सभ्यताओं का संघर्ष नहीं, मानवता का संवाद चाहिए: कर्नल (डॉ.) बलदेव सिंह ‘मानव’

युद्ध की शुरुआत हथियारों से नहीं, विचारों से होती है; शांति के लिए मन में प्रेम, करुणा और सह-अस्तित्व की भावना विकसित करना जरूरी, ‘पहले मानव, फिर पहचान’ के संदेश के साथ वैश्विक शांति, धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों को अपनाने की अपील।

Oct 12, 2026 - 18:39
सभ्यताओं का संघर्ष नहीं, मानवता का संवाद चाहिए: कर्नल (डॉ.) बलदेव सिंह ‘मानव’

विशेष लेख आधुनिक दुनिया में युद्ध, हिंसा और वैचारिक टकराव की बढ़ती आशंकाओं के बीच मानवता, सह-अस्तित्व और वैश्विक शांति का प्रश्न पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। हथियारों, मिसाइलों और युद्धक विमानों से दुनिया की सुरक्षा तो की जा सकती है, लेकिन स्थायी शांति के लिए मनुष्य के विचारों में सकारात्मक बदलाव लाना आवश्यक है। जब मन में ‘मैं’ और ‘वह’, ‘हम’ और ‘वे’ की दीवारें खड़ी हो जाती हैं, तब सामाजिक विभाजन से लेकर अंतरराष्ट्रीय संघर्ष तक की परिस्थितियां पैदा होने लगती हैं। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है, “चूंकि युद्ध मनुष्यों के मस्तिष्क में शुरू होते हैं, इसलिए शांति की रक्षा भी मनुष्यों के मस्तिष्क में ही निर्मित की जानी चाहिए।” यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना इसकी स्थापना के समय था। कर्नल (डॉ.) बलदेव सिंह ‘मानव’ ने अपने विचारपरक लेख में मानवता को सर्वोपरि मानने, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने और सभ्यताओं के बीच टकराव के बजाय संवाद स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। फ्लाईदुबई की घटना ने फिर खड़े किए गंभीर सवाल 30 सितंबर 2026 को फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 के कॉकपिट में हुई कथित हिंसक घटना ने विमानन सुरक्षा के साथ-साथ मानवीय व्यवहार और विचारों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, दुबई से तेल अवीव जा रही उड़ान में सह-पायलट द्वारा कप्तान पर हमला किए जाने की सूचना सामने आई। बताया गया कि विमान ने अचानक ऊंचाई खो दी और बाद में सऊदी अरब के तबुक में सुरक्षित उतारा गया। हालांकि, घटना की परिस्थितियों और उद्देश्य के संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए। किसी एक घटना के आधार पर किसी धर्म, समुदाय या सभ्यता को सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। यह घटना व्यापक स्तर पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर उठाती है कि क्या मानवता का अगला संघर्ष केवल देशों की सीमाओं पर होगा या मनुष्यों के विचारों के भीतर भी जारी रहेगा? ‘पहले मानव, फिर पहचान’ का संदेश अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुअल पी. हंटिंगटन ने अपनी चर्चित पुस्तक द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस एंड द रीमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर में शीतयुद्ध के बाद विश्व राजनीति में सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान के आधार पर संघर्ष बढ़ने की आशंका व्यक्त की थी। लेकिन सभ्यताओं के बीच संघर्ष को मानवता का अपरिहार्य भविष्य मान लेना उचित नहीं होगा। इसके बजाय दुनिया को यह विचार करना चाहिए कि विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और विचारधाराओं के बीच संवाद तथा सहयोग को कैसे बढ़ावा दिया जाए। लेखक का मानना है कि मनुष्य की पहली पहचान उसकी मानवता होनी चाहिए। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, राष्ट्र और राजनीतिक विचारधारा उसकी अन्य पहचानें हैं, लेकिन इन सबसे ऊपर मानवीय गरिमा का स्थान होना चाहिए। इसी विचार को व्यक्त करने के लिए वे अपने नाम के साथ ‘मानव’ लिखते हैं। उनका संदेश है—पहले मानव, फिर पहचान; पहले जीवन, फिर विचार; और पहले करुणा, फिर मतभेद। भारतीय संस्कृति में निहित है विश्वशांति का संदेश भारतीय चिंतन सदियों से विविधता में एकता, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व का संदेश देता आया है। महाउपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य है— “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥” अर्थात, यह अपना है और वह पराया है—ऐसी सोच संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक है। उदार हृदय वाले लोगों के लिए संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है। भगवद्गीता का समदर्शिता का संदेश भी मानवता को एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। गीता के छठे अध्याय के 29वें श्लोक में सभी प्राणियों में अपने आत्मस्वरूप और अपने भीतर सभी प्राणियों को देखने की भावना व्यक्त की गई है। इसी प्रकार, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की प्रार्थना सभी के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करती है। यह किसी एक धर्म, समुदाय या राष्ट्र की विजय की कामना नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के मंगल का संदेश है। स्वामी विवेकानंद का सार्वभौमिक स्वीकार का विचार वर्ष 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने अपने संबोधन की शुरुआत ‘अमेरिका के बहनों और भाइयों’ के भावपूर्ण संबोधन से की थी। उनके विचार धार्मिक सहिष्णुता और विभिन्न आस्थाओं को स्वीकार करने की भावना पर आधारित थे। आज भी उनके संदेश की प्रासंगिकता बनी हुई है। यदि धर्म मनुष्य को प्रेम, करुणा, क्षमा और आत्मसंयम सिखाता है, तो धर्म के नाम पर घृणा और हिंसा को बढ़ावा देना किस प्रकार उचित ठहराया जा सकता है? इसी तरह, यदि राष्ट्र का उद्देश्य अपने नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण है, तो राष्ट्रवाद को मानवता के विरुद्ध खड़ा नहीं होना चाहिए। दलाई लामा सहित अनेक वैश्विक विचारकों ने भी करुणा, सहिष्णुता और मानवीय समानता को शांति का आधार माना है। शिक्षा बने शांति का माध्यम, नफरत का नहीं स्थायी शांति के लिए केवल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना पर्याप्त नहीं है। बच्चों और युवाओं के मन में भी सहिष्णुता, संवेदनशीलता और दूसरों के विचारों का सम्मान करने की भावना विकसित करनी होगी। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को यह सिखाया जाना चाहिए कि असहमति का अर्थ शत्रुता नहीं है। अलग-अलग विचार होना प्रकृति और समाज का स्वाभाविक गुण है। दो व्यक्तियों की रुचियां, विचार और दृष्टिकोण पूरी तरह समान नहीं हो सकते। ऐसे में पूरी मानवता से एक जैसी सोच रखने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। असहमति को स्वीकार करना सभ्यता है, जबकि असहमति के कारण हिंसा करना बर्बरता है। लेखक का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और शांतिप्रिय नागरिक तैयार करना भी होना चाहिए। धार्मिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व को भी अपने व्यवहार तथा वक्तव्यों में सद्भाव और जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए। वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग जरूरी आज जलवायु परिवर्तन, जल संकट, महामारी, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, गरीबी और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। इन समस्याओं का समाधान अंतरराष्ट्रीय सहयोग, पारदर्शिता, जवाबदेही और संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग से ही संभव है। महात्मा गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। गांधी का विचार था कि धन, संपत्ति और प्रतिभा का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी किया जाना चाहिए। इसी भावना को व्यापक रूप देते हुए यह विचार किया जा सकता है कि राष्ट्र भी पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार संरक्षक बनें। हवा, पानी, सूर्य का प्रकाश और प्रकृति के अनेक उपहार किसी एक धर्म या राष्ट्र तक सीमित नहीं हैं। इसलिए वैश्विक संसाधनों के संरक्षण और न्यायपूर्ण उपयोग में सभी देशों की जिम्मेदारी है। ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ नहीं, ‘डायलॉग ऑफ सिविलाइजेशंस’ लेखक का विचार है कि दुनिया को सभ्यताओं के संघर्ष की अवधारणा से आगे बढ़कर सभ्यताओं के संवाद की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों को एक-दूसरे को मिटाने के बजाय एक-दूसरे से सीखने का अवसर तलाशना चाहिए। ऐसी दुनिया का निर्माण आवश्यक है, जहां आस्तिक और नास्तिक, सभी धर्मों के अनुयायी तथा अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े लोग समान मानवीय गरिमा के अधिकारी हों। जहां राष्ट्र अपनी सीमाओं की रक्षा करें, लेकिन मानवता को सीमाओं में कैद न करें। जहां शक्ति का अर्थ कमजोरों को दबाना नहीं, बल्कि उनकी रक्षा करना हो। राजनीतिक नेताओं, धार्मिक गुरुओं, शिक्षाविदों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को आत्ममंथन करना होगा कि बच्चों के मन में घृणा भरकर शांति की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यदि हर राष्ट्र अपने हितों को मानवता से ऊपर रखेगा और प्रत्येक सभ्यता दूसरे को पराजित करने में अपनी श्रेष्ठता खोजेगी, तो अंततः इसका नुकसान पूरी दुनिया को उठाना पड़ेगा। मानवता की विजय ही सच्ची सभ्यता फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 से जुड़ी घटना की वास्तविक परिस्थितियों का निर्धारण जांच के आधार पर होना चाहिए। लेकिन इससे व्यापक रूप में जुड़ा मानवीय संदेश स्पष्ट है कि स्थायी शांति के लिए मनुष्य के विचारों, व्यवहार और सामाजिक दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन आवश्यक है। कर्नल (डॉ.) बलदेव सिंह ‘मानव’ का संदेश है कि दुनिया को यह तय करना होगा कि वह धर्म, जाति, क्षेत्र, राष्ट्र और विचारधारा के आधार पर विभाजित रहना चाहती है या इन सभी पहचानों का सम्मान करते हुए मानवता को सर्वोच्च नैतिक आधार बनाना चाहती है। उनका स्पष्ट विचार है—पहले मानव, फिर पहचान; पहले जीवन, फिर विचार; पहले करुणा, फिर मतभेद। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, धार्मिक संस्थानों, संसदों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के व्यवहार में उतारकर ही शांति की मजबूत नींव रखी जा सकती है। सभ्यताओं की श्रेष्ठता एक-दूसरे को पराजित करने में नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण में योगदान देने में है। अंततः महत्वपूर्ण यह नहीं कि कौन-सा धर्म, राष्ट्र या विचारधारा विजयी होती है, बल्कि यह है कि मानवता सुरक्षित रहती है या नहीं। मानवता की सच्ची विजय घृणा पर प्रेम, हिंसा पर अहिंसा, असहिष्णुता पर सह-अस्तित्व, विभाजन पर एकता और विनाश पर जीवन की विजय है। यही सच्ची सभ्यता है—‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ नहीं, बल्कि ‘सिविलाइजेशंस फॉर ह्यूमैनिटी’।

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