भगवान अनंत देव की उपासना से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं
(25 सितंबर, भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी, 'अनंत चतुर्दशी' पर्व पर विशेष)
हिंदू धर्म के पौराणिक धर्म ग्रंथो के अनुसार भगवान अनंत की उपासना से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं । उनकी विशेष पूजा एक व्रत के रूप में अनंत चतुर्दशी के नाम से भादो माह के शुक्ल पक्ष के चतुर्दशी के दिन की जाती है। इस दिन देश भर में हिंदू धर्मावलंबी भगवान अनंत देव की पूजा बड़े ही पवित्र मन से कर अपने अपने बाहों में चौदह गांठों से युक्त सूत्र बांधते हैं। भगवान अनंत देव, भगवान विष्णु के अंश अवतार, नित्य सेवक व सहचर के रूप में जाने जाते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान अनंत ,भगवान विष्णु के शैय्या छत्र और नाम के रूप में हर युग में उनके साथ रहते हैं। द्वापर युग में भगवान अनंत के ही पूर्ण अंश के रूप में श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का अवतार हुआ था, जिन्हें विष्णु के अवतारों में भी स्थान मिला है। अनंत चतुर्दशी के व्रत में बांधा जाने वाला वाला अनंत सूत्र में चौदह गांठें होते हैं। अर्थात ये गांठें भगवान विष्णु के चौदह रूपों, नामों व चौदह लोकों की प्रतीक मानी जाती हैं। भगवान अनंत देव की कथा मुख्य रूप से अनंत चतुर्दशी के पावन पर्व पर सुनी जाती है, जो भगवान विष्णु के 'अनंत' स्वरूप को समर्पित है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में सुमंत नामक एक नेक और तपस्वी ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उनकी एक सुंदर और धर्मपरायण पुत्री थी जिसका नाम सुशीला था। सुशीला के बड़ी होने पर उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई। इसके बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। उसके बाद सुशीला का विवाह कौडिन्य नामक एक ज्ञानी ऋषि से हुआ। कर्कशा के स्वभाव के कारण सुशीला अपने पति के साथ विदा होकर आश्रम आ गई।
आगे की कथा है कि एक बार नदी के तट पर सुशीला ने कुछ महिलाओं को भगवान अनंत की पूजा करते और चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र हाथ में बांधते देखा। सुशीला ने भी वह व्रत रखकर अपने हाथ में अनंत सूत्र बांध लिया। भगवान अनंत की कृपा से सुशीला और कौडिन्य के दिन फिर गए और घर में सुख-समृद्धि आ गई। एक दिन कौडिन्य ऋषि ने अपनी पत्नी के हाथ में बंधा अनंत सूत्र देखा और अहंकारवश उसे यह कहकर तोड़ दिया कि यह सब उनके अपने पुरुषार्थ का फल है, भगवान अनंत का नहीं। कौडिन्य ऋषि के इस कथन से भगवान अनंत की कृपा उनके परिवार से हट गई। उनके परिवार में भयंकर गरीबी और दुःख आ गए। कौडिन्य ऋषि को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्हें अपने अहंकार पर पश्चाताप होने लगा। इसके बाद वे भगवान अनंत की खोज में निकल पड़े।
कौडिन्य ऋषि के जंगलों में बहुत भटकने और विलाप करने के बाद भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए और उन्हें उनकी भूल का अहसास कराया। उन्होंने ऋषि को विधि-विधान से चौदह वर्षों तक अनंत व्रत करने का उपदेश दिया। ऋषि ने वैसा ही किया और उन्हें पुनः वैभव तथा शांति प्राप्त हुई। अनंत चतुर्दशी के दिन रेशमी या सूती धागे को कुमकुम, हल्दी और केसर से रंगकर उसमें चौदह गांठें लगाई जाती हैं। हर गांठ पर भगवान विष्णु के चौदह अलग-अलग नामों जैसे अनंत, नारायण, पद्मनाभ आदि के आह्वान किए जाते हैं। यह व्रत जीवन के सभी संकटों को दूर करके सुख, शांति और अनंत समृद्धि प्रदान करता है। मनुष्य को इस व्रत की पूजा पवित्र मन और पूरी तरह विधि ध्यान से करनी चाहिए। ऐसे भक्तों पर भगवान विष्णु जी की कृपा सदैव बनी रहती है।
भगवान अनंत देव के व्रत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित है। उसमें एक कथा यह भी है कि एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी। बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे। एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रौपदी ने यह देखकर 'अंधों की संतान अंधी' कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया। यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी। उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली। उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे। उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया। पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि 'हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।'
इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक अन्य भी कथा सुनाई । आगे की कथा यह है कि प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई। पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए। कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे। सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई। कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। उन्होंने डोरे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया, इससे भगवान अनंत जी का अपमान हुआ। परिणामत: ऋषि कौंडिन्य दुखी रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई। इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कहीं। पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए। वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े।
तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले- 'हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा। तुम दुखी हुए। अब तुमने पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूं। अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। चौदह वर्षपर्यंत व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे। कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।' श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया जिसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहे थे।
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