पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘हर घर नल का जल’ योजना में 57 अनुबंध रद्द करने का आदेश निरस्त, ठेकेदार को ब्याज सहित भुगतान का निर्देश
पटना: बिहार की महत्वाकांक्षी ‘हर घर नल का जल’ योजना से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने एक ठेकेदार के 57 अनुबंध रद्द करने और उसे ब्लैकलिस्ट करने से संबंधित कार्रवाई को निरस्त कर दिया। साथ ही विभाग को ठेकेदार का बकाया भुगतान दो महीने के भीतर ब्याज सहित करने का निर्देश दिया है।
पटना: बिहार की महत्वाकांक्षी ‘हर घर नल का जल’ योजना से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने एक ठेकेदार के 57 अनुबंध रद्द करने और उसे ब्लैकलिस्ट करने से संबंधित कार्रवाई को निरस्त कर दिया। साथ ही विभाग को ठेकेदार का बकाया भुगतान दो महीने के भीतर ब्याज सहित करने का निर्देश दिया है।
अदालत के इस आदेश को सरकारी विभागों की प्रशासनिक जवाबदेही और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बिना नोटिस अनुबंध रद्द करने पर कोर्ट की नाराजगी
मामले के अनुसार, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ने मेसर्स एनएस इंटरप्राइजेज के 57 अनुबंध रद्द कर दिए थे। विभाग की कार्रवाई में बैंक गारंटी और सुरक्षा राशि से संबंधित दस्तावेजों पर सवाल उठाए गए थे। ठेकेदार की ओर से आरोप लगाया गया कि विभाग ने बिना पूर्व नोटिस दिए और उसका पक्ष सुने बिना एकतरफा कार्रवाई की।
इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस गिरिजेश कुमार की एकल पीठ ने विभाग की कार्रवाई को कानून के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति या व्यावसायिक संस्था के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उचित प्रक्रिया अपनाना और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी है।
अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हवाला
हाईकोर्ट ने मामले में संविधान के अनुच्छेद 14 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, सरकारी विभागों को भी अपने फैसले लेते समय निष्पक्षता और कानून का पालन करना चाहिए। बिना उचित प्रक्रिया अपनाए किसी ठेकेदार के अनुबंध रद्द करना और उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करना स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभाग को बैंक गारंटी या अन्य दस्तावेजों की वैधता पर संदेह था, तो उसे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच करनी चाहिए थी। दस्तावेजों में कथित कमियों के आधार पर बिना सुनवाई के कार्रवाई करना उचित नहीं है।
काम पूरा होने के बाद भी रुका था भुगतान
मामला अररिया और फारबिसगंज प्रखंडों में ‘हर घर नल का जल’ और मुख्यमंत्री निश्चय योजना के तहत किए गए कार्यों से संबंधित है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, ठेकेदार ने संबंधित कार्य पूरे किए थे और विभाग की ओर से संतोषजनक कार्य प्रमाणपत्र भी जारी किए गए थे। इसके बावजूद भुगतान लंबित रहने का मामला अदालत के सामने आया।
ठेकेदार की ओर से बकाया राशि दिलाने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने इस पहलू पर विचार करते हुए भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 70 का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि जब किसी पक्ष की सेवाओं या कार्य का लाभ लिया गया हो, तो कानून के अनुरूप उसका भुगतान करने के दायित्व पर विचार करना आवश्यक है।
1.85 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान दो महीने में करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने मेसर्स एनएस इंटरप्राइजेज की 1,85,98,200 रुपये की बकाया राशि का भुगतान दो महीने के भीतर ब्याज सहित करने का निर्देश दिया है। यह राशि एक करोड़ 85 लाख 98 हजार 200 रुपये है।
अदालत ने संबंधित अनुबंधों को रद्द करने और ब्लैकलिस्ट करने से जुड़ी कार्रवाई को निरस्त कर दिया। इससे ठेकेदार को राहत मिली है।
नए सिरे से जांच कर सकता है विभाग
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभाग को दस्तावेजों या बैंक गारंटी को लेकर कोई संदेह है, तो वह कानून के दायरे में रहकर उचित प्रक्रिया अपनाते हुए नए सिरे से जांच कर सकता है। हालांकि, ऐसी किसी भी कार्रवाई में संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना होगा।
इस आदेश से सरकारी विभागों के लिए यह संदेश सामने आता है कि अनुबंधों से जुड़े विवादों में नियमों और कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। ‘हर घर नल का जल’ योजना से जुड़े इस मामले में अब निर्धारित समय के भीतर बकाया भुगतान और आगे की संभावित कार्रवाई पर नजर रहेगी।
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