पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दो सरकारी डॉक्टरों की बर्खास्तगी रद्द, 3 महीने में बहाली का आदेश

पटना। पटना हाईकोर्ट ने बिहार स्वास्थ्य विभाग को बड़ा झटका देते हुए दो सरकारी चिकित्सा अधिकारियों की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि उचित विभागीय जांच और गवाहों से पूछताछ किए बिना केवल कागजी पत्राचार के आधार पर की गई एकतरफा कार्रवाई कानून की कसौटी पर टिकाऊ नहीं है।

Sep 16, 2026 - 20:07
Sep 16, 2026 - 20:43
पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: दो सरकारी डॉक्टरों की बर्खास्तगी रद्द, 3 महीने में बहाली का आदेश

पटना:- पटना हाईकोर्ट ने बिहार स्वास्थ्य विभाग को बड़ा झटका देते हुए दो सरकारी चिकित्सा अधिकारियों की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि उचित विभागीय जांच और गवाहों से पूछताछ किए बिना केवल कागजी पत्राचार के आधार पर की गई एकतरफा कार्रवाई कानून की कसौटी पर टिकाऊ नहीं है।

डॉ. ठाकुर अशोक कुमार प्रसाद और डॉ. मो. इशरत हुसैन की रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि लंबे समय तक अनधिकृत अनुपस्थिति के आरोप में बिहार सेवा संहिता के नियम 76 के तहत की गई बर्खास्तगी से पहले निर्धारित विभागीय प्रक्रिया का पालन जरूरी था।

दोनों बर्खास्तगी आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी डॉ. ठाकुर अशोक कुमार प्रसाद के संबंध में मेमो नंबर 166(9), दिनांक 09 फरवरी 2017 और डॉ. मो. इशरत हुसैन के संबंध में मेमो नंबर 1145(9), दिनांक 31 अक्टूबर 2016 को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने दोनों डॉक्टरों को सेवा में पुनः बहाल करने का निर्देश दिया है। आदेश के अनुसार, दोनों की बहाली तीन महीने के भीतर की जानी है।

गवाहों की जांच नहीं कराने पर कोर्ट ने जताई आपत्ति

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि विभागीय कार्रवाई में आरोपों को साबित करने के लिए किसी भी मौखिक गवाह का परीक्षण नहीं कराया गया। कोर्ट के अनुसार, यह बिहार सीसीए नियमावली के नियम 17(14) में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं था।

इसके अलावा, डॉक्टरों को कारण बताओ नोटिस की विधिवत तामील भी नहीं हुई थी। डाक विभाग की रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि संबंधित डॉक्टर सीवान में रहते हैं। इसके बावजूद उन्हें समुचित अवसर दिए बिना विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ाई गई और एकतरफा जांच रिपोर्ट तैयार कर दी गई।

जांच रिपोर्ट भी नहीं दी गई

कोर्ट ने यह भी पाया कि सजा देने से पहले डॉक्टरों को विभागीय जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई। हाईकोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत माना। कोर्ट के मुताबिक किसी कर्मचारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई से पहले उसे आरोपों और जांच के निष्कर्षों पर अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना जरूरी है।

BPSC की सलाह को भी किया गया नजरअंदाज

डॉ. ठाकुर अशोक कुमार प्रसाद के मामले में बिहार लोक सेवा आयोग की सलाह का भी मुद्दा सामने आया। कोर्ट के अनुसार, आयोग ने बर्खास्तगी की सजा पर असहमति जताई थी, लेकिन विभाग ने आयोग की राय को स्वीकार नहीं किया और अपने स्तर पर कार्रवाई आगे बढ़ाई।

तीन महीने में होगी बहाली

पटना हाईकोर्ट ने दोनों बर्खास्तगी आदेशों को रद्द करते हुए संबंधित अधिकारियों को तीन महीने के भीतर दोनों डॉक्टरों को सेवा में पुनः बहाल करने का निर्देश दिया है।

हालांकि, बर्खास्तगी की अवधि के दौरान मिलने वाले वेतन और उस अवधि को सेवा में किस प्रकार निर्धारित किया जाएगा, इसका फैसला सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार करेगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार चाहे तो नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए और दोनों डॉक्टरों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देकर मामले में नए सिरे से विभागीय कार्रवाई शुरू कर सकती है।

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