श्रद्धांजलि - आखिर “ही मैन” धर्मेंद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया
मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन नायक, ही मैन की उपाधि से अलंकृत धर्मेंद्र ने आखिर दुनिया को अलविदा कह ही दिया। उनका संपूर्ण जीवन मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को समर्पित रहा था। उनका फिल्मी करियर बहुत ही लंबा रहा। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के तीन पीढ़ियों के साथ काम कर अपने बेहतरीन अदाकारी का परिचय दिया था । वे जीवन के अंतिम क्षणों तक फिल्मों से जुड़े रहे थे । उनका शरीर फिल्मों में काम करने के लिए तैयार नहीं था, लेकिन उनका मन हमेशा फिल्मों में काम करने के लिए गतिशील रह करता था। उसके निधन से देश ने एक बेहतरीन फिल्मी नायक को खो दिया। वे जितने बेहतरीन कलाकार थे, उतने ही अच्छे व्यक्ति थे। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों बेमिसाल था । उनकी सहजता और सरलता सदैव लोगों को आकर्षित करता रहेगा । वे अपने फैंस को बहुत ही सम्मान के साथ मिला करते थे । इतने बड़े कलाकार होने के बावजूद उनमें रत्ती भर घमंड नहीं था। उन्हें जब भी लोगों ने देखा, खुश मूड में ही देखा। वे विपरीत परिस्थितियों में भी गुस्सा नहीं करते थे। उन्हें शेरो शायरी सुनना और कहना बहुत पसंद था। उन्होंने अपने कई इंटरव्यू में अपनी बातों को शायराना अंदाज में रखा था। इतनी उम्र होने के बावजूद उन्होंने अपने बचपन को कभी खोया नहीं। वे मृत्यु से पूर्व तक एक बच्चे की ही तरह निश्छल जीवन जिए । वे अपने बच्चों और पोतों से बहुत प्रेम करते थे। वे अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ बहुत ही आनंद के साथ समय बिताया करते थे ।
पन्द्रह दिन पूर्व ही सांस की बीमारी के लेकर उन्हें मुंबई के ब्रिज कैंडी अस्पताल में भर्ती किया गया था। वे लगभग दस दिनों तक वेंटिलेटर में थे । उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामनाएं पूरे देश में हो रही थी । इसी दौरान उनकी मृत्यु की झूठी खबर सोशल मीडिया में फैल गई थी । यह खबर उनके चाहने वालों को बहुत ही मर्माहत किया था। इस झूठी खबर से धर्मेंद्र जी का पूरा परिवार भी दुःखी हुआ था। ईश्वर की कृपा से धर्मेंद्र जी स्वस्थ होकर अपने घर आ गए, किंतु बढ़ती उम्र की बीमारी से मुक्त नहीं हुए थे। वे अस्पताल से अपना घर मुस्कुराते हुए आए। जैसे ही यह खबर लोगों तक पहुंची, सभी खुश हुए । वहीं दूसरी ओर उनकी लंबी उम्र की दुआएं होने लगी। लेकिन यह किसे पता था कि दो-तीन दिनों के बाद ही ही मैन धर्मेंद्र हम सबों से हमेशा हमेशा के लिए रुखसत हो जाएंगे। लेकिन मृत्यु हो तो अटल है, जिसका जन्म हुआ है,उसे एक दिन जाना ही होगा।
धर्मेंद्र जी पूरा नाम धरम सिंह देओल है। लेकिन देश - दुनिया उनको धर्मेंद्र के नाम से ही जानते रहें। वे एक भारतीय अभिनेता साथ एक सफल फिल्म निर्माता भी थे। उन्होंने राजनीति में कदम भी रखा था। वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर 15 वीं लोकसभा में बीकानेर निर्वाचन क्षेत्र के सांसद भी रहे थे। किंतु राजनीति उन्हें रास नहीं आई। फिर वे फिल्मों में ही जमे रहे । उनका जन्म 8 दिसंबर, 1935 को पंजाब के लुधियाना जिले के सहने वाल गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा फगवाड़ा के लालटन कलां से पूरी की थी। बाद में उन्होंने सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लालटन कलां में पढ़ाई की थी। उन्होंने लगभग तीन सौ से अधिक फिल्मों में काम किया था। 2012 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण सम्मान सम्मानित किया था। 1997 में, उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । इसके साथ ही उन्हें कई राष्ट्रीय फिल्म सम्मान सम्मानित किया गया था।
धर्मेंद्र बचपन से ही एक कलाकार थे। वे फिल्मों में अभिनय करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अभिनय की चाह लिए फिल्मफेयर द्वारा आयोजित एक टैलेंट प्रतियोगिता जीती थी। इस जीत के बाद वे बाद मुंबई चले आए और फिर यहीं के होकर रह गए। उन्होंने 1960 और 70 के दशक में एक प्रमुख सितारे के रूप में फिल्मी दुनिया में अपना नाम बनाया और विभिन्न प्रकार की भूमिकाएं निभाईं थी। वे कैमरा के सामने हर किरदार को बखूबी निभाते थे । वे सीधे किरदार में घुस जाया करते थे । उनकी इस आदाकारी पर निर्माता निर्देशक फिदा रहते थे। उन्होंने 'फूल और पत्थर', 'मेरा गांव मेरा देश', 'शोले', 'सत्यकाम' और 'चुपके चुपके' जैसी कई सफल फिल्मों में काम कर काफी शोहरत हासिल किया था। फिल्म शोले में वीरू की भूमिका आज भी लोगों के सामने आ जाती है। उन्होंने इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ एक बेस्ट दोस्त की यादगार भूमिका निभाई थी।
उन्होंने मीना कुमारी, माला सिन्हा और नूतन जैसी अभिनेत्रियों के साथ कई हिट फिल्मों में काम किया था। उन्होंने फिल्मों में काम करने के कई फिल्मों का निर्माण भी किया था। इसके साथ ही उन्होंने कई पंजाबी फिल्मों में भी काम किया था। 2011 में 'डबल दी ट्रबल' से पंजाबी सिनेमा में वापसी की थी। उनकी पहली शादी प्रकाश कौर से हुई थी, जिनसे उनके दो बेटे, सनी देओल और बॉबी देओल हैं, जो अभिनेता हैं। 1979 में उन्होंने दूसरी शादी अभिनेत्री हेमा मालिनी से शादी की थी। उनसे भी उन्हें दो बेटियां हैं।
उन्होंने अपने दोनों बेटों को फिल्मों में शानदार तरीके लॉन्च किया था ।1983 में बेताब नामक फिल्म में सनी देओल और 1995 में बरसात नामक फिल्म में बॉबी देओल के साथ-साथ सोचा ना था । यह दोनों फिल्में बॉक्स ऑफिस में सुपरहिट हुई थी। 2005 में अपने भतीजे अभय देओल। वह सत्यकम , 1969 और कब क्यूं और कहां, 1970, जैसी फिल्मों के प्रस्तुतकर्ता थे। अपने एक साक्षात्कार में, अभिनेत्री प्रीति जिंटा को यह कहते हुए उद्धृत किया कि धर्मेंद्र उनके पसंदीदा अभिनेता हैं।
वे पहली बार अपने दोनों बेटों सनी और बॉबी के साथ दिखाई देते हैं। उनकी दूसरी रिलीज़ फिल्म जॉनी गद्दार थी। 2011 में, उन्होंने अपने बेटों के साथ यमला पगला दीवाना में फिर से अभिनय किया, जो 14 जनवरी 2011 को रिलीज़ हुई थी। एक सीक्वल, यमला पगला दीवाना 2, 2013 में रिलीज़ हुई थी। वे अपनी बेटी ईशा देओल के साथ 2011 में अपनी पत्नी हेमा मालिनी के निर्देशन में बनी फिल्म, टेल मी ओ खुदा में दिखाई दिए। 2014 में, उन्होंने पंजाबी में दोहरी भूमिका निभाई। फिल्म, डबल दी ट्रबल।
2011 में, धर्मेंद्र ने लोकप्रिय रियलिटी शो इंडियाज गॉट टैलेंट की तीसरी श्रृंखला के पुरुष जज के रूप में साजिद खान की जगह ली। 2011 को, इंडियाज गॉट टैलेंट ने धर्मेंद्र के साथ नए जज के रूप में कलर्स पर प्रसारित किया और पिछले दो सीज़न की शुरुआती रेटिंग को पार कर गया। 1983 में, धर्मेंद्र ने एक प्रोडक्शन कंपनी की स्थापना की जिसे विजयता फिल्म्स के नाम से जाना जाता है। 1983 में रिलीज़ हुई अपने पहले उद्यम बेताब में, विजयता फिल्म्स ने मुख्य अभिनेता के रूप में सनी देओल को लॉन्च किया। यह फिल्म साल की दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। 1990 में उन्होंने एक्शन फिल्म घायल का निर्माण किया, जिसमें सनी ने भी अभिनय किया। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार सहित सात फिल्मफेयर पुरस्कार जीते थे ।
धर्मेंद्र का फिल्मी जीवन बहुत ही शानदार रहा। उनका व्यक्तिगत जीवन भी बहुत ही मधुर रहा। दो-दो शादियां करने के बावजूद उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को बहुत ही सम्मान के साथ रखा। दोनों से उत्पन्न बच्चे भी अपने पिता को उसी तरह चाहते रहे हैं। वे जिस तरह पर्दे पर एक सफल लायक थे, वास्तविक जीवन में भी उनका नायकत्व बना रहा था। फिल्मों में रहने के बावजूद वे सदा विवादों से दूर रहे थे। वे हमेशा संतुलित बातों को रखते थे । उन्होंने कभी कोई ऐसी बात नहीं कही, जिससे सामने वाले को तकलीफ हो,विवाद उत्पन्न हो। उनका यह नायकत्व जीवन की अंतिम क्षणों तक बना रहा था।