हाय शादीवाले फोटो

हाय क्या वक्त थे पुराने। जब घरों में घुसने पर ड्राइंग रुमों में कुछ ऐसी फोटुएं हुआ करती थीं, जिनमें बालक या बालिकाएं गाऊन टोपी टांगकर हाथ में कागज का कुछ दाबे रहते थे। बताया जाता था कि यह डिग्री है और जमाने को दिखाना है कि बालक या बालिका डिग्रीधारी है कोई बीए की डिग्री हासिल कर चुका है।

हाय शादीवाले फोटो

नयी पीढ़ी के नौजवान जिन कुछ चीजों से महरुम, वंचित हैं, उनमें से एक है शादीवाले फोटो।

हाय उफ्फ क्या दिन थे, जब सिर्फ फोटो ही नहीं हुआ करते थे, शादी वाले फोटो हुआ करते थे।

लड़के सूट-टाई लगाकर, शेविंग वगैरह कराकर टनाटन पोज देकर फोटू खिंचाते थे, ये फोटो लड़कीवालों के यहां भेजे जाते थे।

शादी वाले फोटो हर लड़का देव आनंद, धर्मेंद्र या रितिक रोशन टाइप ही दिखा करता था।

हर लड़का रितिक रोशन टाइप कैसे हो सकता था।

जी होने को तो कुछ भी ना होता, और होने को कुछ भी हो सके। शादी वाले फोटो खींचनेवाले, खिंचानेवाले, भेजनेवाले, कबूल करनेवाले , रिश्ता जोड़नेवाले सब जानते थे कि संसार माया है और शादीवाले फोटो तो परम मायावी हैं। कैसे कैसे ऐसे ऐसे दिखते थे। ऐसे ऐसे कैसे कैसे दिखते थे।

उधर बालिकाएं स्पेशल पोज में तरह तरह के फोटो खिंचाती थी, फोटो इस तरह के होते थे कोई भी बालिका अपने दौर की परम सुंदरी, परम विनम्र दिखायी पड़ती थी।

ऐसी विनम्र बालिका ऐसी विनम्र बालिका, शादी के कुछ ही महीनों बाद खबरें आने लगती थीं कि बालिका ने सास को डपट लिया है। फोटो की विनम्रता शादी के बाद खत्म हो जाती थी फिर खालिस बहू रह जाती थी, जिससे सास खौफ खाती थी।

उधर फोटो का तेजस्वी बालक रीयल लाइफ में परम ढीला निकलता था।

बाद में सारे पक्ष मिलजुलकर रिश्ता खींच लिया करते थे। निभ जाती थी। सबकी समझ में आ जाता था कि जिंदगी ऐसी ही है, फोटू में कुछ और दिखता है, सच में कुछ और होता है।

तमाम हिल स्टेशनों के फोटू उनके राज्यों के पर्यटन निगम खिंचवाकर बंटवाते हैं, परम सुंदर-परम शांत, परम हरीतिमा से लैस ये हिल स्टेशन फोटुओं में परम आकर्षक दिखायी पड़ते हैं। इन हिल स्टेशनों की ओर जाकर देखो, तो पता लगता है कि विकट पगलाया हुआ ट्रेफिक, परम चिल्ल पों आपकी प्रतीक्षा कर रही है।

फोटो खिंचाये ही इसलिए जाते हैं कि अगली पार्टी को बेवकूफ बनाया जा सके।

हर शहर में पांच दस फोटोग्राफरों का यही काम होता था कि कैसे शहर के शादी योग्य नौजवानों और युवतियों को उनके फोटो में परम स्मार्ट परम सुंदर दिखाया जाये।

विवाह योग्य युवतियों और युवकों के माता पिता बुजुर्ग लोग बीस पच्चीस फोटो खिंचाये रहते थे, ये फोटो सर्कुलेशन में रहते थे, तब तक जब तक कि रिश्ता संपन्न ना हो जाये।

यह वह वक्त था, जब समधियों के नाम दीनदयालजी या राधेश्यामजी हुआ करते थे।

यह वक्त हुआ करता था, जब लड़कियां शादी की चर्चा सुनकर शरमाती हुई भाग जाया करती थीं।

यह वक्त हुआ करता था, जब लड़के शादी की चर्चा में आम तौर पर ना पड़ते थे और कह दिया करते थे-जो पिताजी तय कर देंगे, मुझे मंजूर है।

भागकर शादियां तब अधिकांश फिल्मों ही हुआ करती थीं।

हाय क्या वक्त थे पुराने। जब घरों में घुसने पर ड्राइंग रुमों में कुछ ऐसी फोटुएं हुआ करती थीं, जिनमें बालक या बालिकाएं गाऊन टोपी टांगकर हाथ में कागज का कुछ दाबे रहते थे। बताया जाता था कि यह डिग्री है और जमाने को दिखाना है कि बालक या बालिका डिग्रीधारी है कोई बीए की डिग्री हासिल कर चुका है।

पुराने भले और भोले लोग होते थे, बीए को डिग्री समझते थे। अब तो बीए लगभग शर्म की वजह भी है, इतना पढ़ने के बाद किसी गोलगप्पे की दुकान से गोलगप्पे पैक कराकर किसी के घर में डिलीवर कर रहे हैं इस कारोबार को गोमाटो या जिग्गी टाइप कुछ डिलीवरी कारोबार कहा जा सकता है। माल इधर का उधर करने का कारोबार विकट हो गया है।

सरकारी चपरासी के पदों के लिए पीएचडी डिग्रीधारी एप्लाई कर रहे हैं। अब लोग डिग्री के साथ फोटू ना खिंचाते।

डिग्री की फोटू खिंचाकर क्या करें, जमाना इतना खींच रहा है, बेरोजगारों को।

पुराने दिनों बात है, भले और भोले लोग बीए की डिग्री को कुछ आइटम समझते थे और शादी के फोटो को खिंचाना गंभीर काम समझते थे। अब स्मार्ट फोन के जमाने में बालक और बालिकाएं अपनी तरह तरह की फोटुएँ एक दूसरे को भेजे रहते हैं। कई तो दिन ही भर यही काम करते हैं।

अभी निकला शहर के एक कोने में, तो शादी के फोटोवाली दुकान की जगह कैमिस्ट की दुकान दिखायी पड़ी। नौजवान ने बताया कि पापा ने फोटो की जगह दवाई की दुकान शुरु कर दी थी। स्मार्ट फोन ने फोटुओं का कारोबार खत्म कर दिया पर दवा का कारोबार खासकर चिंता की दवाओं का कारोबार कभी खत्म ना होना। रोजगार की चिंता, फिर शादी की चिंता, फिर बच्चे की चिंता, फिर बच्चे के एडमीशन की चिंता, फिर बच्चे की पढ़ाई की चिंता………।

सही है झूठे फोटुओं के कारोबार के मुकाबले सच्ची चिंताओं का कारोबार ज्यादा चकाचक है।