बच्चन जी का संपूर्ण जीवन हिंदी कविता को समर्पित रहा था
(18 जनवरी, प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन की 23 वीं पुण्यतिथि पर विशेष)
देश के लब्ध प्रतिष्ठित प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन जी का संपूर्ण जीवन हिंदी काव्य लेखन को समर्पित रहा था । उन्होंने गद्य और पद्य और दोनों विधाओं पर काम किया, किंतु उन्हें प्रसिद्धि एक कवि के रूप में ही अधिक मिली । उनकी कविता की पंक्तियां संवाद की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती रही हैं । उनकी पंक्तियां लोगों से सीधे तौर पर संवाद करती नजर आती हैं। उनका काव्य लेखन का संसार बहुत ही विस्तृत है। उनकी सभी कृतियां अपने आप में बेमिसाल है। उनकी तमाम कृतियों में मधुशाला एक ऐसी कृति के रूप में उभर कर सामने आई, जिसने जिसने भाषा साहित्य को समृद्ध करते हुए, उन्हें भी काफी लोकप्रिय बना दिया। देश भर में आयोजित होने वाले पुस्तक मेलों में हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करती रहती है। देश भर में कहीं न कहीं मधुशाला पर गोश्तियां आयोजित होती रहती हैं । हरिवंश राय बच्चन के पुत्र फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन ने मधुशाला को अपना स्वर प्रदान कर उक्त कृति को और भी जन-जन तक पहुंच दिया। हरिवंश राय बच्चन देश के एक ऐसे कई रहें, जो लंबे समय तक इस धरा पर रहें। उन्होंने बहुत ही इत्मीनान के साथ काव्य लेखन किया। उन्होंने कविता लेखन के क्षेत्र में कोई हड़बड़ी दिखाई नहीं बल्कि बहुत ही धैर्य, सूझबूझ और ज्ञान के साथ कविता की पंक्तियों को कागज के पन्नों पर उकेरा।
वे हिंदी भाषा के एक कवि और लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे थे। वे हिन्दी कविता के उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक थे । उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति मधुशाला सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी काफी लोकप्रिय हुआ मधुशाला का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ मधुशाला है। भारतीय फिल्म उद्योग के अभिनेता अमिताभ बच्चन उनके सुपुत्र हैं। हरिवंश राय बच्चन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी का अध्यापन किया। उन्होंने अंग्रेजी में उच्चत्तर शिक्षा हासिल जरूर की थी किंतु बाल कल से ही उनका हिंदी से लगाव रहा था । उनका यह लगाव जीवन के अंतिम क्षणों तक बना रहा था । इसी लगाव कारण उन्हें भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के रूप में मनोनीत किया गया था।वे राज्य सभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। बच्चन जी की गिनती हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में होती है।
हरिवंश राय बच्चन जी का जन्म 27 नवम्बर 1907 को प्रयागराज के एक
कायस्थ परिवार में हुआ था। हरिवंश राय बच्चन के पूर्वज मूलरूप से अमोढ़ा, उत्तर प्रदेश के निवासी थे। यह एक कायस्थ परिवार था। कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ कर प्रयाग जा बसे थे। इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। इनको बाल काल में 'बच्चन' कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ 'बच्चा' या 'संतान' होता है। बाद में ये इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने कायस्थ पाठशाला में पहले उर्दू और फिर हिंदी की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के विख्यात कवि डब्लू.बी.यीट्स की कविताओं पर शोध कर पीएचड पूरी की थी । , 1926 में उन्नीस वर्ष की उम्र में उनका विवाह श्यामा बच्चन से हुआ जो उस समय 14 वर्ष की थीं। सन 1936 में टीबी के कारण श्यामा की मृत्यु हो गई। पांच साल बाद 1941 में बच्चन ने एक पंजाबन तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। इसी समय उन्होंने 'नीड़ का निर्माण फिर' जैसी कविताओं की रचना की थी।
हरिवंश राय बच्चन का कविता संसार बहुत ही विस्तृत है। उनका पहला कविता संग्रह तेरा हार 1929 में प्रकाशित हुआ था । इस संग्रह के प्रकाशन के साथ ही वे देश के जाने-माने कवियों की पंक्ति में खड़े हो गए थे । उनका दूसरा कविता संग्रह मधुशाला 1935, मधुबाला 1936, मधुकलश 1937, आत्म परिचय 1937, निशा निमंत्रण 1938, एकांत संगीत 1939, आकुल अंतर 1943, सतरंगिनी 1945, हलाहल 1946,
बंगाल का काल 1946, खादी के फूल 1948, सूत की माला 1948, मिलन यामिनी 1950, प्रणय पत्रिका 1955, धार के इधर-उधर 1957,
आरती और अंगारे 1958, बुद्ध और नाचघर 1958, त्रिभंगिमा 1961, चार खेमे चौंसठ खूंटे 1962, दो चट्टानें 1965, बहुत दिन बीते 1967,
कटती प्रतिमाओं की आवाज़ 1968, उभरते प्रतिमानों के रूप 1969,
जाल समेटा 1973, नई से नई-पुरानी से पुरानी 1985 आदि का प्रकाशन हुआ था।
इसके साथ ही उन्होंने गद्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने आत्मकथा के तौर पर क्या भूलूँ क्या याद करूँ 1969 में लिखा। यह पुस्तक काफी लोकप्रिय हुआ। इसके अलावा उन्होंने नीड़ का निर्माण फिर 1970, बसेरे से दूर 1977, दशद्वार से सोपान तक 1985, प्रवासी की डायरी, बच्चन के साथ क्षण भर 1934,खय्याम की मधुशाला 1938
सोपान 1953, मैकबेथ 1957, जनगीता 1958,ओथेलो 1959, उमर खय्याम की रुबाइयाँ 1959, कवियों में सौम्य संत: पंत 1960 आज के लोकप्रिय हिन्दी कवि: सुमित्रानंदन पंत 1960, आधुनिक कवि 1961,
नेहरू: राजनैतिक जीवनचरित 1961 , नये पुराने झरोखे 1962, अभिनव सोपान 1964, चौंसठ रूसी कविताएँ 1964, नागर गीता 1966, बच्चन के लोकप्रिय गीत 1967, डब्लू बी यीट्स एंड अकल्टिज़म 1968,मरकत द्वीप का स्वर 1968 हैमलेट 1969, भाषा अपनी भाव पराये 1970, पंत के सौ पत्र 1970, प्रवास की डायरी 1971, किंग लियर 1972, टूटी छूटी कड़ियां 1973 में आदि पुस्तकों का प्रकाशन कर हिंदी साहित्य को मिलोममाल कर दिया था।
बच्चन की एक बहुत ही कृति दो चट्टानें को 1968 में हिन्दी कविता के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बिड़ला फाउण्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान दिया था। बच्चन को भारत सरकार द्वारा 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। हरिवंश राय बच्चन पर अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं। इनमें उनपर हुए शोध, आलोचना एवं रचनावली शामिल हैं। बच्चन रचनावली 1983 में नौ खण्डों में प्रकाशित हुआ था। इस रचनावली का संपादन अजितकुमार ने किया । इसके अलावा उन पर कई उल्लेखनीय पुस्तकें लिखं गईं । बिशन टंडन ने हरिवंशराय बच्चन और अजीत कुमार गुरुवर बच्चन से दूर नामक पुस्तक लिखकर उन्हें प्रतिष्ठित किया।
हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' की पंक्तियाँ जीवन, प्रेम और दर्शन का अद्भुत संगम हैं, जिनमें 'मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला', 'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला', और 'पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला' जैसी पंक्तियाँ प्रसिद्ध हैं, जो जीवन के अनुभवों को मदिरा, प्याला और मधुशाला के प्रतीकों के माध्यम से दर्शाती हैं।
हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला की कुछ पंक्तियां दर्ज कर उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं । मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, किस पथ से जाऊँ, असमंजस में है वो भोला-भाला। अलग-अलग पथ बतलाते सब,पर मैं यह बतलाता हूँ,राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला। भावुकता अंगूर-लता से खींच कल्पना की हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला।पहले भोग लगा लूँ तेरा, फिर प्रसाद जग पाएगा,सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला। प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला।
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला। बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला, रहे पैरथा अविरत गति से मधु के प्यालों की माला। मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूँ, मंदिर हो यह मधुशाला। कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला। अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला। जीवन के अनुभव, सुख-दुःख, प्रेम और संघर्ष का सारा।