"राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त" जिनकी कविताओं ने जगाई थी देशप्रेम की अलख, आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार:- अनंत धीश अमन
गयाजी । साहित्य जगत के दद्दा, राष्ट्रकवि, पद्मभूषण विभूषित मैथिलीशरण गुप्त—जिनकी कल्पना निरंतर राष्ट्र के कल्याण में रमी रही, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समस्त मानव जाति के उत्थान का संदेश दिया। उनकी अमर पंक्तियाँ—
"नर हो, न निराश करो मन को।"
आज भी हर युग में मनुष्य को आशा, साहस और कर्म का मार्ग दिखाती हैं।
अद्भुत व्यक्तित्व के धनी, हिंदी साहित्य के अनमोल रत्न, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ऐसे दूरदर्शी साहित्यकार थे, जिनके विचारों को समय के थपेड़े कभी विचलित नहीं कर सके। जिन्होंने स्वयं समय के आईने को ही आईना दिखा दिया—
"हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी,
आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी।"
ऐसा चिंतन हर किसी के वश की बात नहीं। यह भारतभूमि का सौभाग्य है कि उसे ऐसा महापुरुष मिला, जिसने इसी धरती पर जन्म लेकर अपने जीवन और साहित्य से इसे और अधिक गौरवान्वित तथा उर्वर बनाया। स्वयं तपकर, संघर्षों की अग्नि में जलकर, उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश का मार्ग प्रशस्त किया।
राष्ट्रचेतना को यथार्थ का स्वर देने वाली उनकी रचनाएँ सदैव मानवता का कल्याण करती रहेंगी। उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों के मन में शांति, आत्मविश्वास, राष्ट्रप्रेम और सतत प्रगति की प्रेरणा जगाता रहेगा।