हजारीबाग की बेटी रंजना के जज्बे को सलाम
रंजना बचपन से ही तेज तर्रार और दौड़ने धूफने वाली एक बालिका रहीं हैं। एक साहसिक बालिका भी रही हैं। वह गांव की अन्य बच्चियों से थोड़ा हटकर थीं।
झारखंड प्रांत के हजारीबाग जिले की बेटी रंजना ने जीवन की हर दुश्वारियों और चुनौतियां का सामना कर आखिरकार सीमा सुरक्षा बल की एक जवान बनकर अपनी मंजिल तक पहुंची ही गईं। अब वह टाटी झरिया प्रखंड के अमनारी गांव की पगडंडियों से निकलकर राजस्थान की तप्ती जमीं पर एक सीमा सुरक्षा बल की प्रहरी के रूप में देश की सीमा की रक्षा करने जा रही है । रंजन की यह संघर्ष यात्रा और सफलता की कहानी सकल समाज के लिए अनुकरणीय है। उन्होंने अपने जुझारू संघर्ष से कविता की इन पंक्तियों को सार्थक कर दी कि वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो, वीर तुम बढ़े चलो। रंजना ने मात्र नौ साल की उम्र में अपने पिता मनोज कुमार कुशवाहा को खो दिया था । उनके पिता की निर्मम हत्या कर दी गई थी। उसने अपनी मां और और बहनों को भी लगाते हुए देखा था। रंजना भी पिता के हमेशा हमेशा के लिए चले जाने पर बहुत रोई थी। लेकिन होनी को कौन टाल ल सकता है ? अब तो उसके पिता की हत्या हो गई थी। उनके पिता अब कभी वापस आने वाले नहीं थे। मां, नूतन देवी आंगनबाड़ी की सहायिका के रूप में कार्य कर रही थी। उसके कंधों पर घर की पूरी जवाबदेही आ गई थी। तीनों बच्चियां छोटी थी। लेकिन इस विषम परिस्थिति में रंजना की मां ने हिम्मत से काम लिया।और उसने अपने पति के संकल्प को आगे बढ़ते हुए पूरी निष्ठा के साथ परिवार का बोझ उठाने का कमर कस ली थी। अपनी माता श्री के संकल्प को जमीन पर उतरने के लिए तीनों बेटियां मां के कार्यों में पूरी निष्ठा के साथ जुड़ गईं। तीनों बेटियों ने मां को कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि उनकी बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कमतर नहीं है। मां की इस संघर्ष यात्रा में तीनों बेटियों ने जिस तरह से अपनी भूमिका अदा की हैं, निश्चित तौर पर अनुकरणीय है।
नूतन देवी की तीनों बेटियां बचपन से ही पढ़ने में मेघावी रही हैं। तीनों अनुशासन प्रिय और बड़ों का सम्मान करती आई हैं। यही कारण है कि आज तीनों बेटियां अपने-अपने मुकाम पर धीरे-धीरे कर पहुंचती चली जा रही हैं। तीनों बेटियों ने आज तक कोई ऐसा काम नहीं किया, जिससे कि उनकी मां को कोई परेशानी हो बल्कि हर संभव मदद ही करती रही हैं। यही कारण है कि आज पूरा अमनारी गांव इन तीनों बेटियों का नाम लेते नहीं थकते हैं । ग्राम वासी उन तीनों बेटियों के बढ़ते कदम से बहुत ही उत्साहित हैं। वे सभी अपने-अपने बच्चों को संजना, रंजना और अंजलि जैसे बनने का उदाहरण देते हैं। रंजना के सर से जब साया छिन गया था, तब उसकी उम्र मात्र नौ वर्ष की थी । उसे बहुत दुनिया की समझ नहीं थी। फिर भी उसने इस उम्र में यह संकल्प ले लिया था कि वह कभी भी अपनी मां के लिए दुःख कारण नहीं बनेगी बल्कि मां के झंझावातों में पूरा सहयोग करेगी।
रंजना बचपन से ही तेज तर्रार और दौड़ने धूफने वाली एक बालिका रहीं हैं। एक साहसिक बालिका भी रही हैं। वह गांव की अन्य बच्चियों से थोड़ा हटकर थीं। वह बचपन से ही अनुशासन प्रिय रहीं। वह कम बोलती जरूर है, पर समय पर हुंकार लगाने से चुकती भी नहीं है। वह बचपन से ही झूठ का प्रतिकार करती रही हैं। यह स्वभाव आज भी उसका उसी तरह बना हुआ है। वह जैसे-जैसे आगे की कक्षा में बढ़ते गईं, उसकी समझ उस रूप में विकसित होने लगी। उसने उसी उम्र में यह मन बना लिया कि वह देश के लिए कुछ अलग करेगी। लेकिन उसे यह समझ में नहीं आ रही थी कि उसे पढ़ लिखकर क्या बनना है ? क्या करना है ? वह बराबर अपने से बड़े परिवार के सदस्यों और शिक्षकों से यह बात जरूर पूछा करती थी कि पढ़कर क्या बनूं ? इस सवाल पूछने के क्रम में उसे कई तरह के सुझाव मिलते रहे थे। वह इन सुझावों को बहुत ही गंभीरता के साथ सुना करती थी। इन सुझावों पर मनन भी किया करती रही थी। इसके ही वह बहुत ही मेहनत लगाकर अपनी पढ़ाई जारी रख रही थी। वह अपनी पढ़ाई पूरी करते हुए मां के काम में भी सहयोग किया करती थीं । मां को किसी भी तरह की परेशानी होने पर वह तन मन से सहयोग भी किया करती रही थीं।कभी-कभी उनकी मां अपने पति की याद में रो पड़ती तो सहारा बनकर रंजना ढांढस बंधाने में लग जाती थी।
रंजना ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने ही गांव अमनारी के एक सरकारी मध्य विद्यालय से पूरी की थी। उसने प्लस टू की शिक्षा बगल के गांव झरपो के एक उच्च विद्यालय से पूरी की थी। वह सभी परीक्षाओं में अच्छे प्राप्तांक प्राप्त कर आगे बढ़ते रही हैं। फिलहाल वह विष्णुगढ़ डिग्री कॉलेज से इतिहास विषय लेकर स्नातक की परीक्षा देने वाली है। उम्मीद है कि वह इस परीक्षा में भी पूर्वकी तरह सफल रहेंगी। प्लस टू करने के बाद वह मन बना ली थी की देश की एक सिपाही बनेगी। इसीलिए उसने रांची में एसएससी द्वारा आयोजित बीएसएफ की परीक्षा दी थी। इस परीक्षा में वह सफल हुईं। इस परीक्षा में सफल होने के उपरांत उसने सिलीगुड़ी में कठिन सैन्य परीक्षित प्रशिक्षण पूरा किया अब। यह सैन्य प्रशिक्षण कोई मामूली प्रशिक्षण नहीं होता है। यह सैन्य प्रशिक्षण भी एक चुनौती के रूप उसके सामने जरूर आया, लेकिन उसने अपने अदम्य साहस कौशल बुद्धिमता से पूर्ण कर बीएसएफ का एक सफल जवान बन चुकी हैं। रंजना के संबंध में यह लिखते हुए गर्व होता है कि उसकी पहली तैनाती राजस्थान में भारत - पाकिस्तान सीमा पर होने जा रही है। रंजना अपनी पहली तैनाती को लेकर बहुत ही खुश है। उसे गर्व हो रहा है कि भारत माता की एक बेटी के रूप में सीमा की सुरक्षा करने का उन्हें अवसर प्राप्त हो रहा है।
रंजन बहुत छोटी उम्र से ही अपने परिवार का आर्थिक रूप से भी मदद करती चली आ रही हैं। जब वह सातवीं कक्षा भी पास नहीं कर पाई थीं कि वह गांव के बच्चों और बच्चियों को ट्यूशन पढ़ाकर कुछ पैसे जोड़ना शुरू कर दी थीं। जैसे जैसे वह आगे की कक्षा में बढ़ती गईं, ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ती चली गई थीं। उसने अपनी पढ़ाई का पूरा खर्चा स्वयं ही वहन कर लिया करती रही हैं। वह ट्यूशन पढ़कर शेष बचे पैसे को अपने परिवार के लालन पालन खर्च कर दिया करती थीं। उसकी बड़ी बहन संजना की शादी जब प्रशांत रंजन से हुई थी, तब रंजन ने ट्यूशन पढ़कर जो पैसे जमा की थी,अपनी बड़ी बहन की शादी में हंसते हुए खर्च कर दी थी। यह कर उसने नारी शक्ति का परिचय दिया है। आज जो लोग लड़कियों को बोझ समझते हैं, उन सबों के लिए रंजना एक उदाहरण है। लड़कियां किसी भी मायने में लड़कों से काम नहीं होती हैं। इस बात को रंजना ने अपने कार्य और व्यवहार से सिद्ध कर दिया है।
रंजना ने कहा कि जब पहली बार सीमा सुरक्षा बल की वर्दी पहनकर आईने के सामने खड़ी हुई तो पिता का चेहरा सामने आ गया। मां का संघर्ष सामने आ गया। उसकी आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। मेरी सफलता उन सभी लड़कियों के लिए है, जो घोर अभाव में भी हिम्मत और संघर्ष का दामन कभी छोड़ नहीं बल्कि संघर्ष को ही अपना जुनून बनाकर आगे बढ़ी और मंजिल तक पहुंच पाई । आगे उन्होंने कहा कि इस कामयाबी का श्रेय केवल खुद पर नहीं बल्कि अपने परिवार के सभी सदस्यों सहित शिक्षक गणों को देती हूं जो विपरीत परिस्थितियों में भी उन सबों ने मेरा साथ नहीं छोड़ा।