बेगूसराय में अनोखी परंपरा: फूल और बेलपत्र से बनता है मां जयमंगला का स्वरूप, 250 साल से चली आ रही पूजा
बेगूसराय: बिहार के बेगूसराय जिले में मां दुर्गा की आराधना की एक अनोखी परंपरा आज भी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है। चेरिया बरियारपुर प्रखंड के विक्रमपुर गांव स्थित मां जयमंगला मंदिर में नवरात्र के दौरान मां की पारंपरिक प्रतिमा स्थापित करने के बजाय फूलों और बेलपत्र से हर दिन उनका अलग-अलग स्वरूप तैयार किया जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा करीब 250 वर्षों से चली आ रही है।
बेगूसराय: बिहार के बेगूसराय जिले में मां दुर्गा की आराधना की एक अनोखी परंपरा आज भी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है। चेरिया बरियारपुर प्रखंड के विक्रमपुर गांव स्थित मां जयमंगला मंदिर में नवरात्र के दौरान मां की पारंपरिक प्रतिमा स्थापित करने के बजाय फूलों और बेलपत्र से हर दिन उनका अलग-अलग स्वरूप तैयार किया जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा करीब 250 वर्षों से चली आ रही है।
इस अनूठी पूजा परंपरा को देखने और मां जयमंगला के दर्शन करने के लिए नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। गांव में मेला भी लगता है, जहां भक्त पूजा-अर्चना के साथ मेले का आनंद लेते हैं।
बेलपत्र से बनती है आकृति, फिर फूलों से दिया जाता है स्वरूप
मंदिर में मां जयमंगला का स्वरूप तैयार करने की प्रक्रिया बेहद खास है। सबसे पहले बेलपत्र की मदद से मां की आकृति बनाई जाती है। इसके बाद विभिन्न प्रकार के फूलों से उसे आकर्षक रूप दिया जाता है। मां की आकृति तैयार करने में प्रतिदिन करीब दो से तीन घंटे का समय लगता है।
शाम के समय भक्त मिलकर मां का स्वरूप तैयार करते हैं। इसके बाद रात में फूलों और बेलपत्र से बनी आकृति की विधि-विधान से पूजा की जाती है। वहीं, दिन में कलश की पूजा होती है। नवरात्र के नौ दिनों तक मां का स्वरूप अलग-अलग बनाया जाता है।
करीब ढाई सौ साल पुरानी है परंपरा
स्थानीय निवासी शिव शंभू प्रसाद सिंह के अनुसार, इस परंपरा का इतिहास करीब ढाई सौ वर्ष पुराना है। बताया जाता है कि उस समय जयमंगलागढ़ और विक्रमपुर गांव में पूजा को लेकर विवाद हो गया था। दोनों गांवों के लोगों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी।
इसी दौरान नवरात्र के समय विक्रमपुर गांव के स्वर्गीय सरयुग सिंह को स्वप्न में मां जयमंगला के दर्शन हुए। मान्यता के अनुसार, मां ने स्वप्न में कहा कि नवरात्र के पहले दिन से नवमी तक उनकी आत्मा विक्रमपुर गांव में रहेगी, जबकि उनका शरीर जयमंगलागढ़ में रहेगा।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां ने स्वप्न में पूजा की विधि भी बताई थी। इसमें फूल और बेलपत्र से मां का स्वरूप बनाने तथा प्रसाद के रूप में चावल और शक्कर अर्पित करने की बात कही गई थी। इसके बाद से विक्रमपुर गांव में इसी परंपरा के अनुसार मां जयमंगला की पूजा की जाने लगी।
नौ वंशज निभाते हैं पूजा की जिम्मेदारी
मंदिर की एक और विशेषता यह है कि गांव के नौ वंशज नवरात्र के नौ दिनों में अलग-अलग दिन पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभाते हैं। प्रत्येक दिन मां का नया स्वरूप तैयार किया जाता है और श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं।
ग्रामीणों के लिए यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है।
मुंबई, दिल्ली और कोलकाता से मंगाए जाते हैं फूल
मां जयमंगला की आकृति तैयार करने वाले स्थानीय निवासी पंकज कुमार के अनुसार, मां का स्वरूप बनाने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों से फूल मंगाए जाते हैं। इस बार भी मुंबई, दिल्ली और कोलकाता से फूल मंगाए गए हैं।
उन्होंने बताया कि नवरात्र के नौ दिनों में मां की आकृति अलग-अलग बनाई जाती है। इसे तैयार करने में रोजाना करीब दो से तीन घंटे लगते हैं। मंदिर को फूलों से सजाया जाता है और पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल रहता है।
पूजा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
विक्रमपुर गांव की यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है। फूलों और बेलपत्र से मां का स्वरूप तैयार करना इस पूजा को दूसरी परंपराओं से अलग पहचान देता है।
नवरात्र के दौरान ग्रामीण और श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ मंदिर में पहुंचते हैं। पूजा-अर्चना, फूलों की सजावट और गांव में लगने वाला मेला इस आयोजन को खास बनाते हैं।
बेगूसराय के विक्रमपुर गांव में मां जयमंगला की यह अनूठी पूजा परंपरा आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है। करीब 250 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में हर साल नवरात्र के नौ दिनों तक फूलों और बेलपत्र से मां के अलग-अलग स्वरूप बनाकर उनकी आराधना की जाती है।
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