इंदिरा गांधी : भारतीय राजनीति में स्त्री-नवजागरण 

(19 नवंबर, देश की पहली महिला पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 108 वीं जयंती पर विशेष)

इंदिरा गांधी : भारतीय राजनीति में स्त्री-नवजागरण 

देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनने का  इंदिरा गांधी को  सौभाग्य प्राप्त हुआ था । भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अपने दादा मोतीलाल नेहरू से प्रेरणा प्राप्त कर एक बालिक सैनिक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनकी इस भूमिका की बेहद तारीफ की थी । देश की आजादी के बाद उन्हें अपने पिता देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सांनिध्य रहकर  राजनीति सीखने का अवसर प्राप्त हुआ था।उनके ही  अपने पिता के  प्रधानमंत्रित्व  कार्यकाल में साथ कई देशों का दौरा करने का भी अवसर प्राप्त हुआ  था।  फलस्वरुप उन्हें विदेश की राजनीतिक समझ बहुत ही कम उम्र में आ गई थी। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर  यह समझ  बहुत काम आई थी।‌

देश की वीरांगनाओं द्वारा नारी नवजागरण को नई गति मिली 

भारत में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर स्त्री नवजागरण की दिशा में एक सार्थक पहल कहा जाता है। चूंकि भारत में वर्षों  से पर्दा प्रथा चली आ रही थी। ज्यादातर स्त्रियों को चूल्हा चौकी तक ही सीमित रखा जाता था । इस  कारण समाज का लड़कियों की शिक्षा पर ज्यादा जोर नहीं हुआ करता था। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर भारतीय महिलाओं के बीच एक नवजागरण का शव अंकुरण हुआ, जो बाद के कालखंड में इसका बहुत तेजी से विस्तार हुआ। आज भारत की राजनीति में भारतीय महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। नारी वंदन अधिनियम भी वर्तमान सरकार द्वारा पारित कर दिया गया है । यह सब नारी नव जागरण की एक कड़ी है। जिसकी शुरुआत आजादी से पहले हमारे देश की कई वीरांगनाओं ने शुरू किया था। इंदिरा गांधी ने देश की वीरांगनाओं द्वारा नारी  नवजागरण की दिशा में शुरू किए गए आंदोलन को एक नई गति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।

व्यक्तिगत जीवन विवादों से भरा रहा 

इंदिरा गांधी का जीवन बहुत ही विवादों से भरा रहा था । लेकिन उन्होंने अपने निजी जीवन को कभी अपने प्रधानमंत्रित्व  कार्यकाल पर हावी होने नहीं दिया बल्कि एक आयरन लेडी की तरह आगे बढ़ती रही थीं। देश के विपक्षी नेता गण उन पर सदैव तानाशाह होने का आरोप लगाते रहे थे।  इंदिरा गांधी अपनी सत्ता बचाने के लिए 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लगा दी थी। इमरजेंसी लगाने का कलंक सदा उनके माथे पर लगा रहा। इन तमाम विरोधाभासों के बीच देश की जनता ने एक बार फिर उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अवसर प्रदान किया था।  इंदिरा गांधी जन्म 19 नवंबर 1917 एवं 31 अक्टूबर 1984 के दिन उनके अंगरक्षक ने ही उनकी न्यूनतम हत्या कर दी थी। वह  1966  से 1977 तक लगातार तीन पारी के लिए भारत गणराज्य की प्रधानमंत्री रही थी उसके बाद इंदिरा गांधी चौथी पारी में 1980 से लेकर 1984  में उनकी राजनैतिक हत्या तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। 

पाकिस्तान के षड्यंत्र को विफल कर शिकस्त दी 

ध्यातव्य है कि पाकिस्तान अलग देश निर्माण के बाद ही भारत के खिलाफ षड्यंत्र  रचता रह रहा था । आजादी के तुरंत बाद उसने भारत के विरुद्ध आक्रमण बोल दिया था । जम्मू कश्मीर को हथियाने ने के लिए पाकिस्तान ने भीषण युद्ध की शुरुआत कर दी थी।  लेकिन तत्कालीन देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व में उस युद्ध में  पाकिस्तान को परास्त कर दिया गया था । इस हार के बावजूद पाकिस्तान सदैव भारत के खिलाफ षड्यंत्र रचता रहा था।‌ इसलिए जरूरी हो गया था, पाकिस्तान को कमजोर करना।  इस दिशा में इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व तो काल में पाकिस्तान को दो देशों में विभक्त में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसा कर उन्होंने पाकिस्तान की ताकत को कमजोर कर दी । ऐसा कर उन्होंने विश्व स्तर पर एक कूटनीतिक जीत दर्ज की थी। उनका राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  नाम हुआ था.

बांग्लादेश निर्माण के साथ 1971 के युद्ध में विजय हासिल की 

सर्व विदित है कि  बांग्लादेश के निर्माण में इंदिरा गांधी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी । जिसमें उन्हें सैन्य कार्रवाई के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, मानवीय सहायता, और कूटनीतिक दबावों का सामना करना शामिल था। उन्होंने मुक्ति वाहिनी  को प्रशिक्षण और समर्थन दिया था। उन्होंने लाखों शरणार्थियों को शरण दी थी । इसके साथ ही इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में भारत को जीत दिलाने में निर्णायक नेतृत्व प्रदान किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सोवियत संघ के साथ संधि करके अमेरिकी दबाव को कम किया और एक लोकतांत्रिक बांग्लादेश का लक्ष्य रखा।  उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया और सेना को युद्ध के लिए तैयार होने तक इंतजार करने का धैर्य दिखाया था। उन्होंने भारतीय सशस्त्र बलों को मुक्ति वाहिनी के साथ गठबंधन करने का निर्देश दिया, जिसने पाकिस्तान को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आगे चलकर उन्होंने अमेरिका और चीन जैसे देशों के दबाव के बावजूद अपना एजेंडा जारी रखा और भारत का समर्थन करने के लिए अन्य देशों को राजी किया।

युद्धबंदियों को इंसाफ और पाकिस्तान में शांति स्थापित की 

इंदिरा गांधी ने  1971 में सोवियत संघ के साथ एक शांति संधि पर हस्ताक्षर की थी, जिससे उन्हें राजनीतिक और सैन्य सुरक्षा मिली, जिसके कारण अमेरिका जैसे देशों के हस्तक्षेप को रोकने में मदद मिली। उन्होंने बांग्लादेश में एक परिपक्व संसदीय लोकतंत्र की कल्पना की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाया।  1971 के युद्ध में पाकिस्तान को प्राप्त करने के बाद इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के कैदियों को युद्ध में मिली सारी जमीनें वापस कर दीं, जिससे पाकिस्तान के साथ शांति स्थापित हुई। इसके साथ उन्होंने शेख मुजीबुर रहमान को पाकिस्तानी जेल से मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बांग्लादेश सरकार ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता में उनकी इस अद्वितीय भूमिका के लिए इंदिरा गांधी को मरणोपरांत बांग्लादेश स्वतंत्रता सम्मान से सम्मानित किया। 

पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदुओं को सुरक्षित आश्रय देने का मकसद 

हम सबों को यह जानना चाहिए कि आखिर इंदिरा गांधी पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग कर क्या साबित करना चाहती थी ? 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली आबादी के खिलाफ व्यापक नरसंहार किया था। जिसका लक्ष्य विशेष रूप से अल्पसंख्यक हिंदू आबादी थी। लेकिन यह लिखते हुए दुःख होता है कि आज भी बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यक कट्टर पंथियों द्वारा कुचले ले जा रहे हैं।  जिसके कारण लगभग दस  मिलियन  लोग पूर्वी पाकिस्तान से भाग गए और पड़ोसी भारतीय राज्यों में शरण ली थी। शरणार्थियों को भारत में सुरक्षित आश्रय देने के लिए पूर्वी पाकिस्तान-भारत सीमा खोल दी गई थी । पाकिस्तानी सेना के जनरल टिक्का खान ने अपने द्वारा किए गए व्यापक अत्याचारों के कारण 'बंगाल का कसाई' उपनाम अर्जित किया। भारत सरकार ने बार-बार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपील की , लेकिन कोई प्रतिक्रिया प्राप्त करने में विफल रहने पर अंततः प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 27 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपनी सरकार का पूर्ण समर्थन व्यक्त किया ।

पाकिस्तानी हमला का जवाब और पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण 

इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारतीय नेतृत्व ने जल्दी ही निर्णय लिया कि शरणार्थी शिविरों में बस उन लोगों को शरण देने की तुलना में पाकिस्तान के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई करके नरसंहार को समाप्त करना अधिक प्रभावी था। निर्वासित पूर्वी पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों और भारतीय खुफिया विभाग के सदस्यों ने तुरंत मुक्ति बाहिनी गुरिल्लाओं की भर्ती और प्रशिक्षण के लिए इन शिविरों का उपयोग करना शुरू कर दिया । पाकिस्तान वायु सेना  ने 3 दिसंबर 1971 को भारतीय वायु सेना के ठिकानों पर हमला किया । यह हमला छह दिवसीय युद्ध के दौरान इजरायली वायु सेना के ऑपरेशन फोकस के मॉडल पर किया गया था । इसका उद्देश्य जमीन पर भारतीय वायु सेना के विमानों को बेअसर करना था । इस हमले को भारत ने बिना उकसावे के खुले आक्रमण के रूप में देखा। पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति में छह भारतीय कोर शामिल थे। उन्हें मुक्ति वाहिनी की लगभग तीन ब्रिगेडों का समर्थन प्राप्त था , जो उनके साथ लड़ रही थीं, और कई अन्य ब्रिगेड अनियमित रूप से लड़ रही थीं। भारतीयों ने तेज़ी से देश पर कब्ज़ा कर लिया था। पाकिस्तान की सेना भारतीय हमले का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में असमर्थ थीं। ढाका की रक्षा करने में असमर्थ पाकिस्तानियों ने 16 दिसंबर 1971 को आत्मसमर्पण कर दिया था। इंदिरा गांधी ने इस तरह 1971 में पाकिस्तान पर अपनी विजय दर्ज की थी।