सबसे बड़ा सवाल : 2024 से लागू 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024' में सिर्फ़ बदलाव कर क्या मोदी सरकार पेपर लीक को रोक पाएगी?

मोदी सरकार ने प्रवेश परीक्षाओं में हो रही अनियमितताओं की रोकथाम के लिए 5 फरवरी, 2024 को सार्वजनिक  परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 को लोकसभा में पेश किया गया था। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 21 जून 2024 से देश भर में यह कानून लागू हो चुका है, जिसके तहत कड़े दंड और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।  

Jul 24, 2026 - 17:29
Jul 24, 2026 - 17:47
सबसे बड़ा सवाल : 2024 से लागू 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024' में सिर्फ़ बदलाव कर  क्या मोदी सरकार पेपर लीक को रोक पाएगी?

देश में लगातार हो रहे प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक मामलों पर नकेल कसने के लिए एक बार फिर मोदी सरकार ने कड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई कैबिनेट बैठक में पेपर लीक संशोधन बिल को औपचारिक मंजूरी दे दी गई है। सूत्रों के अनुसार, इस नए और सख्त कानून के विधेयक को आगामी 27 जुलाई को संसद में पेश किया जा सकता है। गौरतलब है कि लगभग 2 वर्ष पहले भी मोदी सरकार ने प्रवेश परीक्षा में हो रहे भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सार्वजनिक  परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 लाई थी। 

अब जो सबसे गंभीर बात है वो हम आपको बताने जा रहे हैं। मीडिया की तमाम खबरों में आप सबको शायद ये नहीं बताया जा रहा है कि ठीक इसी तरह का बिल 2024 में लाया गया था, जो 21 जून 2024 से देश भर में लागू है। मोदी सरकार ने प्रवेश परीक्षाओं में हो रही अनियमितताओं की रोकथाम के लिए 5 फरवरी, 2024 को सार्वजनिक  परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 को लोकसभा में पेश किया गया था। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 21 जून 2024 से देश भर में यह कानून लागू हो चुका है, जिसके तहत कड़े दंड और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।  

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 2014 से 2024 तक 89 अलग-अलग मामले दर्ज किए गए थे, जिनसे इन परीक्षाओं में शामिल हुए कम से कम 6.5 करोड़ उम्मीदवार प्रभावित हुए थे। इन 89 मामलों में से अधिकांश में एफआईआर दर्ज की गई थी। इनमें से कम से कम 48 प्रश्नपत्रों की पुनः परीक्षा ली गई। 22 मामलों में परीक्षा आयोजित होने से पहले ही रद्द कर दी गई। और 18 मामलों में न तो परीक्षा रद्द की गई और न ही पुनः परीक्षा ली गई, बल्कि केवल एफआईआर दर्ज की गई। इनमें से अधिकांश मामले शिक्षण और पुलिस पदों की परीक्षाओं से संबंधित थे। जिसके बाद तत्कालीन मोदी सरकार ने पेपर लीक को रोकने के लिए सार्वजनिक  परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 को लागू किया।

6 फरवरी 2024 को PIB द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में :

डॉ. जितेंद्र सिंह कहते हैं कि यह विधेयक हमारे युवाओं की योग्यता और बच्चों के कल्याण की रक्षा के उद्देश्य से बनाया गया है। यह मामला राजनीति से परे है और सदन के सदस्यों के बीच कोई मतभेद नहीं है। डॉ. जितेंद्र सिंह कहते हैं, "इस विधेयक का उद्देश्य कुछ बेईमान तत्वों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है, जो हमारे युवाओं के भविष्य को बर्बाद कर देता है, उनके करियर और आकांक्षाओं को नष्ट कर देता है और कभी-कभी घातक आत्महत्याओं का कारण भी बनता है।" डॉ. जितेंद्र सिंह कहते हैं कि मोदी सरकार ने पिछले दस वर्षों में युवा-केंद्रित प्रावधान और योजनाएं शुरू की हैं, जैसे कि भर्ती और उच्च शिक्षा में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और समान अवसर प्रदान करना। डॉ. जितेंद्र सिंह कहते हैं, "हमारे 40 वर्ष तक के युवाओं का भविष्य दांव पर है, जो हमारी आबादी का 70% हिस्सा हैं और 2047 के विकसित भारत में हितधारक हैं।"

9 फ़रवरी 2024 को भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय ने एक विज्ञप्ति जारी किया था जिसमे लिखा था :-

केन्‍द्रीय राज्य मंत्री डीओपीटी प्रभारी डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने विधेयक के बारे में जानकारी देते हुए कहा, "सार्वजनिक परीक्षा विधेयक, जो संभवतः भारत की संसद के इतिहास में अपनी तरह का पहला विधेयक है, भारत के युवाओं को समर्पित है। "अनुचित साधन निवारण विधेयक, 2024" में संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे, बैंकिंग भर्ती परीक्षाएं और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी द्वारा आयोजित सभी कंप्यूटर-आधारित परीक्षाएं शामिल होंगी। लोकसभा विस्‍तृत चर्चा के बाद 6 फरवरी 2024 को इस विधेयक को पारित कर चुकी है। देश के युवाओं का इनसे संबंध है, जो देश की आबादी का 70 प्रतिशत हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के विकसित भारत के निर्माण में अगले दो दशकों में राष्ट्र निर्माण के लिए उनका योगदान अनिवार्य है। डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने कहा कि विधेयक अधिक पारदर्शिता और समयबद्ध चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करेगा और समान अवसर प्रदान करेगा।

यह कहते हुए कि यह विधेयक भारतीय संसद के इतिहास में अपनी तरह का पहला विधेयक है, डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने कहा था कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने युवाओं को हमेशा उच्च प्राथमिकता पर रखा है।

सबसे गंभीर विषय यह है कि सरकार के द्वारा पेपर लीक नहीं होने के दावे के साथ सार्वजनिक  परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 के लागू होने के बाद भी लगातार पेपर लीक होते रहे, जो आज छात्र आंदोलन के रूप में एक विकराल रूप ले चुका है। 

अब सवाल यह उठता है कि जिस समस्या के कारण सैकड़ों बच्चों की जानें गई, करोड़ों बच्चों का भविष्य प्रभावित हुआ, क्या सिर्फ़ क़ानून में बदलाव से समाधान हो जाएगा?  

भारत सरकार के इस भ्रष्टतंत्र का शिकार एक छात्र ने बताया कि :

यह बात सरकार भली भाँति जानती है कि इस विधेयक से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत है सिस्टम को बदलने की। सरकार सिर्फ युवाओं के आक्रोश को शांत करने के लिए विधेयक में बदलाव कर उन्हें एक दिलासा देने का प्रयास कर रही है। इस पेपर लीक को रोकने में विफल हुई सरकार सिर्फ अपनी विफलता को छुपाने के लिए इस विधेयक में संशोधन कर रही है। सिस्टम को बदलने की जगह भारत के युवाओं को विधेयक परिवर्तन का प्रलोभन दिया जा रहा है। लेकिन जिन छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है, सिर्फ़ वे ही सरकार की इस मंशा को भली भाँति समझ सकते हैं। अब शायद ही ये पीड़ित और भ्रष्टतंत्र में पिसे युवा सरकार के इस प्रलोभन में फँसें! देश के युवा अब इस सिस्टम को बदलने की देन लिए हैं, ताकि आने वाले समय में कोई छात्र खुदकुशी करने को मजबूर न हो।

 क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देने से पेपर लीक नहीं रुकेंगे। इसके लिए राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं के भीतर व्यापक ढांचागत सुधार करने होंगे, राजनीतिक हस्तक्षेप को पूरी तरह समाप्त करना होगा और परीक्षाओं को एक ही दिन कराने के बजाय प्रौद्योगिकी का उपयोग कर बहु-चरणों व यादृच्छिकीकरण (Randomization) के आधार पर सुरक्षित बनाना होगा।

कब, कहाँ और किसके शासनकाल में हुए पेपर लीक?

2014-2024 के बीच हुए कुल 89 पेपर लीक मामलों में से :

  • 21 मामले केंद्र की भाजपा सरकार के निगरानी में हुए। इसके अलावे 41 मामले राज्य सरकार की निगरानी से जुड़े हैं जहाँ उस दौरान भाजपा या एनडीए की सरकार थी।
  • 11 मामले कांग्रेस सरकार की निगरानी में हुए।
  • 03 उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार में।
  • 03 तेलंगाना में बीआरएस के शासनकाल में।
  • 02 महाराष्ट्र में उद्धव सरकार में।
  • 02 आंध्र प्रदेश में टीडीपी की सरकार में।
  • 02 बिहार में राजद, कांग्रेस और जेडीयू की सरकार में।
  • 01 पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार में।
  • 01 झारखंड में जेएमएम की सरकार में।
  • 01 केरल में सीपीएम की सरकार में।
  • 01 उड़ीसा में बीजेडी की सरकार में। 

संशोधित बिल में नया क्या है?  

10 साल तक की जेल और 10 करोड़ रुपए तक जुर्माना

नए प्रावधानों के तहत पेपर लीक के दोषियों को 10 साल तक की जेल और 10 करोड़ रुपए तक जुर्माना हो सकता है। संगठित पेपर लीक माफिया पर भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। साथ ही फास्ट-ट्रैक कोर्ट को ऐसे मामलों में तीन महीने के भीतर फैसला सुनाने की जिम्मेदारी दी जाएगी। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह सोमवार को यह विधेयक संसद में पेश कर सकते हैं। नए कानून का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाना है।

पीएम मोदी ने आधी रात को जारी किया वीडियो संदेश

इससे पहले गुरुवार आधी रात को ठीक 12 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर 2 मिनट 56 सेकंड का एक वीडियो संदेश जारी किया। इस संदेश के जरिए उन्होंने देश के छात्रों और उनके अभिभावकों को आश्वस्त किया कि सरकार पेपर लीक के मामलों में दोषियों के खिलाफ सबसे कड़ी सजा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक कोई सामान्य विषय नहीं है, बल्कि यह लाखों युवाओं और उनके परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने बताया कि पिछले ढाई महीनों के दौरान सरकार ने कई कड़े कदम उठाए हैं, जिसके तहत कई गुनहगारों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। छात्रों का शैक्षणिक वर्ष बर्बाद न हो, इसके लिए कम समय के भीतर 22 लाख से अधिक छात्रों की परीक्षा दोबारा आयोजित कराई गई और 19 जुलाई को इसका परिणाम भी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही, मामलों की जल्द सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन के निर्देश भी दिए गए हैं।

राहुल गांधी और विपक्षी दल इस्तीफे की माँग पर अड़े 

प्रधानमंत्री के इस वीडियो संदेश के बाद राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए पीएम के संदेश को "आधी रात का बेकार वीडियो" करार दिया। राहुल गांधी ने लिखा कि देश के छात्र केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। उन्होंने मांग की कि शिक्षा मंत्री को तुरंत उनके पद से हटाया जाए, छात्रों पर लाठीचार्ज करने वालों को सजा दी जाए और सरकार छात्रों से माफी मांगे।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी के खिलाफ सरकार यदि कोई सबसे सख्त और प्रभावी कार्रवाई कर सकती है, तो वह शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को उनके पद से हटाना है।

पेपर लीक और सीबीआई जांच का दायरा

यह पूरा विवाद मूल रूप से 3 मई को आयोजित हुए नीट यूजी (NEET UG) परीक्षा के पेपर लीक मामले से उपजा है। इस घटना के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले एक महीने से 'कॉकरोच जनता पार्टी' का प्रदर्शन जारी है। इसके अलावा, पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक द्वारा 26 दिनों का लंबा अनशन किया गया और संसद के भीतर भी इस मुद्दे पर लगातार हंगामा देखने को मिल रहा है।

वर्तमान में इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा की जा रही है। जांच का दायरा महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली समेत कई राज्यों तक फैला हुआ है। इस मामले में अब तक कुल 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और संभावना जताई जा रही है कि सीबीआई जल्द ही इस मामले में अपनी पहली चार्जशीट अदालत में दाखिल कर सकती है।

सार्वजनिक  परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 में क्या था?

  • सार्वजनिक  परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024 को 5 फरवरी, 2024 को लोकसभा में पेश किया गया था। 21 जून 2024 से देश भर में यह कानून लागू हो चुका है, जिसके तहत कड़े दंड और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इस विधेयक का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों के प्रयोग को रोकना है।   सार्वजनिक परीक्षाओं से तात्पर्य विधेयक की अनुसूची में निर्दिष्ट प्राधिकारियों द्वारा या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित प्राधिकारियों द्वारा आयोजित परीक्षाओं से है। इनमें शामिल हैं: यूपीएससी (UPSC), एसएससी (SSC), रेलवे, नीट (NEET), जेईई (JEE) और सीयूईटी (CUET) जैसी केंद्रीय भर्ती और प्रवेश परीक्षाएं।
  • सार्वजनिक परीक्षाओं से संबंधित अपराध:   विधेयक में सार्वजनिक परीक्षाओं से संबंधित कई अपराधों को परिभाषित किया गया है। यह किसी भी अनुचित साधन के उपयोग को सुविधाजनक बनाने के लिए मिलीभगत या षड्यंत्र को प्रतिबंधित करता है। अनुचित साधनों में निम्नलिखित शामिल हैं: प्रश्नपत्र लीक करना, उत्तर कुंजी (आंसर की) साझा करना, या परीक्षा के दौरान कंप्यूटर नेटवर्क से छेड़छाड़ करना। उपरोक्त अपराधों के लिए 3 से 5 साल की जेल और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। संगठित रूप से गड़बड़ी करने वालों के लिए 5 से 10 साल की जेल और कम से कम 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना।
  • सेवा प्रदाताओं की जिम्मेदारियां  : विधेयक के प्रावधानों के उल्लंघन की स्थिति में, सेवा प्रदाताओं को पुलिस और संबंधित परीक्षा प्राधिकरण को सूचित करना होगा। सेवा प्रदाता वह संगठन है जो सार्वजनिक परीक्षा प्राधिकरण को कंप्यूटर संसाधन या कोई अन्य सहायता प्रदान करता है। ऐसी घटनाओं की सूचना न देना अपराध होगा। यदि सेवा  प्रदाता स्वयं कोई अपराध करता है, तो परीक्षा प्राधिकरण को इसकी सूचना पुलिस को देनी होगी। विधेयक सेवा प्रदाताओं को परीक्षा प्राधिकरण की अनुमति के बिना परीक्षा केंद्र बदलने से रोकता है। सेवा प्रदाता द्वारा किए गए अपराध के लिए एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। परीक्षा की आनुपातिक लागत भी ऐसे सेवा प्रदाता से वसूल की जाएगी। इसके अलावा, उन्हें चार वर्षों के लिए सार्वजनिक परीक्षाएं आयोजित करने से भी प्रतिबंधित किया जाएगा।  
  • यदि यह सिद्ध हो जाता है कि सेवा प्रदाताओं से संबंधित अपराध किसी निदेशक, वरिष्ठ प्रबंधन या सेवा प्रदाताओं के प्रभारी व्यक्तियों की सहमति या मिलीभगत से किए गए थे, तो ऐसे व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे। उन्हें तीन से दस वर्ष तक के कारावास और एक करोड़ रुपये के जुर्माने की सजा दी जाएगी।
  • संगठित अपराध:   विधेयक में संगठित अपराधों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। संगठित अपराध को  सार्वजनिक परीक्षाओं से संबंधित अनुचित लाभ के लिए किसी साझा हित को आगे बढ़ाने हेतु किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा किए गए गैरकानूनी कृत्य के रूप में परिभाषित किया गया है। संगठित अपराध करने वाले व्यक्तियों को पांच से दस वर्ष तक की कैद और कम से कम एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। यदि कोई संस्था संगठित अपराध करने की दोषी पाई जाती है, तो उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी और परीक्षा की आनुपातिक लागत भी उससे वसूल की जाएगी।
  • जांच एवं छानबीन:   विधेयक के अंतर्गत सभी अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौता योग्य होंगे। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि अभियुक्त ने उचित सावधानी बरती थी, तो कोई भी कार्रवाई अपराध नहीं मानी जाएगी। उप पुलिस अधीक्षक या सहायक पुलिस आयुक्त से कम रैंक का अधिकारी इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की जांच करेगा। केंद्र सरकार जांच को किसी भी केंद्रीय जांच एजेंसी को हस्तांतरित कर सकती है।  

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