सनातन धर्म के रक्षार्थ गुरु तेग बहादुर ने अपनी शहादत दी थी
( 24 नवंबर, गुरु तेग बहादुर के 350 वां बलिदान दिवस पर विशेष)
सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर ने हिंदू धर्म की रक्षार्थ अपनी शहादत देकर वीरता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया था । उन्होंने सर कलम करना मंजूर किया, लेकिन धर्म परिवर्तन की बात अस्वीकार कर दिया था । उन्होंने हिंदू धर्म को बचाने के लिए जो कुर्बानी दी थी, इस कुर्बानी पर सदा देशवासियों को गर्व रहेगा। उनकी कुर्बानी से औरंगज़ेब की हुकूमत हिल गई थी। उनकी कुर्बानी ने संपूर्ण हिन्दुओं में एक नव जागृति फूंक दी थी।आगे चलकर यही जागृति दिल्ली सल्तनत से मुगलों को हटाकर ही दम लिया था । गुरु तेग बहादुर के पुत्र सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह भी आजीवन हिंदू धर्म की रक्षार्थ औरंगजेब से लड़ते रहे थे । उन्होंने भी कुर्बानी देकर हिंदू धर्म के ध्वज को गिरने नहीं दिया था। हिंदू धर्म की रक्षा में उनका पूरा परिवार शहादत देखकर भारत माता के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की थी। वीरता और बलिदान का ऐसा इतिहास, विश्व इतिहास में दूसरा नहीं मिलता है।
आज जम्मू कश्मीर में जो खून खराबा देखने को मिल रहा है। आतंकवाद की घटनाएं बराबर घटती रहती है। इसकी शुरुआत आक्रांता औरंगजेब ने की थी। क्रूर शासक औरंगजेब के शासनकाल में कश्मीर में रह रहे भोले भाले ब्राह्मणों और केसर व्यापार से जुड़े केसर वानियों पर औरंगज़ेब के सिपाहियों ने बा जबरदस्ती धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला था। धर्म नहीं परिवर्तन करने वाले लाखों ब्राह्मणों और केसर वानियों के सर कलम कर दिए गए थे। औरंगजेब के सिपाहियों का आतंक इतना बढ़ गया था कि उन सबों को कश्मीर छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था। लाखों की संख्या में ब्राह्मण और केसरवानी परिवार अपनी जान बचाकर देश के विभिन्न हिस्सों में एक शरणार्थी के रूप में जीवन गुजारने के लिए मजबूर हो गए थे । जम्मू कश्मीर के अलावा भी देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रांत औरंगजेब का क्रूरता बढ़ता चला जा रहा था। उनके सिपाही बार-बार हिंदुओं पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाल रहे थे। धर्म परिवर्तन नहीं करने वाले हिंदुओं को तरह-तरह के कष्ट दिए जा रहे थे । उन्हें कोड़ों से पीटा जा रहा था। उनके सर कलम कर दिए जा रहे थे।
औरंगजेब की इस क्रूरता के खिलाफ कश्मीर सहित देश विभिन्न हिस्सों के सैकड़ो हिन्दू परिवारों ने गुरु तेग बहादुर के समक्ष इस बात को रखा । उनकी बातों को सुनकर गुरु तेग बहादुर ने यह निर्णय लिया कि औरंगज़ेब की क्रूरता का जवाब देना ही होगा। वहीं पर बालक गुरु गोविंद सिंह जी बैठे हुए थे । उन्होंने भी यही कहा कि 'पिता श्री ! आप से बेहतर और कौन औरंगज़ेब से मुकाबला कर सकता है ? अपनी शहादत दे सकता है ? तब गुरु तेग बहादुर ने खुले रूप से औरंगजेब को इसकी चुनौती दी । उन्होंने तत्काल धर्म परिवर्तन को रोकने और मुकाबला करने की चुनौती दे डाली। जब यह सूचना आक्रांता औरंगजेब तक पहुंची तब उन्होंने अपने सिपाहियों से गुरु तेग बहादुर को पकड़वा कर उन पर भी धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला गया। तब गुरु तेग बहादुर ने कहा कि 'शीश कटा सकते हैं, केश नहीं।' यानी की प्राणों का बलिदान देना पड़े तो दे सकते हैं ।अपने धर्म का परिवर्तन नहीं करेंगे।
गुरु तेग बहादुर की ऐसी बात सुनकर औरंगज़ेब और बौखला गया और उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर अपने जल्लाद जलाल जलालुद्दीन को सर कलम करने का आदेश दे दिया। यह फरमान सुनकर गुरु तेग बहादुर तनिक भी विचलित नहीं हुई बल्कि उनके चेहरे पर शौर्य की आभा और तेज हो गई। उन्होंने औरंगज़ेब की इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया। उस वक्त गुरु गोविंद सिंह जी की उम्र मात्र चौवन वर्ष की थी। औरंगज़ेब यह क्रूर फरमान आग की तरह संपूर्ण देश में फैल गया। औरंगज़ेब के शासन के खिलाफ देश भर के हिंदुओं में एक आग की चिंगारी जरूर जल उठी थी, लेकिन आक्रांत औरंगज़ेब के तानाशाही शासन के कारण चिंगारी शोला नहीं बन पाई थी। 24 नवंबर, सन 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक पर औरंगजेब के जल्लाद जलाल जलालुद्दीन ने एक महान संत गुरु तेग बहादुर का सर कलम कर दिया था। तलवार जब उनके गर्दन तक पहुंची थी, तब भी गुरु तेग बहादुर की आंखों के पलकें गिरी नहीं थी बल्कि उन्होंने हिंदू धर्म की रक्षा अपनी शहादत को सहर्ष होने दिया था।
एक महान संत गुरु तेग बहादुर जी का संपूर्ण जीवन पीड़ित मानवता की सेवा, मनुष्य में मनुष्यता के जागरण और हिंदू धर्म की रक्षण बीता था। ऐसे महान संत पर जिस रूप में आक्रांत औरंगजेब ने सर कलम करवा कर उनकी आवाज को बंद कर देने का प्रयास किया था। यह औरंगजेब की बड़ी भूल थी। सर कलम कर हिंदू धर्म को कदापि मिटाया नहीं जा सकता। हिंदू धर्म भारत की सनातन संस्कृति है । इस सनातन संस्कृति को कभी मिटाई नहीं जा सकती है । यह भारत की सनातन संस्कृति की ही देन थी कि गुरु तेग बहादुर ने सर कटा लिया, लेकिन हिंदू धर्म पर आंच आने नहीं दिया ।
गुरु तेग बहादुर जी के शहादत के बाद उनके एक शिष्य ने उनकी मृत्यु को मुगलों के चंगुल से निकलकर रकाबगंज साहिब में उनका अंतिम संस्कार सनातन संस्कृति से संपन्न किया। उनका शरीर अग्नि में जरूर समाहित हो गया, लेकिन उसकी चिंगारी करोड़ों सनातन संस्कृति के धर्मावलंबियों के बीच आज भी धधक रही है। इतिहास साक्षी है कि भारत की सनातन संस्कृति पर बीते दो हजार वर्षों से हमले होते रहें, लेकिन भारत की सनातन संस्कृति की लौ सदा जलती रही। इन हमलों से सनातन संस्कृति और भी निखरकर सामने आई है। गुरु तेग बहादुर की यह कुर्बानी देश के पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण में रहने वाले तमाम हिंदुओं को एक सूत्र में बांधने का काम किया था। आज संपूर्ण देश से हजारों की संख्या में प्रतिदिन सिख और हिंदू धर्मावलंबी शीशगंज गुरुद्वारा माथा टेकने के लिए आते हैं और राष्ट्र की एकता और अखंडता की सीख लेकर जाते हैं । वहीं रकाबगंज साहिब में भी हर रोज हजारों की संख्या में सिख और हिंदू धर्मावलंबी भी माथा टेकने के लिए आते हैं और गुरु तेग बहादुर की शहादत से मातृभूमि की रक्षा का सीख लेकर जाते हैं।
ऐसे महान संत गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 21 अप्रैल 1621 को हुआ था। उनके माता-पिता ने उनका नाम त्याग मल रखा था। उनके माता-पिता द्वारा रखे उनके नाम के अनुरूप उन्होंने त्याग का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया कि संपूर्ण देशवासियों को सदैव गौरवान्वित करता रहेगा। गुरु तेग बहादुर सिखों के नौवें गुरु थे। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धान्त की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। गुरु तेग बहादुर सिंहजी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए बलिदान था। धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था। इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों के लिए उनका बलि चढ़ जाना वस्तुतः सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में एक परम साहसिक अभियान था।आततायी आक्रांता औरंगज़ेब के धर्म विरोधी और वैचारिक स्वतन्त्रता का दमन करने वाली नीतियों के विरुद्ध गुरु तेग बहादुरजी का बलिदान एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना थी। यह गुरुजी के निर्भय आचरण, धार्मिक अडिगता और नैतिक उदारता का उच्चतम उदाहरण था। गुरुजी मानवीय धर्म एवं वैचारिक स्वतन्त्रता के लिए अपनी महान शहादत देने वाले एक क्रान्तिकारी युग पुरुष थे।
गुरु तेग बहादुर जी ने आजीवन धर्म के सत्य ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं लोक कल्याणकारी कार्य के लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। वे लोगों को संयम तथा सहज मार्ग का पाठ पढ़ाते थे। उन्होंने कड़ा मानकपुर पहुंच कर साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया था। गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा लिखित 115 भजनों को पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित किया गया था। वे एक महान संत के साथ राष्ट्र और सनातन संस्कृति के रक्षक थे। उनके जीवन से समस्त देशवासियों को मनुष्यता और साथ सनातन संस्कृति की सीख लेनी चाहिए ।