झारखंड की पंचायतों को 700 करोड़ रुपये का झटका, 15वें वित्त आयोग की राशि अटकी; अब 16वें आयोग से उम्मीद
झारखंड को 15वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों के लिए मिलने वाली करीब 700 करोड़ रुपये की राशि नहीं मिल सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, उपयोगिता प्रमाण पत्र और अनुदान हस्तांतरण प्रमाण पत्र समय पर जमा करने की प्रक्रिया में देरी के कारण फंड अटका। 31 मार्च 2026 को 15वें वित्त आयोग की अवधि समाप्त होने के बाद अब ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए 16वें वित्त आयोग के अनुदान पर नजर है। पुरानी बकाया राशि और नए अनुदान की प्रक्रिया अलग-अलग होगी।
रांची:-झारखंड में ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए मिलने वाली करीब 700 करोड़ रुपये की राशि का मामला एक बार फिर चर्चा में है। 15वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को मिलने वाली अंतिम किस्त की राशि राज्य को नहीं मिल सकी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) और अनुदान हस्तांतरण प्रमाण पत्र समय पर जमा करने की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण फंड जारी होने में बाधा आई। अब 15वें वित्त आयोग की अवधि समाप्त होने के बाद राज्य की नजर 16वें वित्त आयोग के तहत मिलने वाले अनुदान पर टिकी है।
इस राशि के नहीं मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी कई योजनाओं के वित्तपोषण पर असर पड़ने की आशंका है। पंचायत स्तर पर नाली निर्माण, पेयजल व्यवस्था, स्वच्छता, ग्रामीण सड़कों और स्ट्रीट लाइट जैसी जरूरतों को पूरा करने में वित्त आयोग के अनुदान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
करीब 700 करोड़ रुपये की राशि क्यों नहीं मिली?
बिजनेस झारखंड की 11 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड को 15वें वित्त आयोग की अंतिम अवधि में लगभग 700 करोड़ रुपये का अनुदान नहीं मिल सका। राज्य को अंतिम दो वर्षों में करीब 2,700 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद थी, जबकि लगभग 2,000 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले की राशि दिसंबर 2025 में मिलने के कारण मार्च की समयसीमा से पहले जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए सीमित समय बचा था। उपयोगिता प्रमाण पत्र और अनुदान हस्तांतरण प्रमाण पत्र समय पर जमा नहीं हो पाना फंड जारी नहीं होने की प्रमुख वजहों में शामिल रहा।
उपयोगिता प्रमाण पत्र यह बताता है कि किसी योजना के लिए मिली सरकारी राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के अनुसार किया गया है। केंद्र सरकार की अनुदान व्यवस्था में ऐसे प्रमाण पत्र वित्तीय जवाबदेही और अगली किस्त जारी करने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
पंचायतों के विकास कार्यों पर क्या पड़ेगा असर?
वित्त आयोग से मिलने वाली राशि का उपयोग ग्रामीण स्थानीय निकायों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में किया जाता है। पंचायतों में पेयजल, साफ-सफाई, जल निकासी, ग्रामीण आधारभूत संरचना और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े कार्यों के लिए यह राशि अहम होती है।
करीब 700 करोड़ रुपये की राशि नहीं मिलने से पहले से प्रस्तावित या लंबित योजनाओं के क्रियान्वयन पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, किन जिलों और पंचायतों की कौन-सी योजनाएं सीधे प्रभावित हुई हैं, इसका विस्तृत आधिकारिक ब्योरा उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं दिया गया है।
सरकार ने केंद्र से मांगी राशि
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग की ओर से लंबित राशि जारी करने के लिए केंद्र से संपर्क किया गया था। विभागीय अधिकारियों ने राशि जारी कराने के लिए प्रयास किए, लेकिन 15वें वित्त आयोग की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद मामले की स्थिति जटिल हो गई।
15वें वित्त आयोग की अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है। केंद्र सरकार ने ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 15वें वित्त आयोग की अवधि समाप्त होने के बाद लंबित राशि के संबंध में स्पष्ट किया है कि पुरानी अवधि के बकाया अनुदान स्वतः आगे जारी नहीं होंगे। ऐसे में झारखंड को 700 करोड़ रुपये की राशि मिलने के मामले में आगे की स्थिति केंद्र के निर्णय और लागू नियमों पर निर्भर करेगी।
अब 16वें वित्त आयोग से उम्मीद
वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक के लिए 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें लागू हैं। आयोग ने राज्यों के बीच केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों का कुल हिस्सा 41 प्रतिशत बनाए रखने की सिफारिश की है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के झारखंड बजट विश्लेषण के मुताबिक, इस अवधि में केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में झारखंड का हिस्सा 3.36 प्रतिशत निर्धारित है।
हालांकि, 16वें वित्त आयोग के तहत मिलने वाला नया अनुदान और 15वें वित्त आयोग की लंबित 700 करोड़ रुपये की राशि दो अलग-अलग वित्तीय मामले हैं। नए आयोग के तहत राशि मिलने का अर्थ यह नहीं है कि पुराने बकाये का भुगतान अपने आप हो जाएगा।
झारखंड के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पंचायतों की विकास योजनाओं के लिए नए अनुदान का आवंटन और हस्तांतरण समय पर कैसे सुनिश्चित किया जाए, ताकि वित्तीय प्रक्रियाओं में देरी का असर गांवों की बुनियादी सुविधाओं पर न पड़े।
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