21 की उम्र में फिल्म निर्माण का बड़ा दांव, सालों की कमाई लगाकर अनुप्रिया ने बनाई ‘हनुमान अंश’
मुंबई: फिल्मी दुनिया में कदम रखना और करोड़ों रुपये की फिल्म बनाना किसी अनुभवी निर्माता के लिए भी आसान नहीं होता। लेकिन 21 साल की अनुप्रिया नागर ने अपनी मेहनत की कमाई दांव पर लगाकर ऐसा कर दिखाया। उन्होंने फिल्म ‘हनुमान अंश’ के निर्माण में अपनी वर्षों की बचत लगा दी। बेहद सीमित बजट में बनी यह फिल्म अब बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल कर चुकी है।
मुंबई: फिल्मी दुनिया में कदम रखना और करोड़ों रुपये की फिल्म बनाना किसी अनुभवी निर्माता के लिए भी आसान नहीं होता। लेकिन 21 साल की अनुप्रिया नागर ने अपनी मेहनत की कमाई दांव पर लगाकर ऐसा कर दिखाया। उन्होंने फिल्म ‘हनुमान अंश’ के निर्माण में अपनी वर्षों की बचत लगा दी। बेहद सीमित बजट में बनी यह फिल्म अब बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल कर चुकी है।
अनुप्रिया का फिल्म इंडस्ट्री में आने का कोई पहले से तय प्लान नहीं था। वह इकोनॉमिक्स की पढ़ाई कर रही थीं। एक असाइनमेंट के दौरान उन्हें स्टीव जॉब्स और नीम करोली बाबा के बीच आध्यात्मिक जुड़ाव के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उनकी रुचि नीम करोली बाबा के जीवन और विचारों को जानने में बढ़ती चली गई और इसी से फिल्म बनाने का विचार सामने आया।
खास बात यह है कि अनुप्रिया ने विदेश में पार्ट-टाइम काम करके जो बचत की थी, उसे फिल्म बनाने में लगा दिया। उन्होंने एक सुरक्षित करियर विकल्प छोड़कर इस प्रोजेक्ट पर भरोसा किया। शुरुआत में यह फैसला काफी बड़ा जोखिम था, लेकिन उन्हें विश्वास था कि नीम करोली बाबा की कहानी और उनका संदेश युवाओं तक पहुंचना चाहिए।
अनुप्रिया ने एक इंटरव्यू में बताया कि उन्हें नीम करोली बाबा के बारे में एक विदेशी व्यक्ति से जानकारी मिली थी। इस अनुभव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि जिस संत की शिक्षाओं से विदेशों में भी लोग प्रभावित हैं, उनके बारे में भारत के युवाओं को भी ज्यादा जानना चाहिए।
‘हनुमान अंश’ नीम करोली बाबा के जीवन और आध्यात्मिक विचारों पर आधारित फिल्म है। करीब 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने उम्मीद से कहीं ज्यादा सफलता हासिल की और बाद में 100 करोड़ रुपये का आंकड़ा भी पार कर लिया।
अनुप्रिया की कहानी सिर्फ एक फिल्म की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह कम उम्र में बड़े जोखिम लेने, अपने विश्वास पर कायम रहने और एक विचार को पर्दे तक पहुंचाने की कहानी भी है। जिस प्रोजेक्ट में उन्होंने अपनी वर्षों की बचत लगा दी थी, वही आज उनकी पहचान बन चुका है।
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