शब्दवीणा की साहित्यिक भेंटवार्ता 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' में महावीर सिंह वीर की रचनाएँ सुन मंत्रमुग्ध हुए श्रोता, सभी भाषाओं में सबसे अधिक समृद्ध है हिन्दी, ये सारे विश्व ने माना, मगर हमने नहीं माना
गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था शब्दवीणा ने हिन्दी दिवस के सुअवसर पर साहित्यिक भेंटवार्ता सत्यम् शिवम् सुंदरम् का आयोजन किया, जिसमें आमंत्रित साहित्यकार के रूप में 'शब्दवीणा' के राष्ट्रीय सचिव व उत्तराखंड प्रदेश समिति के संरक्षक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के सहायक कुलसचिव (छात्र कल्याण) कवि श्री महावीर सिंह 'वीर' रहे। बतौर वार्ताकार शब्दवीणा की हरियाणा प्रदेश सचिव कवयित्री सरोज कुमार ने श्री वीर से बतौर मंचीय कवि एवं शिक्षाविद उनके जीवन संघर्षों, लेखन और शैक्षणिक जिम्मेदारियों के बीच बनाए गए संतुलन, हिन्दी साहित्य एवं कविताओं के अतीत, वर्तमान एवं भविष्य, हिन्दी साहित्य पर सोशल मीडिया के प्रभाव तथा हिन्दी दिवस मनाए जाने के औचित्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सारगर्भित प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर श्री वीर ने बड़ी ही विनम्रता, शालीनता, संवेदनशीलता एवं गंभीरता के साथ दिया। महावीर सिंह 'वीर' ने एक से बढ़कर एक मुक्तक, गीत, ग़ज़लें, एवं कुंडलिया छंद सुनाए। उन्होंने अपने मुक्तक संग्रह 'वीर के तीर' से मुक्तकों को सुनाते हुए एक प्रभावशाली मुक्तक लेखन के लिए आवश्यक सूत्र बताए। कार्यक्रम का संयोजन शब्दवीणा की संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रश्मि प्रियदर्शनी के नेतृत्व में संस्था की राष्ट्रीय समिति ने किया।
यह साहित्यिक भेंटवार्ता एक घंटा चालीस मिनटों तक चली। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण शब्दवीणा केन्द्रीय फेसबुक पेज से किया गया, जिसके माध्यम से जैनेन्द्र कुमार मालवीय, निगम राज़, राम नाथ बेख़बर, प्यारचंद कुमार मोहन, महेश चंद्र शर्मा राज़, हीरा लाल साव, मधु वशिष्ठ, सुरेश विद्यार्थी, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, अजय कुमार, ललित शंकर, डॉ विजय शंकर, डॉ पारुल राज, डॉ वीरेंद्र कुमार, सुमन मिश्रा, अनुराग दीक्षित, डॉ रवि प्रकाश एवं डॉ रश्मि प्रियदर्शनी सहित देश के विभिन्न प्रदेशों से जुड़े साहित्यानुरागियों ने महावीर सिंह वीर के प्रेरक संदेशों एवं विचारों का लाभ उठाया। मुक्तक सम्राट के रूप में चर्चित महावीर सिंह वीर के बेहतरीन मुक्तक, गीत एवं गज़लें सुनकर आनंदित हुए।
हिन्दी भाषा को समर्पित श्री वीर के मुक्तक "आप थोड़ा-सा सँवारोगे, सँवर जाएगी। प्यार से बोलोगे तो दिल में उतर जाएगी। ये तो इस देश के कण-कण में बसी है यारों। तुम न सोचो कि ये हिन्दी कभी मर जाएगी" एवं "हमारी मातृभाषा का बना संसार दीवाना। मगर हम हिन्द वालों ने न इसका मोल पहचाना। सभी भाषाओं में सबसे अधिक समृद्ध है हिन्दी। ये सारे विश्व ने माना, मगर हमने नहीं माना" को खूब सराहना मिली। महावीर सिंह वीर ने राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रश्मि एवं अन्य साहित्यप्रेमियों के अनुरोध पर अपनी लोकप्रिय ग़ज़ल "जाने कितने दुश्मन पाले बैठे हैं, हम अपना किरदार संभाले बैठे हैं" भी मधुर स्वर में सुनाया। कार्यक्रम के दरम्यान महावीर सिंह वीर ने शब्दवीणा द्वारा चलाई जा रही मुक्तक कार्यशाला का लाभ उठाने के लिए नए रचनाकारों का आह्वान किया तथा सरोज कुमार ने शब्दवीणा द्वारा "साहित्य की पाठशाला" चलाने का दायित्व उठाया।