गोवर्धन प्रसाद सदय की 101वीं जयंती पर साहित्यिक विमर्श, ‘सहयात्री’ पत्रिका का लोकार्पण
साहित्य, संस्कृति और लोकजीवन के समन्वय के प्रतीक थे सदय जी, वक्ताओं ने रामाख्यान के विभिन्न पक्षों पर रखे विचार
गयाजी। जगजीवन महाविद्यालय के बीसीए सभागार में रविवार को साहित्यकार गोवर्धन प्रसाद सदय की 101वीं जयंती के अवसर पर सम्मान समारोह एवं साहित्यिक विमर्श का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने सदय जी के साहित्यिक योगदान, उनकी भाषा-शैली, व्यक्तित्व और गया की साहित्यिक परंपरा में उनके महत्त्वपूर्ण स्थान को याद किया। इस अवसर पर साहित्यिक पत्रिका ‘सहयात्री’ के विशेष अंक का लोकार्पण भी किया गया। वक्ताओं ने कहा कि सदय केवल नाम ही नहीं, बल्कि सहृदय व्यक्तित्व के भी प्रतीक थे। उनकी भाषा का प्रवाह और अभिव्यक्ति की सहजता विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। गया के साहित्यकारों से उनका गहरा और दीर्घकालीन जुड़ाव रहा। यही कारण था कि शहर के साहित्यिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति विशेष महत्त्व रखती थी। गया जिला प्रशासन की पत्रिका ‘तर्पण’ के प्रारंभ में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम का शुभारंभ सम्मानित साहित्यकार प्रो. विनोद कुमार मंगलम, जगजीवन महाविद्यालय के प्रधानाचार्य, डॉ. मो. ऐयूब, साहित्य महापरिषद के अध्यक्ष डॉ. राम सिंहासन सिंह, मुंगेर विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति प्रो. रंजीत कुमार वर्मा, परिषद के महामंत्री राजीव रंजन, प्रो. वीरेंद्र कुमार सिंह तथा डॉ. वी.के.पी. वर्मा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। अतिथियों के स्वागत के बाद ‘सहयात्री’ पत्रिका के विशेष अंक का लोकार्पण किया गया। इस अंक की विशेषता यह रही कि इसके संपादन का दायित्व डॉ. प्रदीप कुमार को सौंपा गया है। साहित्य और संस्कृति से जुड़ना समय की जरूरत : डॉ. राम सिंहासन सिंह कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साहित्य महापरिषद के अध्यक्ष डॉ. राम सिंहासन सिंह ने कहा कि आज हम साहित्य एवं संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। गया की धरती अत्यंत पवित्र रही है। यह न केवल सांस्कृतिक तीर्थ का केंद्र है, बल्कि साहित्यिक तीर्थ के रूप में भी इसकी विशिष्ट पहचान है। उन्होंने कहा कि गोवर्धन प्रसाद सदय ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का कार्य किया। गया में 1990 के बाद सदय युग का प्रारंभ माना जा सकता है। उनका ‘रामाख्यान’ मूलतः वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। उन्होंने प्रो. विनोद कुमार मंगलम को सम्मानित किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्य महापरिषद उनके सम्मान से स्वयं गौरवान्वित महसूस कर रहा है। राम समाज को गति देने वाले महानायक : डॉ. संगीता कुमारी जगजीवन महाविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. संगीता कुमारी ने कहा कि राम जन-मन में रचे-बसे हैं। वाल्मीकि से लेकर तुलसीदास तक राम की अविरल साहित्यिक परंपरा में वे अपने-अपने युग के प्रतिनिधि नायक के रूप में उपस्थित रहे हैं। राम समाज को गति देने वाले महानायक हैं। उनके चरित्र में परंपरा की गतिशीलता का ऐसा प्रवाह दिखाई देता है, जो उन्हें हर युग में प्रासंगिक बनाता है। राम के माध्यम से लोग संशय से आस्था तक की यात्रा तय करते रहे हैं। सदय के साहित्य पर शोध की व्यापक संभावनाएं : प्रो. सुनील कुमार मगध विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक प्रो. सुनील कुमार ने कहा कि सत्य और न्याय की स्थापना करना साहित्य का मूल धर्म है। सदय जी के साहित्य से परिचित होने के बाद उन्हें लगा कि यह ऐसे साहित्यकार का व्यक्तित्व है, जिनके साहित्य पर गंभीर शोध होना चाहिए। उन्होंने बताया कि सदय जी पर शोधकार्य कराने वाले वे पहले व्यक्ति हैं। उनके अनुसार, जो साहित्य बार-बार पाठक को आह्लादित करे, वही उदात्त साहित्य की श्रेणी में आता है। राम राष्ट्र की मर्यादा के प्रतीक : सच्चिदानंद प्रेमी सुप्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानंद प्रेमी ने कहा कि ‘रामाख्यान’ की भूमिका नलिन जी के घर में रखी गई थी। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि रामायण में गया का उल्लेख भी मिलता है। राम राष्ट्र की मर्यादा के प्रतीक हैं और उनका चरित्र भारतीय सांस्कृतिक चेतना में विशेष स्थान रखता है। सदय जी का व्यक्तित्व सहज, सरल और प्रेरणादायी था : प्रो. रंजीत कुमार वर्मा मुंगेर विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति प्रो. रंजीत कुमार वर्मा ने कहा कि सदय जी का व्यक्तित्व सहज, सरल और प्रेरणादायी था। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की, तब गया का साहित्यिक वातावरण एक नई दिशा में आगे बढ़ा। उन्होंने कहा कि वे विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं और इस अनुभव के आधार पर मानते हैं कि विज्ञान के विद्यार्थियों का साहित्य से अविभाज्य संबंध है। साहित्य और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं तथा दोनों मनुष्य की समझ को व्यापक बनाते हैं। राम के चरित्र में लोकतांत्रिक मूल्यों की अभिव्यक्ति : प्रो. विनोद कुमार मंगलम सम्मानित साहित्यकार प्रो. विनोद कुमार मंगलम ने राम के विविध साहित्यिक एवं दार्शनिक पक्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना ‘बंदउँ रघुवर’ से की, जबकि कबीर ने राम के चार स्वरूपों का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि समय के साथ केवल साहित्य ही नहीं बदलता, बल्कि साहित्य को देखने और समझने का दृष्टिकोण भी बदलता है। उन्होंने राम के वनवास के प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि कैकेयी का दृष्टिकोण अपने पुत्र भरत को राजा बनाए रखने की इच्छा से प्रेरित था। राम सभी सामाजिक वर्गों को साथ लेकर चलते हैं, जो उनके चरित्र में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों को रेखांकित करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय वाङ्मय में राम और कृष्ण दो ऐसे महानायक हैं, जिनका प्रभाव व्यापक है। रामकाव्य की सबसे बड़ी विशेषता ज्ञान और अनुशासन तथा लोक और शास्त्र के बीच समन्वय स्थापित करना है। कार्यक्रम का संचालन साहित्य महापरिषद के महामंत्री राजीव रंजन ने किया। अंत में कार्यक्रम के संयोजक एवं ‘सहयात्री’ पत्रिका के नवनियुक्त संपादक डॉ. प्रदीप कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। समारोह में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और साहित्यप्रेमियों की सहभागिता रही।
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