सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: सरकारी अधिकारियों के खिलाफ FIR के लिए पहले से मंजूरी जरूरी नहीं, धारा 197 पर स्पष्ट की स्थिति
नई दिल्ली: सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामलों में FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने और जांच का आदेश देने के लिए धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी (Sanction) आवश्यक नहीं है। यह मंजूरी अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान (Cognizance) लेने के चरण में लागू होती है।
नई दिल्ली:- सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामलों में FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने और जांच का आदेश देने के लिए धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी (Sanction) आवश्यक नहीं है। यह मंजूरी अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान (Cognizance) लेने के चरण में लागू होती है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले पर विचार करते हुए यह स्पष्ट किया, जिसमें कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को धारा 197 के तहत पूर्व मंजूरी नहीं होने के आधार पर रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस कानूनी दृष्टिकोण को गलत ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 197(1) CrPC का संबंध अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान लेने से है। केवल FIR दर्ज करने या पुलिस जांच शुरू करने के लिए इस मंजूरी को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करना, पुलिस जांच और अदालत द्वारा संज्ञान लेना आपराधिक न्याय प्रक्रिया के अलग-अलग चरण हैं।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि एक व्यावसायिक विवाद के बाद उसे झूठे आपराधिक मामले में फंसाया गया, गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया और पुलिस अधिकारियों ने कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया। पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर उसने मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने और जांच का आदेश दिया था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Ashwini Kumar Upadhyay बनाम Union of India और State of Karnataka बनाम Pastor P. Raju जैसे पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया।
यह फैसला FIR दर्ज करने, पुलिस जांच और अदालत द्वारा संज्ञान लेने के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकारी अधिकारियों के खिलाफ हर मामले में अभियोजन के लिए मंजूरी की आवश्यकता समाप्त हो गई है। धारा 197 के तहत मंजूरी की जरूरत संज्ञान लेने के चरण में मामले की परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार तय होगी।
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