आपराधिक इतिहास छिपाना सरकारी बाबू को पड़ा भारी, पटना हाईकोर्ट ने खारिज की अग्रिम जमानत याचिका

पटना/सारण: बिहार के सारण जिले में आपराधिक इतिहास छिपाने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने सरकारी सेवक महिद्दीन मंसूरी को बड़ा झटका दिया है। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने आरोपी को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत के लिए आवेदन देने की छूट दी है।

Oct 12, 2026 - 15:38
आपराधिक इतिहास छिपाना सरकारी बाबू को पड़ा भारी, पटना हाईकोर्ट ने खारिज की अग्रिम जमानत याचिका

पटना/सारण: बिहार के सारण जिले में आपराधिक इतिहास छिपाने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने सरकारी सेवक महिद्दीन मंसूरी को बड़ा झटका दिया है। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार की अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने आरोपी को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत के लिए आवेदन देने की छूट दी है।

पूरा मामला सारण जिले के गौरा थाना कांड संख्या 54/2024 से जुड़ा है। वर्ष 2024 में भारतीय दंड संहिता की धारा 384 के तहत जबरन वसूली के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में महिद्दीन मंसूरी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए पटना हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की थी।

पहले मिली थी अग्रिम जमानत

मामले में आरोपी को 2 अप्रैल 2025 को हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिली थी। हालांकि, जमानत आदेश में स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि यदि आरोपी ने अपना कोई आपराधिक इतिहास छिपाया, तो निचली अदालत उसकी जमानत रद्द कर सकती है।

बाद में जांच के दौरान आरोपी के खिलाफ पहले से दर्ज तीन आपराधिक मामलों की जानकारी सामने आई। आरोप है कि जमानत याचिका में शिकायत वाद संख्या 2274/2021 का उल्लेख नहीं किया गया था। इसके बाद निचली अदालत ने जमानत बॉन्ड रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया।

नौकरी का हवाला भी नहीं आया काम

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिवक्ता ने दलील दी कि एक आपराधिक मामले का उल्लेख गलती और असावधानी के कारण छूट गया था, इसके पीछे कोई दुर्भावना नहीं थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी सरकारी सेवक है और जेल जाने की स्थिति में उसकी नौकरी प्रभावित हो सकती है।

वहीं, राज्य सरकार और सूचक की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने अग्रिम जमानत का विरोध किया। उनका तर्क था कि आरोपी पहले ही निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुका था और मुचलका भरकर रिहा हुआ था। ऐसे में वह कानून की दृष्टि से न्यायिक प्रक्रिया के नियंत्रण में था।

दो सप्ताह में सरेंडर करने का निर्देश

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत की कानूनी पात्रता पर विचार किया और आरोपी की याचिका खारिज कर दी।

हालांकि, अदालत ने आरोपी को दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत में आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत याचिका दाखिल करने की छूट दी। साथ ही निर्देश दिया कि आत्मसमर्पण के बाद नियमित जमानत आवेदन दाखिल किए जाने पर निचली अदालत उसी दिन उस पर विचार करे।

हाईकोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट है कि जमानत की शर्तों और आपराधिक इतिहास के खुलासे से जुड़े सवालों को अदालत गंभीरता से लेती है।

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