"नेताजी सुभाषचंद्र बोस: संकल्प, संघर्ष और स्वाधीनता का अमर उद्घोष":- अनंत धीश अमन
"नेताजी सुभाषचंद्र बोस: संकल्प, संघर्ष और स्वाधीनता का अमर उद्घोष":- अनंत धीश अमन
गया जी । “जय हिंद” केवल एक उद्घोष नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की धड़कन है। यह वह स्वर है जिसमें बलिदान की गंध है, संकल्प की दृढ़ता है और आज़ादी की अनंत आकांक्षा है। इसी स्वर को अपनी वाणी, कर्म और जीवन से साकार किया नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने। उनके “संकल्पित मन, समर्पित तन” से— संपूर्ण व्यक्तित्व और उनके क्रांतिकारी दर्शन का सार मिलता हैं। नेताजी का जीवन संघर्ष का पर्याय था। उन्होंने पराधीनता को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया। उनके लिए स्वतंत्रता केवल राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रश्न थी। जब उन्होंने कहा—“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”—तो यह कोई उत्तेजक नारा नहीं था, बल्कि उस यथार्थ की घोषणा थी कि स्वतंत्रता त्याग और बलिदान के बिना प्राप्त नहीं होती। इस एक वाक्य ने करोड़ों भारतीयों के हृदय में क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। नेताजी ने भारत के लोगों में संघर्ष, पराक्रम और शौर्य का जो बीज बोया, वह समय की सीमाओं से परे है। यह बीज हर उस क्षण अंकुरित होता है जब देश का कोई नागरिक अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है, जब राष्ट्रहित व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखा जाता है। आज़ाद हिंद फौज का गठन केवल एक सैन्य प्रयास नहीं था, बल्कि यह भारत की सोई हुई चेतना को जगाने का ऐतिहासिक प्रयोग था—एक ऐसा प्रयोग जिसने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय अपने बलबूते पर अपनी नियति बदल सकते हैं। नेताजी का मार्ग कठिन था, पर उनका मन अडिग और तन समर्पित था। उन्होंने विदेशों की धरती पर भी भारत की आज़ादी का अलख जगाया और यह संदेश दिया कि भारत की स्वतंत्रता एक वैश्विक नैतिक प्रश्न है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम भाषणों से नहीं, बल्कि त्याग, अनुशासन और कर्म से सिद्ध होता है। आज जब हम “जय हिंद, जय भारत” कहते हैं, तो यह केवल अभिवादन नहीं रह जाता—यह एक संकल्प बन जाता है। ऐसा संकल्प कि हम उस विरासत को जीवित रखें जिसे नेताजी ने अपने संघर्ष से सींचा। उनका विचार, उनका साहस और उनका स्वप्न सदियों तक भारत की चेतना में हुंकार भरता रहेगा और राष्ट्र को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा।