विश्व मानव मन में उठते हर सवालों के जवाब 'गीता' में निहित है

(1 दिसंबर, मार्गशीर्ष, शुक्ल पक्ष एकादशी,गीता जयंती पर विशेष)

विश्व मानव मन में उठते हर सवालों के जवाब 'गीता' में निहित है

श्रीमद्भागवतगीता जिज्ञासा और समाधान का एक मूल ग्रंथ है।  इस ग्रंथ में विश्व मानव मन में उठते हर सवालों के जवाब निहित हैं।  ऐसी मान्यता है कि श्रीमद्भागवतगीता हिंदुओं का एक पवित्र ग्रंथ है। लेकिन इस ग्रंथ में विश्व कल्याण का संदेश निहित है  । यह ग्रंथ संपूर्ण मानव जाति के कल्याण और आवागमन के चक्र से मुक्ति और मोक्ष पर आधारित है। विश्व के कई विद्वानों ने अपने शोधों में यह सिद्ध किया है कि श्रीमद्भागवतगीता न सिर्फ हिंदुओं का एक मूल ग्रंथ है बल्कि समस्त मानव जाति के कल्याण के निमित एक अमूल्य ग्रंथ है ।  भगवान श्री कृष्णा   रणभूमि में अर्जुन को कर्म, धर्म और आत्मा के संबंध में उपदेश देते हैं । भगवान श्री कृष्ण ने जिस काल खंड में ये बातें कही थीं, हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी उसकी प्रासंगिकता संपूर्ण मानव जाति के लिए ज्यों की  त्यों  बनी हुई है। यह बात इस ग्रंथ की महत्ता  और विशालता को दर्शाता है। गीता की व्याख्या के कई पहलू हैं, जिनमें इसके धार्मिक, दार्शनिक और व्यावहारिक अर्थ शामिल हैं।  समय - समय पर गीता की व्याख्या विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने नजरिए से की । गुरु शंकराचार्य, महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, डॉ राधाकृष्णन और ओशो रजनीश जैसे लोग शामिल हैं। 
  गीता में इश्वर की अवधारणा, अवतार और माया की व्याख्या की गई है। यह बताती है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब ईश्वर अवतार लेते हैं। यह जीवन जीने की कला सिखाने वाला एक दार्शनिक ग्रंथ है। इसे "योग-शास्त्र" भी कहा जाता है क्योंकि यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के विभिन्न मार्ग सिखाता है। यह ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग जैसे तीन मुख्य मार्गों का समन्वय करता है। यह जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच स्थिर रहने और आंतरिक शांति विकसित करने के बारे में सिखाती है।यह सिखाती है कि अपने कर्तव्यों को निःस्वार्थ भाव से और परिणामों की चिंता किए बिना पूरा करना चाहिए। यह सिखाती है कि आत्मा शाश्वत है और मृत्यु केवल एक शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। 
श्रीमद्भागवतगीता अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की प्रेरणा प्रदान करती है। गीता  सत्य से साक्षात्कार करवाती है ।श्रीमद्भागवत गीता का उदय  "रणभूमि में हुआ था । यह कोई मामूली युद्ध नहीं था बल्कि एक महा संग्राम था।  एक और सत्य अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा था।  वहीं दूसरी ओर असत्य स्वयं को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा था। 
  रणभूमि में जब अर्जुन ने सामने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और अपने ही सगे संबंधियों को सामने देखा, वे  पारिवारिक माया मोह में फंस गए।   अर्जुन के हाथ पांव कांपने लगे थे । वे कैसे अपने ही कुटुंब को अपने ही बाणों से मार दे ?  भगवान कृष्ण अर्जुन के सारथी के रूप में युद्ध भूमि में पांडवों के साथ शामिल थे । वे  अर्जुन के मन में उठते सवालों को समझ चुके थे। यह दृष्टांत समस्त मानव जाति को समझने की जरूरत है।  आज हम सबों को गीता में भगवान कृष्ण ने जो  उपदेश दिया, उसको पढ़कर , समझकर और मनन करने की जरूरत है।‌ हमारा जन्म मां की कोख से होता है।  जैसे ही हम इस धरा पर जन्म लेते हैं।  हमारा अपने जीवन और अस्तित्व से संघर्ष शुरू हो जाता है ।‌ जीवन  का यह संघर्ष तब तक चलता है, जब तक हमारी मृत्यु नहीं हो जाती है। हमारे जन्म और मृत्यु के बीच का जो जीवन है,  एक रणभूमि के समान होता है। जीवन के इस संघर्ष में  एक और सत्य है, तो दूसरी ओर असत्य है । इस रणभूमि में हम किसके साथ होकर एक योद्धा के रूप में शामिल होते हैं ? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल और बात है। अगर हम असत्य के साथ एक योद्धा के रूप में शामिल होते हैं, तब हमारा सर्वनाश निश्चित है।  वहीं दूसरी ओर के सत्य एक योद्धा के रूप में शामिल होते हैं, तब हम आवा गमन के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। ऐसा श्री मद्भागवतगीता में उद्धृत  है।
   अर्जुन, युद्ध भूमि में  पारिवारिक  माया मोह में  फंस गए थे ।‌ उनसे अब धनुष बाण भी उठाया नहीं जा रहा था।  जबकि उनके अपने ही खून पांडवों  ने  एक सूई की  नोक  के बराबर जमीन नहीं देना चाहते थे । लाह गृह में पांचों पांडवों को मारने की साजिश कौरवों ने की थी।  पांचों पांडवों  की बड़ी मुश्किल से  जान बच पाई थी।  चौदह  वर्षों तक पांचों पांडव निर्वासन की जिंदगी जीने के लिए  विवश हो गए थे । पांचों पांडवों की ओर से बहुत कोशिश की गई थी कि यह युद्ध ना हो। भगवान कृष्णा ने  भी कौरवों  को बहुत समझाया था, लेकिन युद्ध टला नहीं । युद्ध हुआ ही । इन तमाम कष्टों से गुजरने  बावजूद अर्जुन माया मोह के ऐसा  फंस चुके थे, इससे निकले बिना युद्ध भूमि में अर्जुन अपनी वीरता स्थापित कर ही नहीं पाते ।‌ माया मोह में फंसे अर्जुन को इस अंधकार से  मुक्त करने के लिए रणभूमि में ही उपदेश देना पड़ा था।
अगर अर्जुन माया मौह के बंधन से मुक्त नहीं होते, तब  युद्ध पूर्ण कैसे  होता  ?  तब युद्ध भूमि पर भगवान कृष्ण ने अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन अर्जुन को कराया। जैसे ही अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण के  ईश्वर रूप का दर्शन हुआ,  उसके मन में उठते सवालों और शंकाओं का समाधान हो गया था । अब उसे समझ में आ गया कि जन्म देने वाला ईश्वर है।  पालने वाला ईश्वर है।  मारने वाला भी ईश्वर है । युद्ध भूमि में तो  पांचों पांडव तो एक निमित्त मात्र है।‌ मारने वाला भी ईश्वर अंश है।  मरने वाला भी ईश्वर का अंश है । जन्म भूमि में अगर  कोई योद्धा है, तो वह है, देवों के देव कृष्ण देव।

भगवान श्री कृष्णा ने अर्जुन को ईश्वर रूप का दर्शन करने के बाद उन्होंने जो कुछ कहा,वही श्रीमद् भागवत गीता है। उन्होंने क्या कहा ?  यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। गीता कहती है, जो आज मेरा है, कल किसी और का था। और आगे भविष्य में किसी और का होगा । यह पूरी तरह प्रमाणिक है । इस तरह की बातें इससे पूर्व नहीं कही गई थी।  जब व्यक्ति माया मोह के बंधन में जकड़ जाता है, तब ये उपदेश जीवन में एक नई ऊर्जा और एक नई उत्साह भर देती है।

  जिस दिन भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, वह दिन मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि थी।  इसे मोक्षदा एकादशी भी कहते हैं । इस दिन को गीता जयंती रूप में मनाया जाता है । श्रीमदभागवतगीता की व्याख्याओं का अंत नहीं है। इस ग्रंथ के 18 अध्याय में वैचारिक स्तर के विभिन्न योग पर सूक्ष्म दृष्टि डालने पर लगता है कि अर्जुन की जिज्ञासाओं का ही नहीं बल्कि समस्त मानव जाति के समाधान का ग्रंथ  है।  गीता  का हर एक श्लोक भगवान श्री कृष्ण के मुख से निकला है । कलयुग में गीता का उपदेश हमे जीवन जीने का ढंग भी सीखते हैं।  गीता के विषय में हमारे शोध कथाओं का कथन है कि जिसने भी जीत का समग्रता पूर्वक अध्ययन किया, उसने अपने जीवन की तमाम भ्रांतियां से मुक्त कर लिया।  गीता लोगों के जीवन में एक नई उत्साह और उल्लास भर देती है।  गीता जीवन के संघर्ष को सहज और सरल बना देती है । हम सबों को गीता से साक्षात्कार करने का संकल्प लेना चाहिए । सच्चे अर्थों में गीता से  साक्षात्कार का अर्थ है,भगवान श्री कृष्ण का दर्शन।