बालिका शिक्षा व समाज सुधार की नेत्री सावित्रीबाई फुले
(3 जनवरी, बालिका शिक्षा नेत्री सावित्रीबाई फुले की 195 वीं जयंती पर विशेष)
सावित्रीबाई फुले का नाम जेहन में आते ही आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व भारतीय समाज किन कुरीतियों के बीच पल कर बढ़ रहा था, उसकी तस्वीर आंखों के सामने साफ झलकने लगती है । समाज में व्याप्त जाति प्रथा, छुआछूत, भेदभाव, विधवाओं के साथ तिरस्कार के भाव आदि ऐसी कुरीतियां समाज में व्याप्त थीं, जिसके चलते समाज का विकास बिल्कुल अवरुद्ध हो चुका था। सावित्रीबाई फुले ने समाज में व्याप्त इन कुरीतियों को देखकर बहुत ही दुखी हुई थीं। उनके मन में बचपन से ही ये भाव उठ रहे थें कि समाज में व्याप्त जात पात, छुआछूत, भेदभाव को समाप्त करने के लिए जन जागरण करेगी। जब वह बड़ी हुई तब उन्होंने अपने सपने को साकार करना शुरू कर दिया था । वह बचपन से ही छुआछूत, भेदभाव, जातिवाद और बालिका शिक्षा पर अघोषित रोक का विरोध करती रही थी। लेकिन उनकी बातों को अनसुनी कर दिया जाता था।
इस कालखंड में बालिकाओं की शिक्षा पर अघोषित प्रतिबंध था। बालिकाओं का जन्म सिर्फ घर के कामकाज एवं नौ-दस साल की उम्र होने पर उसका विवाह कर दिया जाता था । फिर वह ससुराल जाकर चूल्हा -चौकी से जुड़ जाती थी। वह इस नए दायित्व को संभालते हुए बच्चों को जन्म देकर उसका पालन पोषण से जुड़ जाती थीं। यह करते हुए उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती थी। एक बालिका के क्या अरमान है ? क्या शौक हैं ? वह जीवन में क्या करना चाहती हैं ? वह क्या बनना चाहती हैं? इन तमाम इन तमाम चाहतों व अरमानों से बालिकाओं को दूर रखा जाता था। एक तरह से इस अघोषित प्रतिबंध के कारण बालिकाएं खुले समाज में एक कैदी के रूप में जीवन जीने के लिए विवश थीं।
सामाजिक कुरीतियों को जड़ से मिटाने के लिए सावित्रीबाई फुले ने जो काम कर दिखाया, उसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में जो महिलाओं की सहभागिता हुई थी, यह सब सावित्रीबाई फुले के समाज सुधार व बालिका शिक्षा आंदोलन का बड़ा हाथ था। सावित्रीबाई फुले ने बालिकाओं को आगे बढ़ाने के लिए जो शिक्षा का दरवाजा खोला था, यह अपने आप में एक मिसाल थी। कई सामाजिक प्रतिबंधों एवं समाज के विरोध के बावजूद सावित्रीबाई फुले ने अपने कदम को पीछे नहीं किया बल्कि समाज सुधार और बालिका शिक्षा को आगे बढ़ाने में अपना सब कुछ निछावर कर दिया था। उन्होंने महिलाओं के लिए पहले बालिका विद्यालय खोल कर इतिहास रच दिया था। सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। तब देश में ब्रिटिश हुकूमत थी। सामाजिक कुरीतियों ने भारतीय सोच पर ग्रहण लगा दिया था। देश में सुधारवादी आंदोलन जन्म ले रहे थे। सावित्रीबाई फुले का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई फुले का विवाह मात्र नौ वर्ष की उम्र में 1840 में ज्योतिराव फुले से हुआ था। सावित्रीबाई फुले के पति ज्योतिराव फुले भी उनके विचारों से सहमत थे। सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिराव फूले से समाज में व्याप्त इन कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकने के विचारों को रखा था। ज्योतिराव फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को उनके इस विचार को एक आंदोलन रूप देने का सलाह दिया था। अब सावित्रीबाई फुले को अपने सपने को साकार करने के लिए उनके पति ज्योतिराव फुले का समर्थन पंख मिल गया था । सावित्रीबाई फुले समाज सुधार आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक बनने का अवसर प्राप्त हुआ था । समाज सुधार एवं बालिका शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने की शिक्षा उन्हें गुरु महात्मा ज्योतिराव से प्राप्त हुई थी। महात्मा ज्योतिराव को महाराष्ट्र और भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन में एक सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में माना जाता है। उनको महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए भी जाना जाता है। ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए । गुरु ज्योतिराव सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया था। सावित्रीबाई फुले का जीवन का उद्देश्य बन गया था कि विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना।
समाज सुधार के आंदोलन में सावित्रीबाई फुले एवं पति साथ साथ स्कूल जाते थे। इस दौरान उन दोनों पर विरोध स्वरूप कई लोग पत्थर फेंक कर मारा करते थे। कई बार उन दोनों पर पत्थर से गंभीर चोटें भी आई थी । यहां तक कि उन दोनों पर गंदगी भी फेंके जाते थे। वे दोनों चुपचाप समाज के इस तिरस्कार को सहते रहे और स्कूल में बालिकाओं को पढ़ाते भी रहे थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। आज से लगभग दो सौ साल पहले बालिकाओं के लिए स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था ।
जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं, तो वह एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। समाज के इस तिरस्कार से कभी घबराई नहीं बल्कि इसी तिरस्कार से ही प्रेरणा लेकर सदैव गतिशील बनी रही थी। वह जानती थी कि तिरस्कार करने वाले हमारे ही समाज के लोग हैं। अगर उसका जवाब तिरस्कार से दिया जाए तो दूरियां और बढ़ेंगी। इसलिए उन्होंने उस तिरस्कार को अपना सम्मान ही समझा था। उन्होंने 5 सितंबर 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की सिर्फ नौ छात्राओं लेकर महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष के दरमियान ही सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नए विद्यालय खोलने में सफल हुए थे । तत्कालीन सरकार ने इस कार्य के लिए उन दोनों को सम्मानित भी किया। यह समझा जा सकता है कि एक महिला प्रिंसिपल के लिए सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा। इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया था । सावित्रीबाई फुले के इस अवदान को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है । आज जो देश भर की लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, उसके पीछे सावित्रीबाई फुले के बालिका शिक्षा आंदोलन का जबरदस्त हाथ रहा है। आज सावित्रीबाई फुले हमारे बीच नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने जो राह दिखाई, उस पथ पर आज आधुनिक भारत की लड़कियां आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। आज भारत की लड़कियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति अर्जित कर रही है।
सामाजिक सेवा करते हुए 10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया था। सन 18 97 में देशभर में प्लेग महामारी फैल गई थी। इस महामारी से देश भर में लाखों लोग मरे थे। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीजों की सेवा बढ़ चढ़कर थीं। प्लेग के मरीजों की सेवा करते हुए उन्हें भी प्लेग हो गया था । मात्र 67 वर्ष की उम्र में जान तक गंवानी पड़ी थी। सावित्रीबाई फुले का संपूर्ण जीवन समाज सुधार और बालिका शिक्षा को जन-जन तक फैलाने में बीता था। आज की बदली परिस्थितियों में जब भारत एक आधुनिक भारत के रूप में तब्दील हो चुका है। भारत विश्व गुरु की ओर कदम बढ़ा चुका है। इसके पीछे सावित्रीबाई पुणे के सामाज सुधार आंदोलन और बालिका शिक्षा आंदोलन के अवदान को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता है। हम सब सावित्रीबाई फुले के बताएं मार्ग पर चलकर सामाजिक में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों को जड़ से खत्म करने में महती भूमिका प्रदान करें । यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।