स्कंद माता की आराधना से पारिवारिक रिश्ते मजबूत होते हैं
( 27 सितंबर, शारदीय नवरात्र के पांचवें दिन स्कंद माता की आराधना पर विशेष )
शारदीय नवरात्र का जैसे-जैसे एक - एक दिन बीतता चला जाता है, वैसे-वैसे देवी भक्तों की आराधना और भी सघन होती चली जाती है। इसलिए देवी भक्तों को और भी सावधानी और पवित्रता के साथ माता की भक्ति में लग जानी चाहिए। माता की भक्ति ही उन्हें हर कष्टों से दूर रख सकती हैं। भक्तों के जीवन में आने वाले हर रूकावटों को दूर कर सकती हैं। इसके साथ ही जीवन के हर संघर्ष से लड़ने की शक्ति भी प्रदान करती रहती हैं। देवी पुराण के कथा के अनुसार वहीं दूसरी ओर रणभूमि में मां दुर्गा अपने विविध नौ रूपों के माध्यम से हूंकार भारती रहती हैं । एक से बढ़कर एक राक्षसों का नाश करते हुए मां दुर्गा युद्ध के लिए राक्षसों को ललकारती नजर आती हैं । माता दुर्गा अपनी ही शक्ति से इस ब्रह्मांड की रचना की थी। उन्होंने ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश को उत्पन्न की थी। आज भक्तों की पुकार पर मां धरती पर अवतरण लेती हैं । मां दुर्गा, ब्रह्मा, विष्णु महेश सहित विविध देवताओं से प्राप्त शक्ति लेकर राक्षसों का दलन करने के लिए निकल पड़ती हैं । युद्ध भूमि में मां दुर्गा राक्षसों को यह नसीहत भी देती नजर आते हैं कि हे ! राक्षस गण शीघ्र ही आत्मसमर्पण कर लें । अन्यथा सर्वनाश होने के लिए तैयार रहें ।
महिषासुर, ईश्वर से प्राप्त आशीर्वाद को ही अपना सब कुछ मानने की भूल कर बैठा था । उसने इस आशीर्वाद के बल पर खुद को ही ईश्वर के सम कक्ष कह डाला था। आगे उसने ईश्वर के भक्तों पर ही जुल्म ढाहना शुरू कर दिया था। उसका अहंकार यही नहीं रुका था बल्कि उसने मां दुर्गा का ही वरण करने के लिए निकल पड़ा था। माता दुर्गा ने उसे इस सर्वनाश से बचने के लिए कई अवसर भी प्रदान किया था। लेकिन अहंकारी महिषासुर को माता दुर्गा की सीख रास नहीं आया था। इस सत्य और असत्य के युद्ध में असत्य को ही पराजित होना पड़ा था। मां दुर्गा सत्य की अधिष्ठात्री देवी हैं । उन्होंने महिषासुर को पराजित कर सत्य को प्रतिष्ठित किया था। शारदीय नवरात्र से हम सबों को यह सीख लेनी चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में भी असत्य का साथ नहीं देना चाहिए । असत्य हमें सर्वनाश की ओर ले जाएगा। सत्य हमें सभी कष्टों से मुक्त रखेगा। असत्य की राह पर कई सुख तत्काल देखने को मिलेंगे जरूर लेकिन यह क्षण भंगुर सुख होंगे । कदापि इसकी जाल में फंसने की जरूरत नहीं है। सत्य की राह कष्टकारी जरूर होगा। वही हमारे मोक्ष के मार्ग के द्वारा को खोलेगा। हमारा जो इस धरा पर बार-बार जन्म और मृत्यु हो रहा है, इस आवागमन से मुक्ति का मार्ग मोक्ष ही है । हमारा जन्म प्रकृति आदि शक्ति दुर्गा की शक्ति से ही हुआ है। अंत में उसमें ही इस आत्मा का विलय होना ही शाश्वत है । इसीलिए इस मृत भूमि पर हमारा बार-बार जन्म और मृत्यु हो रहा है। शारदीय नवरात्र की भक्ति हमें इस आवागमन के चक्र से मुक्त भी करेगी।
हमारे शास्त्रों में नवरात्र के पांचवें दिन स्कन्द माता की पूजा का विधान हमारे उल्लेखित है। माता स्कंद की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं । भक्त में और कोई अन्य सांसारिक सुख प्राप्त करने की अभिलाषा शेष नहीं रह जाती है। स्कंद कुमार की माता होने के कारण माता का नाम स्कंद माता पड़ा था । स्कंद माता की आराधना करने से भक्तों को माता स्कंद और भगवान कार्तिकेय दोनों के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। नवरात्र के पांचवें दिन आदि शक्ति माता दुर्गा, स्कंद माता के रूप में अपने भक्तों को दर्शन देती हैं। स्कंद माता भुजाओं से युक्त हैं। माता के दाहिनी तरफ की भुजा ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कंद को अपने गोद में पड़ी हुई हैं । दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई हैं, उसमें कमल पुष्प ली हुई हैं । बाएं तरफ की ऊपर वाली भुजा वर मुद्रा और नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई हैं, उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं । भक्तों को यहां यह जानना चाहिए कि आदिशक्ति माता दुर्गा, अपना नाम अपने बेटे स्कंद कुमार के नाम पर रखकर यह बताना चाहती हैं कि माता के लिए पुत्र व पुत्री सबसे प्रिय हैं। इसलिए भारत में प्रचलित माता को उनके ज्येष्ठ पुत्र व पुत्री की माता के रूप में भी बुलाया जाता है। दुर्गा सप्तशती में वर्णन है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता हो नहीं सकती है। नवरात्र पर भक्तों को अपनी माता की सेवा का भी सच्चे मन से संकल्प लेना चाहिए।
देवी पुराण के अनुसार स्कंद माता ममतामई माता के रूप में भी जानी जाती है। स्कंद कुमार की माता होने के कारण उन्हें ममतामई माता से अलंकृत किया गया है। जो भी भक्त ममतामई स्कंदमाता की पवित्र मन से आराधना करते हैं, उनके पारिवारिक रिश्ते बहुत ही सघन और मजबूत होते चले हैं। ये रिश्ते विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं टूटते हैं बल्कि और भी मजबूत होते चले जाते हैं । शारदीय नवरात्र पर भक्तों को माता की भक्ति इस रूप में करनी चाहिए।
आगे देवी पुराण में वर्णन है कि एक पुत्री के लालन पालन का फल दस पुत्रों के लालन पालन के फल के समान होता है । इसलिए हर परिवार को चाहिए कि घर की पुत्री का लालन पालन बड़े ही अच्छे ढंग से करें, जिन घरों में लड़कियों का लाल पालन ठीक ढंग से नहीं होता है, वैसे घरों से स्कंदमाता रुष्ट हो जाती हैं। ऐसे घरों में बराबर घोर अशांति बनी रहती है। यह हमेशा ध्यान दिया जाना चाहिए कि घर की कन्याओं का लालन पालन किसी भी मायने में पुत्रों से कमतर नहीं होना चाहिए और न ही पुत्र और पुत्री में भेद किया जाना चाहिए। लड़का और लड़की में भेद करने वाले घोर पाप का भागी बनते हैं। आज की बदली सामाजिक परिस्थिति स्थिति में जहां कन्या भ्रूण हत्याएं आम बात हो गई है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह एक जघन्य अपराध है। ऐसा करने वाले कभी भी इस जघन्य पाप के भोग से बच नहीं सकते हैं। वहीं कन्या की शादी में दहेज लेने वाले भी पाप के भागी बनते हैं । इसलिए अपने अपने लड़कों की शादी बिना दहेज का करना चाहिए। ऐसा करने से स्कंद माता की कृपा पूरे परिवार पर बनी रहती है।
शारदीय नवरात्र पर देवी के भक्तों को यह जानना चाहिए कि नौ देवियों में सिर्फ स्कंद माता देवी ही ऐसी देवी के रूप में प्रकट हुई थीं कि बाद के कालखंड में हमारे ऋषि मुनियों ने उनके इस ममतामई में चरित्र को लेकर स्कंद पुराण नामक पुराण की रचना की थी। आध्यात्मिक विवेचन की दृष्टि से स्कन्द पुराण सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा पुराण है। भगवान स्कंद कुमार द्वारा भगवान स्कन्द कथित होने के कारण इसका नाम 'स्कन्द पुराण' नामकरण हुआ था । इस पुराण में बद्रिकाश्रम, अयोध्या, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, कन्याकुमारी, प्रभास, द्वारका, काशी शाकम्भरी, कांची आदि तीर्थों की महिमा की गई है। गंगा, नर्मदा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों के उद्गम की मनोरथ कथाएं वर्णित हैं।रामायण, भागवतादि ग्रन्थों का माहात्म्य, विभिन्न महीनों के व्रत-पर्व का माहात्म्य तथा शिवरात्रि, सत्यनारायण आदि व्रत कथाएँ अत्यन्त रोचक शैली में प्रस्तुत की गयी हैं। विचित्र कथाओं के माध्यम से भौगोलिक ज्ञान तथा प्राचीन इतिहास की ललित प्रस्तुति इस पुराण की अपनी विशेषता है। आज भी इसमें वर्णित विभिन्न व्रत-त्योहारों के दर्शन भारत के घर-घर में किये जा सकते हैं। स्कंद पुराण ग्रंथ का अध्ययन बहुत ही शांति मन से भक्तों को करना चाहिए। इस ग्रंथ के पाडन से कई जन्म जन्मांतर के पाप दूर हो जाते हैं। इस ग्रंथ के पाठक इसी लोक में रहकर सभी प्रकार के सुखों को भोगते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त होते हैं
