दुर्गा पूजा से छह दिन पहले मां की खोज में निकलते हैं आदिवासी, ‘मांगन’ की अनोखी परंपरा आज भी जीवित

दुर्गा पूजा से छह दिन पहले आदिवासी समुदाय में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसे ‘मांगन’ कहा जाता है। इस परंपरा के तहत आदिवासी युवक पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर मोर पंख सजाकर, ढोल-नगाड़ों और मांदल की थाप पर नाचते-गाते गांव-गांव घूमते हैं। संथाली गीतों के साथ मां दुर्गा की खोज में निकलने वाली यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। इस दौरान घर-घर से सहयोग राशि एकत्र की जाती है, जिससे सामूहिक रूप से मां महिषासुर मर्दिनी की पूजा-अर्चना की जाती है। यह परंपरा आदिवासी संस्कृति, आपसी एकता और सामुदायिक सौहार्द का प्रतीक है।

Oct 15, 2026 - 14:39
दुर्गा पूजा से छह दिन पहले मां की खोज में निकलते हैं आदिवासी, ‘मांगन’ की अनोखी परंपरा आज भी जीवित

दुर्गा पूजा शुरू होने से ठीक छह दिन पहले आदिवासी समुदाय में सदियों पुरानी ‘मांगन’ की परंपरा देखने को मिलती है। झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में इस परंपरा को आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।

इस परंपरा के तहत आदिवासी समुदाय के लोग पारंपरिक वेशभूषा धारण कर सिर पर मोर पंख सजाते हैं। इसके बाद ढोल-नगाड़ों और मांदल की थाप पर पारंपरिक नृत्य करते हुए गांव-गांव निकल पड़ते हैं। अलग-अलग समूहों में बंटकर लोग संथाली भाषा में पारंपरिक गीत गाते हैं और मां दुर्गा की खोज से जुड़ी इस अनूठी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, ‘मांगन’ की यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। नवरात्रि की चतुर्थी के अवसर पर, दुर्गा पूजा से छह दिन पहले, समुदाय के लोग घर-घर जाकर सहयोग राशि एकत्र करते हैं। इसके बाद गांव के ‘गट गौ माता’ मैदान में विभिन्न समुदायों के लोग एकत्रित होते हैं और मां महिषासुर मर्दिनी की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान सभी लोग मिल-जुलकर उत्सव मनाते हैं।

यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान, सामूहिक सहभागिता और सामाजिक एकता को भी दर्शाती है। आधुनिकता के दौर में भी इस परंपरा का जीवित रहना आदिवासी समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0