पिता के अंतिम संस्कार में भी नहीं आई तीनों बेटियां, वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखा और आश्रमवालों को कहा - अस्थियाँ गंगा में बहा दो

मुंबई में बड़े कपड़ा व्यापारी रहे शिवचरण रामरत्न गुप्ता (74 वर्षीय ) की हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में मौत हो गई। वे पिछले तीन साल से आश्रम में रह रहे थे। दो साल पहले उनकी पत्नी का भी इसी आश्रम में निधन हुआ था। मंगलवार को आश्रम प्रबंधन ने उनकी मौत की सूचना उनकी तीनों टीचर बेटियों को दी। हालांकि, तीनों ने दूरी और समय का हवाला देते हुए अंतिम संस्कार में आने से मना कर दिया।

Aug 6, 2026 - 18:05
पिता के अंतिम संस्कार में भी नहीं आई तीनों बेटियां, वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखा और आश्रमवालों को कहा - अस्थियाँ गंगा में बहा दो

एक समय में मुंबई के मशहूर कपड़ा व्यापारी रहे 74 वर्षीय शिवचरण रामरत्न गुप्ता का कल सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में निधन हो गया। 

उनकी तीन बेटियाँ हैं, लेकिन दुखद और हैरान करने वाली बात यह है कि उनकी अंतिम विदाई में तीनों में से कोई भी नहीं पहुँची।

शिवचरण रामरत्न गुप्ता और उनकी दिवंगत पत्नी ने अपनी तीनों बेटियों को पाल पोसकर पढ़ाया लिखाया और आत्मनिर्भर बनाया। तीनों बेटियां (अनिता, निशा और प्रिया) अच्छी तरह से व्यवस्थित हैं, जिनमें दो टीचर हैं। तीनों  अलग अलग जगहों नेपाल, उत्तर प्रदेश और मुंबई में रहती हैं। पत्नी के निधन के बाद शिवचरण रामरत्न गुप्ता वृद्धाश्रम में अकेले रहने लगे। बच्चों से संपर्क बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने पास सिर्फ एक मोबाइल फोन रखा था।

वृद्धाश्रम के प्रबंधक के अनुसार, करीब 20 दिन पहले ही तीनों बेटियों को उनके पिता की बिगड़ती तबीयत की जानकारी दे दी गई थी। लेकिन कोई उनसे मिलने नहीं आया। बीमारी बढ़ने के साथ बेटियों ने उनके फोन उठाना भी बंद कर दिया।

आखिरकार जब शिवचरण जी की मृत्यु हुई तो वृद्धाश्रम प्रबंधन ने बेटियों को फिर सूचना दी और यहां तक कहा कि यदि वे आना चाहें तो अंतिम संस्कार उनके आने तक रोक दिया जाएगा। लेकिन किसी भी बेटी ने आने की इच्छा नहीं जताई।

पिता को अंतिम विदाई देने के बजाय बड़ी बेटी ने ऑनलाइन ₹5,100 भेजकर अंतिम संस्कार का खर्च उठाने को कहा और अनुरोध किया कि अंतिम संस्कार का वीडियो कॉल के जरिए प्रसारण कर दिया जाए।

बेटियों ने पहले उनकी अस्थियां सुरक्षित रखने को कहा था, लेकिन बाद में यह कहकर कि उनके पास उन्हें लेने का "समय नहीं है", उन्होंने वृद्धाश्रम से ही अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने का अनुरोध कर दिया।

यह सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे समय के रिश्तों पर एक बेहद कड़वा सवाल है।

जिस पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने, पढ़ाने और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने में लगा दी, अगर जीवन के आखिरी पड़ाव पर उसकी बीमारी में कोई उसके पास न पहुँचे और मृत्यु के बाद अंतिम विदाई के लिए भी समय न निकले, तो मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उस पूरी जिंदगी का मतलब क्या था?

संपन्नता, आत्मनिर्भरता और आधुनिक जीवन की दौड़ में कहीं हम अपने सबसे जरूरी रिश्तों को तो पीछे नहीं छोड़ रहे?

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