जे.पी.के आह्वान पर गौतम सागर राणा राजनीति में प्रवेश किए थे 

(31 दिसंबर, जन नेता गौतम सागर आना के 74 वें जन्मदिन पर विशेष)

जे.पी.के आह्वान पर गौतम सागर राणा राजनीति में प्रवेश किए थे 

झारखंड अलग प्रांत के लिए प्रखर समाजवादी जन नेता गौतम सागर राणा ने  बिहार विधान सभा में जोरदार आवाज बुलंद कर पृथक झारखंड राज्य का मार्ग प्रशस्त कर एक नई पहचान निर्मित की। वे सड़क से लेकर बिहार विधानसभा तक लगातार पृथक झारखंड के लिए संघर्षरत रहे । एक और जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन झारखंड अलग प्रांत के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे, वहीं गौतम सागर राणा बिहार विधानसभा में पृथक झारखंड के औचित्य पर अपनी ही पार्टी के नेताओं से जूझ रहे थे। झारखंड अलग प्रांत निर्माण के पच्चीस वर्ष पूरे होने के बावजूद गौतम सागर राणा अब तक झारखंड विधानसभा से दूर हैं। यह पीड़ा उनसे बातचीत में साफ झलकती है। गौतम सागर राणा के इक्यावन साल के राजनीतिक जीवन में कभी भी उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। वे एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित विधानसभा सदस्य और विधान परिषद के सदस्य के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ सदा जोरदार संघर्ष करते रहे हैं। झारखंड अलग प्रांत निर्माण के बाद उनकी राजनीति झारखंड पर केंद्रित जरूर हो गई लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जल, जंगल,भूमि संरक्षण और पर्यावरण की बेहतरी के लिए के लिए लगातार संघर्ष करते रह रहे हैं।
 गौतम सागर राणा राजनीति में प्रवेश लोकनायक जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन से हुआ था। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर गौतम सागर राणा भी इस आंदोलन से जुड़ें थे।  तब वे हजारीबाग, संत कोलंबा कॉलेज के विद्यार्थी रहे ।  वे बचपन से ही शांत और सहज प्रकृति के छात्र रहे। उन्होंने एक छात्र नेता के रूप में जे.पी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 25 जून 1975 की अर्धरात्रि को संपूर्ण देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई थी ।  रातों-रात देशभर के हजारों की संख्या में बड़े और छोटे नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे।  चूंकि गौतम सागर राणा एक बड़े छात्र नेता के रूप में चर्चित हो चुके थे ।‌  उनकी गिरफ्तारी के लिए स्वयं हजारीबाग के तत्कालीन एस.पी ज्योति कुमार सिन्हा को आना पड़ा था।  गौतम सागर राणा मीसा  के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिए गए थे । इनके साथ जेल में प्रखर समाजवादी नेता स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर, स्वर्गीय उपेंद्र दास , स्वर्गीय नेहरू यादव ,अर्जुन यादव, स्वर्गीय अशोक चौरसिया, सरूप चंद जैन, स्वर्गीय काशी लाल अग्रवाल आदि चर्चित नेता हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद थे। जेल में बंद रहने के बावजूद गौतम सागर राणा की सक्रियता कम नहीं हुई थी बल्कि वे जेल में बंद अन्य नेताओं के साथ मिलकर जेल के अंदर से ही हजारीबाग के बाहर चल रहे छात्र आंदोलन को संचालित कर रहे थे। उन्होंने राजनीति का प्रथम पाठ प्रखर समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर से सीखा था। वे कर्पूरी ठाकुर की राजनीति से बहुत प्रभावित थे। जेल में रहकर ही गौतम सागर राणा समाजवाद को समझ पाए थे। आगे चलकर यही समाजवाद उनकी राजनीति का दर्पण बन गया था।
1977 में देश से इमरजेंसी समाप्त कर दिए जाने के बाद गौतम सागर राणा हजारीबाग सेंट्रल जेल से बाहर आ पाए थे । आपातकाल के बाद देश में हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी को पराजय का मुंह देखना पड़ा था । इंदिरा गांधी सत्ता से मुक्त हो गई थी ।  केन्द्र में  मोरारजी देसाई के नेतृत्व में एक नई सरकार का गठन हुआ था। 
जनता पार्टी के नेतृत्व में देशभर में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी के केंद्रीय नेताओं के आदेश पर गौतम सागर राणा,  दिल्ली हरियाणा, पंजाब, बिहार  आदि प्रांतों महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। फलस्वरूप इन्हें देश के कई राष्ट्रीय नेताओं के साथ मंच साझा करने  का अवसर प्राप्त हुआ । वे जल्द ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई ,जॉर्ज फर्नांडीज, लालकृष्ण आडवाणी,अटल बिहारी वाजपेई, शरद यादव जैसे बड़े नेताओं की नजरों में आ गए थे। गौतम सागर राणा की सक्रियता इसी तरह आगे भी बनी रही।
केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार गठन हो जाने के कुछ महीने बाद ही देश के विभिन्न प्रांतों में विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई थी।  तब झारखंड बिहार प्रांत के अंतर्गत ही था। बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही गौतम सागर राणा के भी नाम की चर्चा होने लगी थी। उस समय गौतम सागर राणा बिल्कुल नौजवान थे। राजनीति में ये सब क्या चर्चाएं हो रही है ?  उन्हें सुनकर आश्चर्य भी होता था। उन्हें जनता पार्टी की टिकट पर बगोदर विधानसभा से चुनाव लड़ने का पटना से फरमान आ गया था। छात्र नेताओं की टोलियां उनके पास पहुंच चुकी थी। पास में कोई रोजगार नहीं था । जेब खाली था । छात्र नेताओं को बगोदर जाने के लिए ना भाड़ा ना गाड़ी थी। अगर कुछ था तो अंदर का हौसला और छात्र नेताओं के जोश। उन्होंने छात्र नेताओं के सहयोग और बगोदर निवासियों के जन धन के बल पर पहली बार बगोदर विधानसभा का चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में गौतम सागर राणा भारी मतों से विजय हुए थे। तब  बिहार में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में सरकार बनी थी। 
  उन्होंने इस दौरान कई जन‌ कल्याणकारी  योजनाओं को अमलीजामा पहनाया था । उन्होंने समाज के दलित, शोषित, पीड़ितों को न्याय मिले, इस निमित्त  सरकार का ध्यान आकृष्ट किया था।  समाज के अंतिम आदमी तक विकास पहुंचे, इस निमित्त वे खुद विकास योजनाओं का मुआयना किया करते थे।  उनकी सादगी और सरलता में इमानदारी और निष्ठा छुपी हुई थी । उनसे बड़े से बड़े आईएएस अधिकारी बात करने में कतराते थे।  उन्होंने कभी भी एक रूपए का भी लेन-देन नहीं किया।  कर्पूरी ठाकुर ने  उन्हें जिन भी समितियों के सभापति के रूप में मनोनयन किया था, उन्होंने सभी समितियों के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी से काम किया । इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार की हजारों एकड़ जमीन जिस पर बाहुबलियों एवं सरकारी अधिकारियों का कब्जा था, उससे सरकारी जमीन को मुक्त कराया था ।
  केंद्र में जनता पार्टी की सरकार विघटन के पश्चात  गौतम सागर राणा, शरद यादव और कर्पूरी ठाकुर के साथ जनता पार्टी में ही रहे। बगोदर विधानसभा के दोबारा हुए चुनाव में गौतम सागर राणा विजयी हुए। वे अपने विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं को लगातार विधानसभा में उठाते रहे थे।  वे झारखंड अलग प्रांत के पक्षधर रहे हैं।  बिहार विधानसभा में लगातार झारखंड अलग प्रांत की मांग उठाते रहने के कारण उन्हें राष्ट्रीय  जनता दल के नेताओं से अलग-थलग कर दिया गया था। इस राजनीतिक विस को उन्होंने बहुत ही सहजता के साथ पिया।  उन्होंने अपने कदम को पीछे नहीं किया बल्कि झारखंड अलग प्रांत की मांग को लेकर अब तक अड़े रहे थे, जब तक कि झारखंड अलग प्रांत की घोषणा नहीं हो गई थी।
2000 में झारखंड अलग प्रांत अस्तित्व में आया था। झारखंड में बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी।  गौतम सागर राणा झारखंड एनडीए सरकार के संयोजक बनाए गए थे। एनडीए में शामिल सभी दलों  को एक करने में गौतम सागर राणा ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।  इस पद पर रहकर उन्होंने सरकारी विकास को जन जन तक पहुंचाया था । फलस्वरूप झारखंड में विकास दिखा था । तब गौतम सागर राणा जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश अध्यक्ष थे । यूनाइटेड जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने विकाश यात्रा के माध्यम से संपूर्ण झारखंड का भ्रमण किया था।  इस यात्रा को संपूर्ण राज्यवासियों का समर्थन और आशीर्वाद मिला था । इस यात्रा के दौरान उन पर पत्थल गड़ा में अंधाधुंध गोलियां भी चली थी , जिसमें वे बाल-बाल बच गए थे।  इसके बावजूद उन्होंने यात्रा को अनवरत जारी रखा था। आज देश के युवा नेताओं को गौतम सागर राणा की राजनीति से जनसेवा,सौहार्द और भाईचारा की सीख लेने की जरूरत है।