जीविका ने बदली महिलाओं की जिंदगी, खेतों में मजदूरी से लेकर डेयरी केंद्र और घर के कारोबार तक पहुंची आत्मनिर्भरता
बिहार में जीविका से जुड़कर ग्रामीण महिलाएं अब आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। पटना की कुसुम देवी और नालंदा की सुलेखा कुमारी इसका उदाहरण हैं। दोनों ने छोटे स्तर से शुरुआत की, लेकिन जीविका समूह के सहयोग, प्रशिक्षण और ऋण की मदद से अपने रोजगार को आगे बढ़ाया।
बिहार में जीविका से जुड़कर ग्रामीण महिलाएं अब आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। पटना की कुसुम देवी और नालंदा की सुलेखा कुमारी इसका उदाहरण हैं। दोनों ने छोटे स्तर से शुरुआत की, लेकिन जीविका समूह के सहयोग, प्रशिक्षण और ऋण की मदद से अपने रोजगार को आगे बढ़ाया।
पटना की कुसुम देवी वर्ष 2014 में जीविका समूह से जुड़ी थीं। इससे पहले वह खेतों में काम करती थीं। समूह के माध्यम से उन्होंने सिलाई का प्रशिक्षण लिया और 40 हजार रुपये का ऋण लेकर सिलाई मशीन खरीदी। सिलाई से होने वाली कमाई से उन्होंने परिवार के खर्च और बच्चों की पढ़ाई में सहयोग किया।
बाद में उन्हें सुधा केंद्र से जुड़ने का अवसर मिला। लॉटरी के माध्यम से केंद्र मिलने के बाद उन्हें फ्रीजर और डीप फ्रीजर सहित जरूरी सामान उपलब्ध कराया गया। अब वह केंद्र पर दूध, लस्सी, दही और आइसक्रीम बेचती हैं। कुसुम देवी के मुताबिक, सुधा केंद्र से उन्हें रोजाना करीब 1000 से 1500 रुपये तक की आमदनी हो रही है।
वहीं, नालंदा की सुलेखा कुमारी वर्ष 2024 में जीविका से जुड़ीं। उन्होंने घर से ही आटा, सत्तू, बेसन और मसाले तैयार करने का कारोबार शुरू किया। इस काम में उनका पूरा परिवार सहयोग करता है। पति कच्चा माल लाते हैं, जबकि परिवार के सदस्य मिलकर उत्पाद तैयार कर पैकिंग करते हैं।
सुलेखा कुमारी के उत्पाद अब पटना के अलावा बिहारशरीफ, नगरनौसा और चंडी तक पहुंच रहे हैं। इस कारोबार से उन्हें हर महीने करीब 25 हजार रुपये की आमदनी हो रही है। जीविका समूह से मिले ऋण को भी वह चुका चुकी हैं।
जीविका के जरिए प्रशिक्षण, बचत, ऋण और रोजगार के अवसरों ने इन महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत होने का रास्ता दिया है। कुसुम देवी की सिलाई मशीन से शुरू हुई यात्रा हो या सुलेखा कुमारी का घर से बाजार तक पहुंचा कारोबार, दोनों कहानियां बताती हैं कि मेहनत और सहयोग से छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव की वजह बन सकते हैं।
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