पटना हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: गलत कानूनी राय देना अपराध नहीं, वकील के खिलाफ केस रद्द

पटना: पटना हाईकोर्ट ने बैंक लोन से जुड़े धोखाधड़ी के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल कानूनी राय गलत साबित होने या लोन खाता एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) बन जाने के आधार पर किसी वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने यूको बैंक के पैनल वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत के अनुसार, आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए धोखाधड़ी या साजिश में वकील की सक्रिय भागीदारी के पर्याप्त आधार होने चाहिए।

Oct 28, 2026 - 16:36
Oct 28, 2026 - 16:38
पटना हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: गलत कानूनी राय देना अपराध नहीं, वकील के खिलाफ केस रद्द

2008 के बैंक लोन मामले में हाईकोर्ट का फैसला, ₹29.54 लाख के कथित नुकसान से जुड़े केस में पैनल वकील को मिली राहत

पटना: पटना हाईकोर्ट ने बैंक लोन से जुड़े धोखाधड़ी के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल कानूनी राय गलत साबित होने या लोन खाता एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) बन जाने के आधार पर किसी वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने यूको बैंक के पैनल वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत के अनुसार, आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए धोखाधड़ी या साजिश में वकील की सक्रिय भागीदारी के पर्याप्त आधार होने चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2008 का है। पटना स्थित यूको बैंक की एग्जीबिशन रोड शाखा में कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कैश-क्रेडिट लोन स्वीकृत किए गए थे। बाद में ऋण खाते एनपीए हो गए और बैंक को लगभग 29.54 लाख रुपये के नुकसान की बात सामने आई।

इस मामले में बैंक अधिकारियों, कर्जदारों और जमानतदारों के साथ बैंक के पैनल वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल को भी आरोपी बनाया गया था। उनके खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश समेत भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई।

पटना की तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (ACJM) अदालत ने वर्ष 2016 में मामले में संज्ञान लिया था। इसके बाद वकील ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी।

गलत कानूनी राय का मतलब साजिश में शामिल होना नहीं

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी वकील की पेशेवर कानूनी राय बाद में गलत साबित हो जाने मात्र से उसे अपराध में शामिल नहीं माना जा सकता। इसी तरह, बैंक का ऋण एनपीए हो जाना भी अपने आप में वकील की आपराधिक संलिप्तता साबित नहीं करता।

अदालत के अनुसार, यदि किसी वकील ने जानबूझकर धोखाधड़ी में सहयोग किया हो या अन्य आरोपियों के साथ मिलकर अपराध की साजिश रची हो, तो उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसकी आपराधिक जिम्मेदारी तय की जा सकती है। लेकिन केवल पेशेवर कानूनी सलाह देने के कारण उसे आरोपी बनाना उचित नहीं है।

बैंक को खुद दस्तावेजों की जांच करने की सलाह दी थी

सुनवाई के दौरान वकील की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर कानूनी राय दी थी। साथ ही, बैंक को अपने स्तर पर मूल दस्तावेजों का सत्यापन करने की सलाह भी दी गई थी।

ऋण स्वीकृत करने और राशि जारी करने का निर्णय बैंक अधिकारियों का था। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि वकील की भूमिका और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से कथित अपराधों में उनकी संलिप्तता का पर्याप्त आधार नहीं बनता।

निचली अदालत के आदेश पर भी उठे सवाल

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के संज्ञान आदेश की प्रक्रिया पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने आदेश तैयार करने और उस पर न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में तलब करना एक गंभीर न्यायिक कदम है।

पीठ के अनुसार, मजिस्ट्रेट को उपलब्ध रिकॉर्ड पर स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिए और अपना न्यायिक विवेक इस्तेमाल करना चाहिए। केवल तैयार प्रारूप पर औपचारिक हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं है।

वकील के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द

पटना हाईकोर्ट ने गोपाल कृष्ण अग्रवाल की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ पारित संज्ञान आदेश और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

यह राहत संबंधित वकील तक सीमित है। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि बैंक लोन मामले के अन्य आरोपियों के खिलाफ भी कार्यवाही समाप्त हो गई है या कथित बैंक धोखाधड़ी के सभी आरोप गलत साबित हो गए हैं।

कानूनी पेशे के लिए अहम फैसला

इस फैसले में अदालत ने पेशेवर कानूनी राय और आपराधिक साजिश के बीच अंतर स्पष्ट किया। फैसला यह रेखांकित करता है कि किसी वकील के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए केवल गलत साबित हुई कानूनी राय पर्याप्त नहीं है। कथित अपराध में उसकी भूमिका और आपराधिक मंशा से जुड़े तथ्यों का भी मूल्यांकन जरूरी है।

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