मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन में हिरासत पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से मांगे प्रतिबंधात्मक आदेश

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान लोगों को हिरासत में लिए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अदालत ने दिल्ली पुलिस से BNSS की धारा 163 के तहत जारी प्रतिबंधात्मक आदेश पेश करने और सीसीटीवी फुटेज सहित डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने को कहा है। BNSS की धारा 172 के इस्तेमाल को भी चुनौती दी गई है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सभी हिरासतों को गैरकानूनी घोषित नहीं किया है। कार्रवाई की वैधता संबंधित आदेशों, परिस्थितियों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

Oct 16, 2026 - 11:22
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन में हिरासत पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से मांगे प्रतिबंधात्मक आदेश

नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। पुलिस की कार्रवाई, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की कुछ धाराओं के इस्तेमाल को लेकर कानूनी बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली पुलिस से प्रतिबंधात्मक आदेशों को रिकॉर्ड पर रखने और प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी फुटेज सहित डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने अभी सभी हिरासतों को गैरकानूनी घोषित नहीं किया है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

10 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई थी। प्रदर्शनकारियों और याचिकाकर्ताओं की ओर से पुलिस कार्रवाई, कथित बल प्रयोग और आवाजाही पर प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठाए गए। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा।

11 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि किसी भी व्यक्ति को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने विशेष रूप से शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों के जमावड़े के संदर्भ में यह बात कही। साथ ही, शहर में लोगों की आवाजाही, मेट्रो और रेल सेवाओं तथा इंटरनेट सुविधा को सामान्य बनाए रखने के निर्देश भी दिए, हालांकि कानून-व्यवस्था से जुड़ी वैध परिस्थितियों में आवश्यक प्रतिबंधों की गुंजाइश बरकरार रखी गई। <escape> </escape>

BNSS की धारा 163 क्या कहती है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत सक्षम कार्यपालक मजिस्ट्रेट तत्काल रोकथाम या शीघ्र कार्रवाई की आवश्यकता होने पर आदेश जारी कर सकते हैं। इसका इस्तेमाल सार्वजनिक शांति, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जा सकता है। ऐसे आदेशों के तहत किसी क्षेत्र में सभा, जुलूस या प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन से पहले कुछ इलाकों में धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए थे। ऐसे आदेश लागू होने पर उनकी शर्तों का उल्लंघन कार्रवाई का आधार बन सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति को केवल प्रदर्शन से जुड़ा होने के कारण हिरासत में लेना अपने आप में पर्याप्त कानूनी आधार नहीं माना जा सकता। यह देखना जरूरी है कि आदेश वैध था या नहीं, संबंधित व्यक्ति पर उसकी शर्तें लागू होती थीं या नहीं और पुलिस ने किस आधार पर कार्रवाई की।

धारा 172 के इस्तेमाल पर भी उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को BNSS की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर भी नोटिस जारी किया। इस धारा के तहत पुलिस के वैध निर्देशों का पालन करना आवश्यक है। निर्देशों का विरोध करने, उन्हें मानने से इनकार करने या उनकी अवहेलना करने पर पुलिस संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लेने या हटाने की कार्रवाई कर सकती है, लेकिन यह शक्ति कानून और संविधान की सीमाओं के अधीन है।

याचिका में दावा किया गया है कि इस प्रावधान में पुलिस की शक्तियों के इस्तेमाल पर पर्याप्त सुरक्षा उपाय स्पष्ट नहीं हैं और इससे मनमानी कार्रवाई की आशंका पैदा हो सकती है। याचिकाकर्ता ने धारा 172 को असंवैधानिक घोषित करने या इसके इस्तेमाल के लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा उपाय तय करने की मांग की है। फिलहाल यह याचिकाकर्ता के तर्क हैं; सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस धारा को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है।

पुलिस को सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश

15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से प्रदर्शन से संबंधित धारा 163 के तहत जारी प्रतिबंधात्मक आदेशों को रिकॉर्ड पर रखने को कहा। अदालत ने पुलिस और अन्य संबंधित एजेंसियों को सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य डिजिटल सामग्री सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया, ताकि जरूरत पड़ने पर घटनाओं की जांच और न्यायिक समीक्षा में इनका इस्तेमाल किया जा सके।

अदालत के सामने प्रदर्शनकारियों की हिरासत, कथित पुलिस ज्यादती, सार्वजनिक परिवहन में बाधा और प्रदर्शन स्थल से जुड़े प्रतिबंधों सहित कई मुद्दे रखे गए हैं। कोर्ट ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। मामले की आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि अलग-अलग स्थानों पर की गई पुलिस कार्रवाई के लिए कौन-से कानूनी आधार और आदेश मौजूद थे।

क्या प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लेना कानूनी था?

इस सवाल का जवाब सभी मामलों में एक जैसा नहीं है। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, ये अधिकार कानून के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। यदि किसी क्षेत्र में वैध प्रतिबंधात्मक आदेश लागू है और कोई व्यक्ति उसका उल्लंघन करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार पुलिस कार्रवाई कर सकती है।

दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति को बिना वैध आधार, मनमाने तरीके से या कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में लिया गया है, तो उस कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। इसलिए इस मामले में प्रत्येक हिरासत की वैधता तय करने के लिए संबंधित आदेश, घटनास्थल, पुलिस की कार्रवाई और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच जरूरी होगी।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सभी हिरासतों को गैरकानूनी करार नहीं दिया है। अदालत ने कानूनी प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने, प्रतिबंधात्मक आदेश रिकॉर्ड पर रखने और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने जैसे निर्देश दिए हैं। अब यह मामला शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की शक्तियों के बीच कानूनी सीमाओं की जांच का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।

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