चेक बाउंस मामले में आरोपी की अपील याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखा

निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए सबूतों की जांच-पड़ताल के बाद याचिकाकर्ता को N.I. एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध का दोषी ठहराया और उसे एक साल की साधारण कैद की सज़ा सुनाई, साथ ही ₹65,000 का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था।

Aug 20, 2026 - 18:32
चेक बाउंस मामले में आरोपी की अपील याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को बरकरार रखा

रांची उच्च न्यायालय के जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए जमशेदपुर के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा वर्ष 2016 में पारित दोषसिद्धि और सज़ा के आदेश को  ने बरकरार रखा है। इस आदेश के तहत याचिकाकर्ता को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया गया था और एक साल की साधारण कैद के साथ 65,000 रुपये का मुआवज़ा देने की सज़ा सुनाई गई थी।

क्या है पूरा मामला?

मामले में शिकायतकर्ता बुधदेव गिरी ने वर्ष 2013 में एक शिकायत केस दर्ज कराया था। इसमें कहा गया था कि आरोपी, दुललाल चटर्जी (जो M/s बंगाल टाइगर सिक्योरिटी सर्विसेज के मालिक हैं), ने शिकायतकर्ता से 50,000 रुपये का दोस्ताना लोन लिया था। इस लोन को चुकाने के लिए, आरोपी ने अपनी प्रोप्राइटरशिप फर्म की ओर से 50,000 रुपये का एक अकाउंट पेयी चेक शिकायतकर्ता के नाम जारी किया था। शिकायतकर्ता बुधदेव गिरी ने यह चेक भुनाने के लिए अपने बैंक में जमा किया, लेकिन चेक बाउंस हो गया। इसके बाद, शिकायतकर्ता ने रजिस्टर्ड पोस्ट (A/D के साथ) से 17.06.2013 को एक कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें 15 दिनों के भीतर चेक की रकम की मांग की गई थी। हालाँकि, आरोपी तय समय के भीतर रकम का भुगतान करने में विफल रहा और अपने वकील के माध्यम से 05.07.2013 को कानूनी नोटिस का जवाब भेजा। इन हालात में, यह दावा किया गया है कि आरोपी ने N.I. एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध किया है और इसी आधार पर शिकायत का मामला दर्ज किया गया है।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी याचिकाकर्ता के खिलाफ N.I. एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध का संज्ञान लिया। आरोपी के पेश होने पर, उसे आरोपों का सार समझाया गया, जिस पर उसने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमे का सामना करने का दावा किया।

मामले को साबित करने के लिए आरोपी ने Cr.P.C. की धारा 313 के तहत दर्ज अपने बयान में खुद को बेगुनाह बताया।

निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए सबूतों की जांच-पड़ताल के बाद याचिकाकर्ता को N.I. एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध का दोषी ठहराया और उसे एक साल की साधारण कैद की सज़ा सुनाई, साथ ही ₹65,000 का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था। दोषी (याचिकाकर्ता) ने इस आदेश के ख़िलाफ़ अपील दायर की, जिसे अपीलीय अदालत के दोषी ठहराने के फैसले और सज़ा के आदेश को सही मानते हुए खारिज कर दिया गया। इसी फैसले को इस उच्च न्यायालय के रिविज़न याचिका में चुनौती दी गई है थी।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निचली दोनों अदालतों द्वारा दिए गए फैसले/आदेश न तो कानून की नज़र में और न ही मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर टिकने लायक हैं, और इन्हें रद्द किया जाना चाहिए। आगे यह भी कहा गया है कि शिकायत ही कानूनी रूप से सही नहीं थी और इसे खारिज कर दिया जाना चाहिए था, क्योंकि शिकायतकर्ता N.I. एक्ट की धारा 138 के प्रावधानों को लागू करने के लिए ज़रूरी बुनियादी शर्तें साबित करने में नाकाम रहा और ₹50,000 की कथित रकम के लिए याचिकाकर्ता की कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य देनदारी भी साबित नहीं कर पाया। निचली अदालतें इस बात पर भी ध्यान देने में नाकाम रहीं कि जिस चेक का मामला है, उसे न तो याचिकाकर्ता ने भरा था और न ही जारी किया था।  याचिकाकर्ता के वकील ने हाईकोर्ट से आग्रह किया कि इस पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार किया जाए।

ठीक इसके विपरीत, राज्य के A.P.P. और विपक्षी पार्टी नंबर 2 के विद्वान वकील ने याचिकाकर्ता की ओर से उठाए गए तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि निचली अदालतों ने सबूतों का सही मूल्यांकन किया है और N.I. एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध के लिए याचिकाकर्ता की दोषी होने के बारे में एक जैसी राय दर्ज की है। इसमें कोई गैर-कानूनी बात या अनुचितता नहीं है जिसके लिए इस रिवीजन में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। उन्होंने कोई ठोस आधार नहीं होने का हवाला देते हुए कोर्ट से रिवीजन को खारिज करने का आग्रह किया।

मामले में दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने फैसला सुनाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता ने संबंधित चेक, चेक रिटर्न मेमो, कानूनी नोटिस और एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध के सभी आवश्यक तत्वों को साबित कर दिया है। N.I. एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत कानूनी अनुमान शिकायतकर्ता के पक्ष में काम करते हैं। ट्रायल कोर्ट और अपीलीय कोर्ट द्वारा दर्ज की गई एक जैसी राय सबूतों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के उचित मूल्यांकन पर आधारित है।

उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले और आदेशों में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस कारण नहीं दिखता है और इस रिवीजन में कोई दम नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।

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