ माना जाता था। उन्होंने  मुगल शासकों की बड़ी सेनाओं को मात दी थी। उन्होंने एक अनुशासित सेना, सशक्त नौसेना और जन-हितैषी शासन स्थापित किया  था। वे एक धार्मिक सहिष्णु प्रकृति के शासक थे। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। 3 अप्रैल 1680 में पचास वर्ष की उम्र में को रायगढ़ किले में उनका निधन हुआ था।शिवाजी महाराज का जीवन वीरता, दूरदर्शिता और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है, जो आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। 
 छत्रपति शिवाजी को एक कुशल और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है। यद्यपि उनको अपने बचपन में पारम्परिक शिक्षा कुछ खास नहीं मिली थी, पर वे भारतीय इतिहास और राजनीति से सुपरिचित थे। उन्होंने शुक्राचार्य और कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लेना कई बार उचित समझा था। अपने समकालीन मुगलों की तरह वह भी निरंकुश शासक थे, अर्थात शासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी। पर उनके प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहते थे जो राजा के बाद सबसे प्रमुख हस्ती था। अमात्य वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था तो मंत्री राजा की व्यक्तिगत दैनन्दिनी का खयाल रखाता था। सचिव दफ़तरी काम करते थे जिसमे शाही मुहर लगाना और सन्धि पत्रों का आलेख तैयार करना शामिल होते थे। सुमन्त विदेश मंत्री था। सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे। दान और धार्मिक मामलों के प्रमुख को पण्डितराव कहते थे। न्यायाधीश न्यायिक मामलों का प्रधान था।
मराठा साम्राज्य तीन या चार विभागों में विभक्त था। प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था। हरेक सूबेदार के पास भी एक अष्टप्रधान समिति होती थी। कुछ प्रान्त केवल करदाता थे और प्रशासन के मामले में स्वतंत्र। न्यायव्यवस्था प्राचीन पद्धति पर आधारित थी। शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था। गांव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जांच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमि से प्राप्त होने वाला कर था पर चौथ और सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। 'चौथ' पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिए वसूले जाने वाला कर था। शिवाजी अपने को मराठों का सरदेशमुख कहते थे और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था।
 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था,जो पुरन्दर की सन्धि के अन्तर्गत उन्हें मुग़लों को देने पड़े थे। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने शिवाजी का राज्याभिषेक करने से यह कह कर मना किया की वे क्षत्रिय जाती से नहीं हैं I शिवाजी के निजी सचिव बालाजी जी ने काशी से गागाभट्ट नामक पंडित को बुलाकर उनका राज्याभिषेक कारवाया। विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। पर उनके राज्याभिषेक के बारह  दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया था। इस कारण से 4 अक्टूबर  1674 को दूसरी बार शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की। दो बार हुए इस समारोह में लगभग पचास लाख   रुपये खर्च हुए थे। इस समारोह में हिन्दवी स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था। विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को शिवाजी के विरुद्ध भेजा पर वे असफल रहे थे। 
 छत्रपति शिवाजी महाराज को धोखे से विष देकर उसकी हत्या कर दी गई थी। जबकि वे एक बड़े कार्य योजना  को मूर्त  रूप देने जा रहे थे, लेकिन उनकी हत्या से  शिवाजी की कार्य योजना  अधूरी ही रह गई थी। उनके उतराधिकारी के तौर पर शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी  और दूसरी पत्नी से राजाराम नाम से एक दूसरा पुत्र थे। उस समय राजाराम की उम्र मात्र दस वर्ष थी। अतः मराठों ने शम्भाजी को राजा मान लिया। उस समय औरंगजेब राजा शिवाजी का देहान्त देखकर  पूरे भारत पर राज्य करने कि अभिलाषा से अपनी  डेढ़ लाख सेना सागर लेकर दक्षिण भारत जीतने निकले थे। औरंगजेब ने दक्षिण में आते ही अदिल्शाही दो दिनो में और कुतुबशाही एक  ही दिनो में खतम कर दी। पर राजा सम्भाजी के नेतृत्व में मराठाओ ने नौ साल तक युद्ध करते हुए अपनी स्वतन्त्रता बरकरा‍र रखी थी। औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया। संभाजी ने उसको अपने यहाँ शरण दी। औरंगजेब ने अब फिर जोरदार तरीके से संभाजी के ख़िलाफ़ आक्रमण करना शुरु किया। उसने अन्ततः 1689 में संभाजी के बीवी के सगे भाई याने गणोजी शिर्के की मुखबरी से संभाजी को मुकरव खाँ द्वारा बन्दी बना लिया था । औरंगजेब ने राजा संभाजी से बदसलूकी की और बुरा हाल कर के मार दिया। अपनी राजा कि औरंगजेब द्वारा की गई बदसलूकी और नृशंसता द्वारा मारा हुआ देखकर पूरा मराठा स्वराज्य क्रोधित हुआ। उन्होने अपनी पुरी ताकत से राजाराम के नेतृत्व में मुगलों से संघर्ष जारी रखा। 1700  में राजाराम की मृत्यु हो गई थी। उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई चार वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका बनकर राज करती रही थी। आखिरकार पचीस साल मराठा स्वराज्य के युद्ध लड के थके हुए औरंगजेब की उसी छ्त्रपति शिवाजी के स्वराज्य में दफन होना पड़ा था। छत्रपति शिवाजी ने जिस बहादुरी के साथ मातृभूमि की रक्षा की थी, सदा याद किया जाता रहेगा। उन्होंने भारतवर्ष के हिंदुओं को संगठित करने के लिए जो कार्य किया था, मील का पत्थर साबित हुआ।