मां कात्यायनी की भक्ति से अर्थ,धर्म,काम और मोक्ष प्राप्ति होती हैं
(4 अप्रैल, वासंतिक चैत्र नवरात्र के छठे दिन माता कात्यायनी की आराधना पर विशेष)

वासंतिक चैत्र नवरात्र के छठे दिन माता कात्यानी की उपासना का विधान है। मां कात्यानी की भक्ति से बड़ी ही सरलता से अर्थ,धर्म,काम, मोक्ष जैसे चारों दुर्लभ फलों की प्राप्ति हो जाती है। माता कात्यानी दयालु और कृपालु देवी के रूप में सुविख्यात हैं। माता कात्यायनी सदा अपने भक्तों के कल्याण के लिए अग्रसर रहती हैं । माता के इस स्वरूप के दर्शन से मनुष्य के समस्त रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं। वासंतिक नवरात्र के छठे दिन साधकों को माता के इसी स्वरूप की उपासना करनी चाहिए। माता कात्यानी की उपासना से मनुष्य इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है । उसके समस्त, रोग, शोक, भय, संताप आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं । इनके साधक माता की कृपा प्राप्त कर जन्म - जन्मांतर के पापों से मुक्त हो जाते हैं। साधकों के लिए मां की उपासना से अधिक सुगम और सरल दूसरा कोई मार्ग नहीं है । इनके उपासक निरंतर माता कात्यायनी के सानिध्य में रहकर परम पद के अधिकारी बन जाते हैं। हम सबों को मन, कर्म और वचन तीनों से शरणागत होकर माता कात्यायनी की पूजा व उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती में वर्णन है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी भी कुमाता नहीं हो सकती है । आदि शक्ति स्वरूपा दुर्गा माता इतनी दयालु और कृपालु हैं कि भक्तों के लिए स्वयं का नाम भी भक्त के नाम पर कर देने में तनिक भी संकोच नहीं करती हैं । उन्होंने अपना नाम ऋषि कात्यायन को अर्पित कर दिया था। तब से माता कात्यायनी के नाम से जानी जाने लगी थी। एक कथा के अनुसार कत नाम के एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए । इन्हीं के कात्य गोत्र में विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। ऋषि कात्यायन भगवती परामंबा के बड़े भक्त थे। उन्होंने भगवती परामंबा की बहुत ही सघन उपासना की थी। कात्यायन की इस कठिन और सघन तपस्या से प्रसन्न होकर माता परामंबा ने उन्हें दर्शन दिया । ऋषि का कात्यायन, माता परामंबा का दर्शन प्राप्त कर अभिभूत हो गए थे । माता ने उनसे उनकी इच्छा पूछी। तब ऋषि कात्यायन ने कहा कि 'माता आप मेरे यहां पुत्री रूप में जन्म लें। माता उनकी यह इच्छा सुनकर बहुत ही प्रसन्न मन से तथास्तु का आस्था आशीर्वाद अंतर्ध्यान हो गईं।
कुछ काल पश्चात कृष्ण चतुर्दशी के दिन माता, ऋषि कात्यायन के यहां पुत्री रूप में जन्म लेकर उनकी इच्छा को पूरी की थी। तब से माता कात्यायनी के नाम से जानी जाने लगी। माता शुक्ल सप्तमी,अष्टमी और नवमी तीन दिनों तक ऋषि कात्यायन की पूजा ग्रहण कर दसवीं के दिन महिषासुर नामक बलशाली राक्षस का नाश की थी। इसके साथ ही हमारे धर्म ग्रंथो में एक कथा का और भी उल्लेख मिलता है। इस कथा के अनुसार जब पृथ्वी पर महिषासुर जैसे बलशाली राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था । महिषासुर के अत्याचार से ऋषि - मुनि त्राहिमाम - त्राहिमाम कर रहे थे ।महिषासुर के आतंक से धरती हिल सी गई थी। महिषासुर खुद को ईश्वर समझना शुरू कर दिया था। पृथ्वी पर महिषासुर के आतंक से मुक्ति के लिए ऋषि मुनियों ने त्रिदेव की उपासना की थी। तब ब्रह्मा,विष्णु, महेश ने अपने-अपने अंश से माता दुर्गा को उत्पन्न किया किया था। सर्वप्रथम ऋषि कात्यायन ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अंश से उत्पन्न हुई माता दुर्गा की उपासना की थी। इसलिए माता कात्यायनी के नाम से जानी जाने लगी। माता दुर्गा, ऋषि कात्यायन की पूजा स्वीकार करने के पश्चात ही महिषासुर नामक राक्षस का नाश की थी।
इस कथा के माध्यम से भक्तों को यह समझना चाहिए कि मां अपने भक्तों के लिए खुद का नाम भक्त के नाम से रखकर मां और बेटे की दूरी को सदा सदा के लिए मिटा दी थी। जगत के सारे प्राणी जीव जंतु मां के पुत्र के ही समान है । इसलिए हर भक्त को अपनी अपनी मां पर विशेष रूप से ख्याल रखना की चाहिए । मां है, तभी बेटे का अस्तित्व है । मां के बिना बेटे का अस्तित्व हो नहीं सकता । किसी भी परिस्थिति में मां का अपमान तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए । यह एक बड़ा पाप होगा। जिसे माता कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती है। माता ऐसे पापियों को जरूर दंड देती हैं। महिषासुर नामक राक्षस भी एक मां का ही पुत्र था । लेकिन उन्होंने थोड़ी सी शक्ति प्राप्त कर स्वयं को ही ईश्वर समझने की बड़ी भूल कर बैठा था। उसका हश्र क्या हुआ ? महिषासुर को उसके पापों की सजा माता के हाथों से ही मिली थी।
देवी पुराण में वर्णन है कि माता कात्यानी अमोघ फलदायिनी देवी के रूप में जानी जाती हैं। एक कथा के अनुसार द्वापर में भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने माता कात्यानी की पूजा कालिंदी यमुना तट पर की थी। माता कात्यायनी ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यंत ही भव्य और दिव्य है । इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएं हैं। कात्यायनी माता जी दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में और नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है । इनका वाहन सिंह है।
भक्तों को चाहिए कि माता कात्यायनी के इस भव्य और दिव्य स्वरूप का बड़े ही निर्मल मन से ध्यान करना चाहिए। मन मस्तिष्क में किसी भी तरह का कोई विकार नहीं रखना चाहिए । भक्त के जीवन में जो भी कष्ट हैं, उसे खुले हृदय से मां के समक्ष कह देना चाहिए । स्वयं से जो भी पाप कर्म हुए हैं, उसे भी मां के समक्ष कह देना चाहिए । भक्त को मां से यह भी याचना करनी चाहिए कि भविष्य में ऐसे पाप से न हों,मां ऐसा आशीर्वाद दें। माता की कृपा सद उस बनी रहे, आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। अगर भक्त खुले हृदय से अपनी बातों को मां के समक्ष रखते हैं, तब कृपालु और दयालु माता उनकी हर एक बातों को बड़े ही तन्मयता के साथ सुनती हैं । माता उनकी समस्त मनोकामनाएं भी पूर्ण करती हैं।
देवी पुराण के अनुसार दुर्गा पूजा के छठे दिन माता कात्यानी की उपासना की जाती है। इसका वर्णन पूर्व में विस्तार से किया जा चुका है। इस दिन साधक का मन आजा चक्र में स्थित होता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है । इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माता कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्म दान करने वाले ऐसे भक्त को सहज भाव से माता कात्यानी के दर्शन प्राप्त होते हैं। ऐसे भक्त इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाते हैं। यहां जो आत्म दान की बात आई है, उसका अर्थ यह है कि स्वयं को पूरी तरह मां के श्री चरणों में अर्पित कर देना। इसके लिए साधक को मनसा, कर्मणा और वाचा तीनों से निर्मल होना बहुत जरूरी है। ऐसी भक्ति, शक्ति व ऊर्जा सभी साधकों में निहित है। बस जरूरत है, स्वयं के अंदर विद्यमान ऐसी भक्ति, ऊर्जा और शक्ति को जागृत करने की। जिस पल स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार हो जाएगा, तब समझ लीजिए, मां के श्री चरणों में आत्मदान हो गया है। स्वामी विवेकानंद के गुरु संत परमहंस ने मां का दर्शन किया था। यह दर्शन क्या था ? स्वयं के अंदर विद्यमान ईश्वर से स्वयं का दर्शन हो जाना।