एक कथाकार के आत्मसम्मान के रौंदे जाने की कहानी है,'छलात्कार'
कथाकार डॉ विकास कुमार की बहुचर्चित कहानी 'छलात्कार' पर समीक्षा
झारखंड के जाने-माने कथाकार डॉ विकास कुमार की एक कहानी 'छलात्कार' हिंदी साहित्यिक पत्रिका 'मधुराक्षर' के सितंबर अंक में जैसे ही प्रकाशित हुई, साहित्यकारों, कथाकारों, आलोचकों, समीक्षकों आदि के बीच चर्चा में आ गई है। यह कहानी एक नवोदित कथाकार के आत्मसम्मान के रौंदे जाने की पीड़ा पर आधारित है। अंततः छलात्कार का शिकार वह नवोदित कथाकार अपनी ही इहलीला समाप्त कर गुजरता है। उस नवोदित कथाकार के साथ छलात्कार करने वाला और कोई नहीं बल्कि उसके ही वर्ग का एक प्रतिष्ठित कथाकार है। 'छलात्कार' शीर्षक नाम से ही प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं किसी के साथ छल किया गया हो। आज तक हम सब यह सुनते आए हैं कि स्त्रियों के साथ बलात्कार की जो घटनाएं घटती हैं, बेहद विभत्स होती हैं। ऐसी वीभत्स घटना के बाद एक स्त्री को सालों लग जाती हैं, इससे उबर में । कई स्त्रियां तो मानसिक रूप से इतना टूट जाती हैं कि अपनी जान तक दे देती हैं। ऐसी ही एक दर्द भरी दास्तां कथाकार विकास कुमार ने छलात्कार नामक कहानी में दर्ज की है।
विकास कुमार ने नवोदित कथाकारों की पीड़ा को हूबहू प्रस्तुत कर कई नए प्रश्नों को साहित्यकारों के बीच खड़ा किया है। छलात्कार कहानी के मुख्य पात्र सुकुमार एक नवोदित कथाकार के रूप हिंदी साहित्य की दुनिया में कदम रखता है। वह भी अन्य प्रतिष्ठित साहित्यकारों की तरह हिंदी साहित्य की दुनिया में प्रतिष्ठित होना चाहता है। लेकिन दुर्भाग्य वश वह अपने ही वर्ग के एक प्रतिष्ठित बड़े साहित्यकार के छलात्कार से इतना मर्माहत हो जाता है कि अपनी ही इहलीला समाप्त कर बैठता है। यहां मैं यह दर्ज करना चाहता हूं कि आज जो नवोदित कथाकार है, आगे चलकर वही एक प्रतिष्ठित कथाकार के रूप में जाना जाएगा। आज हमारे बीच जो भी प्रतिष्ठित साहित्यकार व कथाकार साहित्यिक दुनिया में सम्मान पा रहे हैं, एक दिन वे भी निवेदित थे । इस सम्मान के लिए उन्हें अथक मेहनत और संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ा होगा। वे सभी अपने अपने शुरुआती दिनों में किसी न किसी साहित्यिक गुरु व मित्र से कहानी लेखन की सीख जरूरी होगी। यह समय किसी भी नवोदित कथाकार के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, ऐसे में उसे सीख देने के बजाय हतोत्साहित अथवा छल कर दिया जाए तो अंकुरण से पूर्व ही वह समाप्त हो जाएगा।
'छलात्कार' कहानी का मुख्य पात्र सुकुमार एक नवोदित कथाकार है । वह एक बड़ा कथाकार बनना चाहता है । उसकी अब तक कई कहानियां हिंदी साहित्य की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं । वह भी रांची के अन्य बड़े साहित्यकारों की श्रेणी में खुद को खड़ा करना चाहता है। वह रांची के जाने-माने साहित्यकारों से मिलता रहता है । उन सबों से अपनी कहानी पर बातचीत करता रहता है । वह रांची के जाने-माने प्रतिष्ठित साहित्यकार, कवि आलोचक आर्यभट्ट सिंह घुमक्कड़ से काफी हद तक प्रभावित होता है। वह अक्सर उनसे अपनी कहानियों के संदर्भ में उनसे बातचीत कर परामर्श लेता रहता है। इसी दौरान सुकुमार की एक कहानी हिन्दी की एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'समकालीन आर्यावर्त साहित्य' के नवीन अंक में प्रकाशित होती है। जैसे ही यह कहानी प्रकाशित होती है, चर्चा के केंद्र में आ जाती है। यह खबर आर्यभट्ट सिंह घुमक्कड़ सिंह जी के पास भी पहुंचती है। तब उन्होंने सुकुमार से कहा कि 'अब तो तुम एक प्रतिष्ठित कथाकार के रूप में स्थापित हो चुके हो। चूंकि तुम्हारी कहानी 'समकालीन आर्यावर्त साहित्य' पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है।' यह सुनकर सुकुमार बहुत गदगद हो जाता है। उसे भी अब लगने लगा कि उसकी भी पहचान होने लगी है । वह मन ही मन बहुत खुश हो गया। तभी घुमक्कड़ जी ने कहा कि 'तुम अपनी कहानी पर एक परिचर्चा करवाओ । इससे तुम्हारी कहानी और भी चर्चित होगी। तुम्हारा और भी नाम रौशन होगा।' यह सुनकर विकास कुमार ने कहा 'जी हां सर! मैं ऐसा ही करूंगा।'
सुकुमार रांची के टाउन हॉल में अपनी कहानी पर परिचर्चा करवाने के लिए तैयारी जुट गया। उसने अपनी कहानी की कई प्रतियां फोटो कॉपी करवाई । उसने शहर के जाने-माने साहित्यकारों, लेखकों,आलोचकों, समीक्षकों,प्राध्यापकों आदि के बीच वितरित किया । परिचर्चा में सम्मिलित होने वाले सभी अतिथियों के लिए नाश्ते पानी का भी बहुत ही शानदार व्यवस्था किया । सुकुमार इस घड़ी का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था कि मेरी नव प्रकाशित कहानी पर घुमक्कड़ जी सहित नगर के जाने-माने साहित्यकार, लेखक, आलोचक, समीक्षक, स्तंभकार आदि अपनी-अपनी बातें रखें ।
देखते ही देखते वह समय आ गया। रांचीके टाऊन हॉल में सुकुमार की कहानी पर होने वाली परिचर्चा की अध्यक्षता का दायित्व आर्यभट्ट सिंह सौंपा गया । परिचर्चा में शामिल कहानीकारों, साहित्यकारों, लेखकों, आलोचक ने सुकुमार की कहानी पर बहुत ही शानदार प्रतिक्रिया व्यक्त की। यह सुनकर सुकुमार मन ही मन बहुत ही आह्लादित हो रहा था । अब बारी थी आर्यभट्ट सिंह घुमक्कड़ अध्यक्षीय संबोधन की। सुकुमार की कहानी पर घुमक्कड़ अपनी क्या रखते हैं ? सुकुमार सहित सभा स्थल पर बैठे सभी लोग उनकी राय सुनने के इंतजार में थे।
अपनी चुप्पी तोड़ते हुए घुमक्कड़ जी कहा कि 'सुकुमार की कहानी पर यहां बैठे सभी साहित्यकारों, कथाकारों, समीक्षकों,आलोचकों ने अपनी-अपनी राय दे दी है। निश्चित तौर पर यह कहानी अच्छी है। मैं सुकुमार की कहानी पर कुछ अलग से बात बताना चाहता हूं' यह सुनकर सभी पीन साइलेंस हो गए । आखिर घुमक्कड़ जी सुकुमार की कहानी पर अलग से क्या बताना चाहते हैं ?
तभी घुमक्कड़ जी ने कहा की 'सुकुमार की कहानी छपने से पूर्व 'समकालीन आर्यावर्त साहित्य' के संपादक साहा जी कह रहे थे, भाई घुमक्कड़ जी क्या बताऊं आपको,... मत पूछिए। सुकुमार की कहानी पर मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी थी। एक तो कहानी हस्तलिखित थी। उसमें भी इतनी सारी अशुद्धियां कि पूछिए मत। एकबारगी तो मन किया कि इस कहानी को कचरे के डब्बे में डाल ही दें, लेकिन पढ़ने के बाद लगा कि कहानी में दम है, इसलिए छापने की जमात उठाई। पहले अशुद्धियों को शुद्ध किया, काफी कुछ प्रसंग थे, जो अनावश्यक थे, उसे हटाना पड़ा, कुछ नवीन प्रसंग जोड़ने बड़े। काफी जोड़-तोड़ करना पड़ा, तब कहीं जाकर कहानी का रूप दिया । मतलब की घुमक्कड़ जी आपको क्या बताऊं, आज तक मैंने अपने संपादकत्व काल में इतनी मेहनत नहीं की थी, जितना कि इस कहानी में करनी पड़ी।... मुझे काफी निराशा हुई, उनकी बातों को सुनकर, लेकिन बीच बचाव में मुझे भी कुछ कहना ही पड़ा, सो मैंने बीच में टोकते हुए साहा जी को कहा था, हा, सो तो है, लेकिन लड़का है, बड़ा काबिल,अपनी कल्पना से एक से एक नई कहानी लिख डालता है। फिर साहा जी भी काफी रुचि ले रहे थे, सुकुमार पर। मैंने कह दिया कि वे भी हमारे राज्य विश्वविद्यालय में ऐडहॉक पर पढ़ाते हैं। पांच सौ रूपए प्रति क्लास मिल पाता है। परमानेंट बहाली नहीं है, विसी अप्वाइंटी है । अभी तो लेखन के क्षेत्र में नया-नया ही आया है, अभी कहां से इतनी प्रगाढ़ता आएगी।'
सुकुमार इस तरह की बातें अपनी कहानी पर घुमक्कड़ जी से सुनकर हतप्रभ रह गया था। जैसे उसके शरीर में खून बचा ही न हो। जबकि घुमक्कड़ जी ने सुकुमार की कहानी के मर्म पर कुछ बोला ही नहीं । हॉल में बैठे सभी श्रोतागण भी ऐसी बातें सुनने की उम्मीद न किए थे। घुमक्कड़ जी की बातों से सुकुमार का मन मस्तिष्क पूरी तरह छलनी हो चुका था। उसके आत्म सम्मान पर एक के बाद एक घुमक्कड़ जी की गोलियां भेद रही थी। सुकुमार पूरी तरह टूट चुका था। तार तार हो चुका था। वह मन ही मन सोच रहा था कि अगर कहानी में दम नहीं थी, तो संपादक ने क्यों छापा ? क्या हस्तलिखित कहानी प्रेषित करना कोई अपराध है ? क्या वीसी अप्वाइंटी होना अपराध है ? घुमक्कड़ जी को इस तरह की बातें सार्वजनिक रूप से कहने की क्या जरूरत थी ? एक तरह से घुमक्कड़ जी ने उसकी कहानी पर परिचर्चा करवाकर उसको छलने जैसा कार्य किया है। घुमक्कड़ जी की बातों ने उसको ऐसा दर्द दिया है कि उसे कभी भूल भी नहीं सकता। उसने क्या सोच और क्या हो गया ? घुमक्कड़ जी का छल पूरी तरह उसके आत्मसम्मान के साथ छलात्कार करने के समान था। सुकुमार बिना कुछ बोले चुपचाप अपने घर आ गया। वह इस छलात्कार की पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा था। अंततः उसने पंखे से झूल कर अपनी जान दे दी। यह कहानी घुमक्कड़ जी के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। हर एक नवोदित कथाकार को घुमक्कड़ सिंह जैसे दोहरे चरित्र वाले साहित्यकारों से सावधान रहने की जरूरत है। आलोचना रचना की होनी चाहिए न कि रचनाकार के पर्सनल जीवन की।