'नई कहानी' आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार : राजेंद्र यादव 

(28 अक्टूबर, प्रख्यात कथाकार राजेंद्र यादव की 13 वीं पुण्यतिथि पर विशेष )

Oct 28, 2026 - 16:04
'नई कहानी' आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार : राजेंद्र यादव 

 नई कहानी आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार  राजेंद्र यादव अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से प्रचलित कहानी लेखन परंपरा को एक नई राह देने का काम किया था। वे अपनी कहानियों के माध्यम से लगातार राजनीति, सामाजिक, स्त्री विमर्श  आदि विषयों पर आईना दिखाने का काम करते रहे थे। वे बिना हस्तक्षेप और  निर्भय होकर अपनी राय को खुलकर रखा करते थे। वे अपने इस प्रगतिशील मिजाज और खुलेपन बयान के कारण सदैव आलोचना के केंद्र में भी रहे थे । वे आलोचनाओं से कभी घबराए नहीं।  उन्होंने जो कह दिया, बस ! कह दिया। राजेन्द्र यादव की अपनी जीवनसंगिनी  प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी से कैसे संबंध रहे ? यह बात हिन्दी साहित्य जगत से छुपी नहीं रही। अपने पारिवारिक संबंधों पर भी उन्होंने कोई पर्दा लगाने का काम नहीं किया बल्कि उसको उसी रूप में प्रस्तुत कर खुद को भी आईना दिखाने का काम किया था। राजनीति पर जब वे अपनी राय रखते थे, तब  राजनीतिज्ञों के बीच एक हड़कंप से मच जाती थी। वहीं दूसरी स्त्रियों के संबंध में उनकी बेबाक टिप्पणियां सदा उनको कटघरे में खड़ी करती रही थी।  तमाम आलोचनाओं और अवरोधों के बीच 'हंस' जैसी पत्रिका का बिना रुके उत्कृष्ट संपादन कर एक श्रेष्ठ संपादक होने का गौरव भी प्राप्त किया था।
    वे  सच्चे अर्थों में आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे प्रख्यात और प्रभावशाली लेखकों, उपन्यासकारों, कहानीकारों और आलोचकों में से एक थे। वे हिंदी के 'नयी कहानी' आंदोलन के प्रमुख सूत्रधारों में गिने जाते हैं। नई कहानी के अन्य सूत्रधार मोहन राकेश और कमलेश्वर भी अपनी कहानियों के माध्यम से प्रचलित कहानी लेखन परंपरा को एक नई राह दिखाने का काम किया था।  राजेंद्र यादव ने हंस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका का पुन: प्रकाशन और संपादन कर देशभर में एक हिंदी साहित्यिक माहौल बनाने का काम किया था।  उन्होंने हंस को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।  उन्होंने दिन रात एक कर हंस को हिंदी के सुधी पाठकों,  लेखकों और साहित्यकारों तक पहुंचाने का काम किया था।   राजेन्द्र यादव ने हंस के संस्थापक संपादक और प्रकाशक कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के सपनों को एक तरह से सच  कर दिखाया था। ‌उन्होंने हंस के माध्यम से कई नए लेखकों को सामने लाने का भी काम किया था। उन्होंने लगभग 27 वर्षों तक हंस का संपादक किया था । इस दरमियान उन्होंने हंस में लगभग 324 संपादकीय टिप्पणियां दर्ज की। उनका हर एक संपादकीय बिल्कुल नए अंदाज और बेबाक होते थे। उनकी अगर कलम राजनीति पर चली तो राजनीति की खैर नहीं।  अगर स्त्री विमर्श पर चली तो स्त्री सच को उसी रूप में प्रस्तुत कर देते थे। उनका हर एक संपादकीय बेबाक और नूतन विचारों लैस होता था। वे हंस के संपादकीय के लिए बहुत ही गंभीर हुआ करते थे। बहुत ही सोच विचार कर उनकी हर एक पंक्ति गढ़ी होती थी। 
 राजेंद्र यादव का जन्म देश की आजादी से पूर्व 28 अगस्त 1929 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के संभ्रांत परिवार में हुआ था। साहित्य में उनका रुझान बहुत ही छोटी उम्र से था।  यह रुझान जीवन के अंतिम क्षणों तक बना रहा था।‌ राजेंद्र यादव दिखने में गोरे चिट्टे और पतले दुबले थे।‌ वे खाने पीने के मामले में वे बहुत ही चूज़ी थे।‌  वे इस धरा पर 84 वर्षों तक  ही रह पाए थे।  वे काम करते, लिखते  - पढ़ते  28 अक्टूबर 2013 को इस दुनिया से रुखसत हो गए थे। ‌उनके पिता का नाम था डॉ मिश्रीलाल यादव और माता का नाम श्रीमती ताराबाई। उनकी प्राथमिक शिक्षा आगरा में हुई। बारह साल की उम्र में हॉकी खेलते वक्त हुए एक हादसे में उनकी एक टांग टूट गई थी ।इस कारण वे  जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए। उन्होंने आगरा के नागरी प्रचारिणी से हिंदी विशारद, साहित्य रत्न पास कर 1951 में आगरा विश्वविद्यालय से एमए की परीक्षा हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। वे 
   वे जहां भी बैठ जाते थे, एक गोष्ठी बन ही जाती थी। देशभर के हिंदी के साहित्यकारों से उनका जुड़ाव बन गया था। हंस में प्राप्त होने वाली कहानियों को खुद पढ़ा करते थे।  वे लेखकों को उनकी कहानियों पर अपनी राय भी लिखकर दिया करते थे। झारखंड के जाने-माने कथाकार रतन वर्मा से उनके बहुत ही अच्छे संबंध थे।  वे, रतन वर्मा की कहानियों को  प्रमुखता के साथ छापते भी रहे थे।  उनकी कहानियों पर लगातार टिप्पणियां भी भेजते रहे थे । मेरे गुरू  प्रख्यात संपादक, लेखक, आलोचक कवि भारत यायावर से भी उनका जुड़ाव काफी  अच्छा था। भारत यायावर ने अपने कई आलेखों में राजेंद्र यादव के व्यक्तित्व और कृतित्व का जिक्र किया । राजेंद्र यादव का साहित्यकारों से मिलने जुलने का अंदाज सबसे  अलग था। भारत यायावर ने राजेंद्र यादव को संदर्भ में लिखा कि एक बार दिल्ली में उनसे मिलने हंस कार्यालय  गया था, तब उन्होंने  उनके साहित्यिक योगदान दान के लिए शॉल और एक कलम प्रदान कर सम्मानित किया था 
 सर्व विदित है कि कथा सम्राट  मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन राजेंद्र यादव ने  प्रेमचन्द की जयंती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके पुनर्प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया। 1986 में जब राजेंद्र यादव ने हंस का पुनर्प्रकाशन कर साहित्यकारों तक पहुंचाया, तब कई साहित्यकारों ने उन्हें सुझाव दिया कि यह कार्य उनकी पहुंच से बाहर का है। तब उन्होंने मुस्कुरा कर यह कहा कि 'इसीलिए तो मैं हंस का पुनर्प्रकाशन किया हूं।  देखता हूं कि हंस के साथ मैं कितना दौड़ पाता हूं। यह विश्वास दिलाता हूं कि मैं हंस के साथ दौड़ता - दौड़ता रहूंगा। थकूंगा नहीं।  आप सब देखेंगे'। इस बात को उन्होंने सच कर दिखाया था।  तब कई साहित्यकारों ने उनकी यह कहकर आलोचना की थी कि ज्यादा दिनों तक  प्रेमचंद नहीं चल पाए तब राजेंद्र यादव क्या चल पाएंगे ?  वे मुस्कुराते हुए आलोचनाओं को सुनते रहे और पूरी शिद्दत के साथ हंस के प्रकाशन में जुटे रहे थे।
  राजेंद्र यादव की प्रमुख कहानी संग्रह निम्न हैं। देवताओं की मूर्तियां, खेल-खिलौने,जहां लक्ष्मी कैद है,अभिमन्यु की आत्महत्या,छोटे-छोटे ताजमहल,किनारे से किनारे तक,टूटना, चौखटे तोड़ते त्रिकोण, ये जो आतिश गालिब (प्रेम कहानियां), 
यहां तक पड़ाव, वहाँ तक पहुँचने की दौड़, हासिल। इसके साथ उन्होंने कई महत्वपूर्ण उपन्यासों की भी रचना की।  सारा आकाश,'प्रेत बोलते हैं',उखड़े हुए लोग,कुलटा,शह और मात, अनदेखे अनजान पुल, एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ), मंत्र विद्ध,एक था शैलेन्द्र।‌ वे जितने अच्छे कथाकार और उपन्यासकार थे, उतने ही अच्छे कवि भी थे।  उनका कवि पक्ष एक तरह से गौण होकर रह गया था।‌ लेकिन वे एक स्तरीय कवि भी थे । उनका कविता-संग्रह निम्न है। आवाज तेरी है। कविता के अलावा उन्होंने नाटक के लेखन  क्षेत्र को भी स्पर्श किया।  उनका नाटक निम्न है। चैखव के तीन नाटक, सीगल, तीन बहनें, चेरी का बगीचा। इसके अलावा उन्होंने कुछ उपन्यासों का अनुवाद भी किया, जिनके नाम निम्न हैं। टक्कर (चैखव), हमारे युग का एक नायक (लर्मन्तोव) प्रथम-प्रेम (तुर्गनेव), वसन्त-प्लावन (तुर्गनेव), एक मछुआ : एक मोती (स्टाइनबैक), अजनबी (कामू)- ये सारे उपन्यास 'कथा शिखर' के नाम से दो खण्डों में, नरक ले जाने वाली लिफ्ट, स्वस्थ आदमी के बीमार विचार। उन्होंने कई महत्वपूर्ण निबंध भी  लिखें, जिनके नाम निम्न हैं।  स्वरूप और संवेदना, प्रेमचन्द की विरासत,अठारह उपन्यास, औरों के बहाने, काँटे की बात, (बारह खण्ड), कहानी अनुभव और अभिव्यक्ति,  उपन्यासः स्वरूप और संवेदना, आदमी की निगाह में औरत, वे देवता नहीं हैं, मुड़-मुड़के देखता हूं,  अब वे वहां नहीं रहते, , मेरे साक्षात्कार, , काश, मैं राष्ट्रद्रोही होता, जवाब दो विक्रमादित्य (साक्षात्कार)।
  राजेन्द्र यादव को उनके महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान और कृतियों के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।  2013 में साहित्य अकादमी पुरस्कार ,भारत विभाजन पर आधारित उनके उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2005 में  भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्म भूषण सम्मान से अलंकृत किया गया था। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।  2004 में उन्हें शलाका सम्मान  से अलंकृत किया गया था। हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया था। 2013 में उन्हें  उत्तर प्रदेश सरकार ने साहित्य क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए यश भारती पुरस्कार  प्रदान कर सम्मानित किया था। 

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