झारखंड में अब 'कचरे' से चमकेगी किस्मत! सरकार और यूनिसेफ की पहल, जानें क्या है 'वेस्ट टू वेल्थ' प्लान

Jul 9, 2026 - 19:11
झारखंड में अब 'कचरे' से चमकेगी किस्मत! सरकार और यूनिसेफ की पहल, जानें क्या है 'वेस्ट टू वेल्थ' प्लान

RANCHI : झारखंड के ग्रामीण इलाकों की सूरत बदलने और कचरा प्रबंधन को एक नये स्तर पर ले जाने के लिए राज्य सरकार ने कमर कस ली है. राजधानी रांची के बीएनआर चाणक्य में आयोजित एक राज्य स्तरीय कार्यशाला में 'ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026' के प्रभावी क्रियान्वयन पर विस्तृत चर्चा की गई. पेयजल एवं स्वच्छता विभाग और यूनिसेफ (UNICEF) के इस साझा प्रयास का मुख्य उद्देश्य कचरे को बोझ नहीं, बल्कि आय का साधन बनाना है.

कचरा अब बोझ नहीं, संसाधन है: मंत्री

कार्यशाला को संबोधित करते हुए झारखंड सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री योगेन्द्र प्रसाद ने कहा कि अब हमें कचरे को बोझ के रूप में देखना बंद करना होगा. उन्होंने 'वेस्ट टू वेल्थ' (कचरे से कंचन) और 'वेस्ट टू एनर्जी' (कचरे से ऊर्जा) जैसी पहलों को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया. मंत्री महोदय ने स्पष्ट किया कि कचरे के पुनर्चक्रण (Recycling), कंपोस्टिंग और प्लास्टिक कचरा प्रबंधन से न केवल पर्यावरण बचेगा, बल्कि आर्थिक लाभ भी होगा.

इन विभागों के बीच बनेगा तालमेल

इस महत्वपूर्ण बैठक में केवल एक विभाग नहीं, बल्कि पेयजल एवं स्वच्छता, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, वन एवं पर्यावरण विभाग और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. अधिकारियों ने कहा कि 16वें वित्त आयोग के अनुदान, मनरेगा और स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के बीच प्रभावी तालमेल से ही वैज्ञानिक तरीके से कचरा प्रबंधन संभव है.

SDG लक्ष्यों की प्राप्ति और बच्चों का स्वास्थ्य

यूनिसेफ झारखंड की प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि प्रभावी कचरा प्रबंधन का सीधा असर बच्चों के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण पर पड़ता है. यह पहल सतत विकास लक्ष्यों (SDG), विशेषकर अच्छे स्वास्थ्य (SDG-3) और स्वच्छ जल एवं स्वच्छता (SDG-6) को हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगी.

स्वयं सहायता समूहों को मिलेगा रोजगार

कार्यशाला में पंचायती राज निदेशक ने बताया कि स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से 'हरित आजीविका' और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएंगे. लक्ष्य यह है कि झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों को 'स्वच्छ, स्वस्थ और जलवायु-सहिष्णु' मॉडल के रूप में विकसित किया जाए.

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