झारखंड के हिंदी अखबार राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाठकों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं
झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबार हिंदी के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका भी अदा करते रहे थे। झारखंड में काफी संख्या में हिंदी के कथाकार, कवि और आलोचक निरंतर लिख रहे थे ।
झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबार धीरे-धीरे राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाठकों की पहली पसंद बनते चले जा रहे हैं। यह झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबारों के लिए गौरव की बात है । ध्यातव्य है कि झारखंड (बिहार प्रांत के अंतर्गत था) प्रांत से अखबारों का प्रकाशन आजादी से पूर्व हुआ था । तब अखबार ट्रेडिंल मशीन से छपा करता था। उस कालखंड में अखबारों के पास संसाधन काफी कम थे । चार-पांच लोग मिलकर दैनिक अखबार निकाला करते थे। कई ऐसे अखबारों का प्रकाशन भी प्रारंभ हुआ , इ के जिसके प्रकाशक, मुद्रक, संपादक और संवाददाता अकेले एक व्यक्ति होते थे। इन अखबारों के संपादकों और प्रकाशकों का पत्रकारिता के प्रति एक सच्चा कमिटमेंट था। ऐसे पत्रकार व संपादक विपरीत परिस्थितियों में भी झुकने वाले नहीं थे । वे कभी भी पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं समझें बल्कि सामाजिक जन जागरण का एक मिशन के तौर पर लिए।
बड़े अख़बारों से प्रतिस्पर्धा
लंबे संघर्ष के बाद झारखंड की पत्रकारिता परचम लहरा पाया है। झारखंड में ज्यादातर बड़े बैनर के अखबार बिहार से छप कर झारखंड आते थे। गिनती भर के अखबार झारखंड से प्रकाशित होते थे । झारखंड के अखबारों के प्रकाशन के साथ ही बड़े अखबारों के साथ प्रतिस्पर्धा सामने भी खड़ी थी। इन विपरीत परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हुए झारखंड से प्रकाशित होने वाले कई अखबार निरंतर छपते रहे थे। पाठकों के हाथों तक पहुंचाते रहे थे। लेकिन कई अखबार कुछ वर्ष व कुछ महीने तक चलकर ही बंद हो गए थे। इस दौरान कई प्रकाशक और संपादक इतने परिश्रमी थे कि रात भर जागकर अखबारों का ट्रेडिंल मशीन पर छपाई करना, सुबह सुबह खुद हॉकर की तरह घर-घर जाकर अखबार भी बांटे थे। तब कहीं जाकर झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबार पाठकों के बीच अपना सिक्का जमा पाए थे।
स्थानीय रचनाकारों को मिली जगह
झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबार हिंदी के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका भी अदा करते रहे थे। झारखंड में काफी संख्या में हिंदी के कथाकार, कवि और आलोचक निरंतर लिख रहे थे । लेकिन राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में उन्हें ढंग से जगह नहीं मिल पा रही थी। इस कारण कई प्रतिभाशील साहित्यकारों की रचनाएं फाइलों में ही सिमटकर रह गई थी । इस दौरान जब झारखंड से साप्ताहिक और दैनिक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ तब स्थानीय स्तर पर लिखने वाले रचनाकारों को इन अखबारों में जगह मिलने लगी। झारखंड के स्थानीय रचनाकारों की रचनाएं जब झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबारों में छपने लगीं ,तब एक नई साहित्यिकी फिजा झारखंड में देखने को मिलने लगी थी। पहले साहित्यिक आयोजन बिहार के विभिन्न जिलों में ही सिमट कर रह जाते थे। लेकिन झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबारों के प्रोत्साहन से स्थानीय स्तर पर हिंदी साहित्य की छोटी बड़ी गोष्ठियां होने लगी। उस कालखंड में आयोजित होने वाली गोष्ठियों की रिपोर्ट बहुत ही प्रमुखता के साथ स्थानीय अखबारों में छपने लगी । इससे पूर्व बिहार से आने वाले अखबारों में बड़ी से बड़ी गोष्ठियों के रिपोर्ट को एक या दो कॉलम में ही सिमटा दिया जाता था।
पाठकों के बीच स्थानीय अख़बार लोकप्रिय
झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबारों के कारण स्थानीय साहित्यकारों,खेलाड़ियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को एक बेहतर मंच मिल गया था । झारखंड में बड़ी से बड़ी राजनीतिक एवं सामाजिक सभाओं की रिपोर्ट को भी राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में बहुत कम जगह मिल पाती थी। लेकिन झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबारों में काफी जगह मिलने लगी थी । इस कारण स्थानीय अखबार धीरे-धीरे कर आम पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय बनता चला गया था।
झारखंड निर्माण में स्थानीय अख़बारों की महत्वपूर्ण भूमिका
देश की आजादी के बाद से ही झारखंड वासी बिहार प्रदेश के साथ रहकर भी खुद को अलग-अलग महसूस करते रहे थे। झारखंड की राजनीति में स्थानीय नेताओं को जो महत्व मिलना चाहिए था, नहीं मिल पा रहा थी । बिहार विधानसभा में बिहार के नेताओं का ही बोलबाला था। झारखंड के नेताओं को विधानसभा में भी जो सम्मान व अवसर मिलना चाहिए, नहीं मिल पा रहा था। बिहार सरकार द्वारा आवंटित राशि का 80% हिस्सा बिहार में ही खर्च हो जाया करता था। झारखंड वासियों के जिम्मे मात्र 20% राशि ही मिल पाती थी । पटना से आवंटित 20% राशि भी झारखंड आते-आते 10% में बदल जाती थी। अब सवाल यह उठता था कि इस 10% राशि से झारखंड का विकास कैसे हो सकता था ? बहुत दिनों तक झारखंड के विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसद और नेता सहते रहे थे। लेकिन बिहार के इस एक तरफा रवैय्या के विरोध में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा विरोध दर्ज किया जाने लगा था। बिहार के इस एक तरफा रवैया की कोख से झारखंड अलग प्रांत निर्माण की मांग उठी थी। झारखंड के आदिवासी नेताओं से लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने सोचा कि बिहार के साथ रहकर झारखंड का बहुत भला नहीं होने वाला था । सर्वप्रथम झारखंड के आदिवासी नेताओं ने बिहार से अलग झारखंड प्रांत की मांग बुलंद की थी। इस कालखंड में झारखंड अलग राज्य बनाने की मांग जन्म ले रही थी । स्थानीय अखबारों ने झारखंड अलग प्रांत निर्माण की मांग को प्रमुखता से छापना प्रारंभ कर दिया था। इसका असर यह हुआ कि झारखंड अलग प्रांत की मांग जन-जन तक पहुंचने गई। जबकि इससे पूर्व झारखंडी नेताओं के स्वर को बिहार से प्रकाशित होने वाले अखबारों में उतनी जगह नहीं मिल पाती थी । इस कारण उनकी आवाज़ दब जा रही थी। स्थानीय अखबारों ने भी झारखंड अलग प्रांत की मांग को बहुत ही मजबूती के साथ अपने-अपने अखबारों के माध्यम से उठाना शुरू किया था ।झारखंड अलग प्राउ की मांग को लेकर विभिन्न अखबारों ने इस मांग के औचित्य पर पूरे प्रदेश के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक दल के नेताओं, साहित्यकारों व्यवसाईयों के विचारों को क्रमवार प्रकाशित भी किया था।
झारखंड निर्माण के बाद अख़बारों ने लिया नया स्वरूप
यहां यह लिखना जरूरी समझता हूं कि झारखंड अलग प्रांत निर्माण में झारखंड के नेताओं ने जो योगदान दिया, उसे कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबारों ने झारखंड अलग प्रांत के संघर्ष में अपने-अपने अखबारों को एक अस्त्र बनाकर संघर्ष किया । झारखंड के अखबार जो पहले ट्रेडिल मशीन पर छप रहे थे, अब उनके पास अत्यधिक ऑफसेट मशीन भी उपलब्ध हो गए थे । अखबार दिन दुगनी रात चौगुनी गति से समय पर पाठकों के पास पहुंचने शुरू हो गए थे। झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबारों के लिए यह सबसे स्वर्णिम काल था। झारखंड की राजधानी रांची में राष्ट्रीय अखबारों की तरह स्थानीय अखबारों के भी बड़े-बड़े ऑफिस खुलने लगे थे। संपादकों के लिए अलग से केबिन बन गए थे। पत्रकार सुसज्जित ऑफिस में काम करने लगे थे ।
राष्ट्रीय स्तर के अख़बारों का प्रकाशन
अब यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि झारखंड से भी राष्ट्रीय स्तर के अखबारों जैसे अखबार के प्रकाशित हो रहे है। यह इस प्रांत के लिए बड़ी अच्छी बात है। जब झारखंड से पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था ,तब सीमित संसाधनों के बीच यहां के पत्रकारों और संपादकों को काम करना पड़ता था। इसके बावजूद झारखंड के अखबार बड़ी से बड़ी घटनाओं की खबरें अखबारों में छापते रहें थे ।झारखंड के पाठक देश की कोई भी राजनीतिक खबरें व देश-विदेश की खबरों से वंचित न रह जाएं, उन तक सूचनाओं को जल्द से जल्द पहुंचाते रह रहें हैं। झारखंड के पत्रकार, पत्रकारिता के प्रति सदा कृत संकल्पित और निष्ठावान बने रहे हैं। आज इसी का प्रतिफल है कि झारखंड से राष्ट्रीय स्तर के कई अखबार प्रकाशित हो रहे हैं।
झारखंड के अख़बार पूरे देश में पढ़े जाते हैं
यह लिखते हुए गौरव महसूस करता हूं कि झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबार देश के विभिन्न हिंदी प्रदेशों में बहुत ही चाव के साथ पढ़े जा रहे हैं। चूंकि इंटरनेट और डिजिटल का युग है। झारखंड से प्रकाशित होने वाले लगभग सभी हिंदी दैनिक अखबार इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। आज करोड़ों की संख्या में झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबार इंटरनेट पर पढ़े जा रहे हैं। यह भी जानकारी मिली है कि विदेशों में भी झारखंड से प्रकाशित होने वाले अखबार को बहुत ही चाव के साथ पढ़े जा रहे हैं।