आखिर हम सब कब तलक मूक पशुओं पर क्रूरता करते रहेंगे ?
पालतू कुत्ते-बिल्ली हमारे घरों की रक्षा करते हैं। वहीं ये पशु खेती किसानी में किसी भी किसान से कम पसीना नहीं बहाते हैं।
साल दर साल मूक पशुओं के प्रति हमारी क्रूरता बढ़ती ही चली जा रही है। जबकि ये पशु हमारे साथ मिलकर कई कार्यों में सहयोगी होते हैं। ये ना दिन देखते हैं और ना रात देखते हैं। बस ! हमारी ही सेवा में लगे रहते हैं। बदले में ये पशु हमसे सिर्फ पेट भर भोजन ही मांगते हैं। कोई वेतन नहीं। पालतू कुत्ते-बिल्ली हमारे घरों की रक्षा करते हैं। वहीं ये पशु खेती किसानी में किसी भी किसान से कम पसीना नहीं बहाते हैं। हमारे सामानों को ये मिलों दूर दुर्गम पहाड़ियों तक ले जाते हैं और ले आते हैं। इसके बावजूद उनके प्रति जो संवेदना विश्व समाज की होनी चाहिए। नहीं है । यह बड़ा अहम सवाल है। आखिर ये मूक पशु अपने ऊपर हो रहे इस क्रूरता को खत्म करने के लिए किसके समक्ष फरियाद करें ? विश्व के सभी धर्मों का एक ही कथन है कि इस पृथ्वी में उत्पन्न सभी जीव - जंतु एक ही ईश्वर द्वारा निर्मित हैं ।ईश्वर कभी भी अपने द्वारा निर्मित जीव - जंतुओं के प्रति कोई भेदभाव नहीं करते हैं। उनका सबके प्रति समान प्रेम और स्नेह रहता है। हमारे धर्म ग्रंथो का भी कथन है कि ईश्वर द्वारा निर्मित सभी जीव जंतुओं में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ जीव है। तब जानवरों के प्रति मनुष्य की सर्वश्रेष्ठता कहां गुम हो जाती है ? इस सवाल पर विश्व समाज को गंभीरता पूर्वक विचार करने की जरूरत है।
आज मौजूदा समय में जानवरों की सुरक्षा सबसे बड़ा विषय बनकर रह गया है। जानवरों पर हुए शोध यह बताता है कि पिछले 40-50 सालों में जानवरों की स्थिति इतनी बद्तर हुई है कि जिसका अंदाजा लगाने से भी आत्मा कांप जाती है। इस संदर्भ में चिंता जनक बात यह है कि जानवरों में पिछले चालीस सालों के मध्य लगभग पचास प्रतिशत की कमी आयी है। सच्चाई यह है कि आज मनुष्य खुद जानवर बनता चला जा रहा है। जानवरों से अथाह प्रेम करने व उनकी सुरक्षा की मांग करने वाले फ्रांस के एनातोले ने कहा कि 'जब तक इंसान किसी जानवर से प्रेम नहीं करता, तब तक उसकी आत्मा का एक हिस्सा सोया हुआ होता है।' जानवर भी हमारे ही तरह एक प्राणी है। ये हमारे ही तरह सोचते हैं। विचारते हैं। हंसते हैं। खेलते हैं। प्रेम करते हैं। अपने स्वामी की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी तक लगा देते हैं। लेकिन उनके इस भाव को हम सब कभी समझने की कोशिश ही नहीं करते हैं। यह संपूर्ण मनुष्य जाति के समक्ष एक यक्ष सवाल है।
जानवरों पर हुए एक सर्वे रिपोर्ट की फाइंडिंग है कि प्रत्येक वर्ष विश्वभर में लगभग 56 अरब जानवरों की हत्या कर दी जाती है। चाहे वह धार्मिक उद्देश्य से हो या अन्य कारणों से। दुनिया भर में हर सेकेण्ड लगभग तीन हजार जानवरों की मृत्यु हो जाती है। मैं पूर्व में दर्ज कर चुका हूं कि इस सृष्टि के रचयिता ने सभी जीव जंतुओं को समान रूप से उत्पन्न और समान रूप से जीवन जीने का अवसर प्रदान किया है। परन्तु मनुष्य अपने स्वार्थ वश जानवरों की बलि चढ़ा देता है, जिसका प्रभाव समाज एवं पर्यावरण में सीधे तौर पर पड़ता दिखाई दे रहा है। भारत ही नहीं अपितु विश्व भर के जंगल उजड़ते चले जा रहे हैं। ऐसे में ये जानवर कहां रहेंगे ? वे किस तरह अपने भोजन की जुगाड़ करेंगे ? वहीं दूसरी ओर हम सब जंगल उजाड़ कर एक तरह से पृथ्वी पर से जानवरों का अस्तित्व ही मिटाने पर तुले हुए हैं। हम सबों को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि अगर पशुओं का अस्तित्व मिटेगा तो मानव जाति का भी अस्तित्व मिट जाएगा। अर्थात हम जिस डाली को काट रहे हैं, उसी डाली में बैठे हुए भी हैं। अगर डाली कट जाती है, तो हमारा भी जीवन खत्म हो जाएगा।
पशुओं पर हो रहे मनुष्य जाती द्वारा इस वैश्विक क्रूरता के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र ने 'पशु कल्याण पर एक सार्वभौम घोषणा' के नियम एवं निर्देशों के अधीन अनेक अभियानों की शुरुआत भी की है। नैतिकता की दृष्टि से, संयुक्त राष्ट्र ने अपने सार्वभौम घोषणा में पशुओं के दर्द और पीड़ा के सन्दर्भ में उन्हें संवेदनशील प्राणी के रूप में पहचान देने की बात की। इसका मूल उद्देश्य विलुप्त हुए प्राणियों की रक्षा करना और मानव से उनके संबंधों को मजबूत करना था। साथ ही पशुओं के कल्याण के प्रति आगे आने के लिए आग्रह किया गया है। पशु कल्याण का मूल उद्देश्य पशु कल्याण मानकों में सुधार करना और व्यक्तियों, समूह और संगठनों का समर्थन प्राप्त करना और जानवरों के प्रति प्यार प्रकट करना ताकि उनका जीवन सक्षम और बेहतर हो सके। आज विश्व भर के लोगों को जानवरों के प्रति प्यार प्रकट करना बहुत जरूरी हो गया है। जानवरों के प्रति प्रकट किये जाने वाले घृणास्पद व्यवहार, आवारा कुत्तों और बिलियों के प्रति व्यवहार, उनका अमानवीय व्यवहार आदि पर विचार कर सुधार करने की जरूरत है। इसके अलावा किसी प्राकृतिक आपदा के समय भी इन जानवरों के प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। जानवरों की सुरक्षा के प्रति पूरी तरह लापरवाही बरती जाती। इन आपदाओं में रेस्क्यू कर मनुष्य को बचा लिया जाता है, लेकिन जानवरों को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस मानक और अमानवीय व्यवहार को बदलने की जरूरत है।
पशु कल्याण के लिए अनेकों कानूनों और अधिनियमों की भी व्यवस्था की गयी है, जैसे- 'पशु क्रूरता अधिनियम 1835' जो कि विश्व में जानवरों के सन्दर्भ में प्रथम अधिनियम है, जिसकी स्थापना ब्रिटेन में की गयी थी। इसके पश्चात 'पशु संरक्षण अधिनियम 1911' प्रकाश में आया। जिसके परिणामस्वरूप जानवरों की रक्षा के लिए 'पशु कल्याण अधिनियम, 1966' नामक अमेरिकी राष्ट्रीय क़ानून प्रकाश में आया। भारत में पशुओं की सुरक्षा के लिए “जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम अधिनियम 1966 को लाया गया। यह वर्ष 1965 का समय था, जब ब्रिटेन सरकार ने जानवरों के कल्याण के लिए एक जांच अभियान शुरू किया था। इस अभियान के प्रमुख अन्वेषक प्रोफेसर रोजर ब्राम्बेल थे। यह अभियान रुथ हैरिसन की किताब 'एनिमल मशीन' में उठायी गयी चिंताओं ध्यान में रखते हुए शुरू किया गया था। इस किताब क प्रकाशन 1964 में किया गया था। इस सन्दर्भ में प्रोफेसर रोजर ब्राम्बेल नें अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के आधार पर ब्रिटेन की सरकार ने सन 1967 में 'एनिमल वेलफेयर एडवाइजरी समिति” की स्थापना की। बाद में यह समिति वर्ष 1979 'फार्म एनिमल वेलफेयर कौंसिल' में परिवर्तित हो गयी। इस समिति के प्रथम दिशा-निर्देशों के अनुसार यह कहा गया कि सर्वप्रथम जानवरों को सोने और खड़े होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। साथ ही उन्हें घुमाने और विचरण करने की भी स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसके अलावा भी इस समिति ने कुछ दिशा-निर्देशों को दिया जिसे फाइव फ्रीडम के नाम से भी जाना जाता है।
जानवरों के प्रति विश्व भर की सरकारें उनकी सुरक्षा के लिए सजग है। कड़े कानूनी प्रावधान भी हैं । इसके बावजूद मनुष्य द्वारा जानवरों के प्रति बरती जा रही क्रूरता नहीं हो रही है। भारत में हर प्रांतों की सरकारों द्वारा पशु कल्याण पखवाड़ा आयोजित किया जाता है। इस दौरान बांझ निवारण, पशु शल्य चिकित्सा शिविरों का आयोजन किया जाता है। शिविरों के दौरान पशु क्रूरता की रोकथाम एवं लाभान्वित पशु पालकों व जीव जन्तु कल्याण से संबंधित कार्यों की प्रगति की जानकारी भी उपलब्ध करायी जाती है। विभाग द्वारा ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं, गौशालाओं में चेतना शिविर, गोष्ठियों एवं पशु कल्याण जन जागृति रैलियों का आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम में जिला एवं ग्रामीण स्तर पर कार्यरत स्वयं सेवी संस्थाओं तथा गैर सरकारी संस्थाओं की भी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से जीव जन्तुओं के प्रति क्रूरता निवारण पर आधारित व्याख्यानों के माध्यम से जानकारी दी जाए तथा संबंधित विषय पर चित्रकला एवं वाद-विवाद प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाएं।
विश्व भर के लोगों को जानवरों के प्रति प्यार प्रकट करने के लिए सामने आना चाहिए। इसी भारत भूमि में हजारों - लाखों परिवार ऐसे हैं, जहां वे सबसे पहले जानवरों को कुछ खिलाते हैं, तभी कुछ खाते हैं। पशुओं की विभिन्न प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने और उनकी रक्षा कर हम सब खुद की ही रक्षा कर रहे होते हैं। वहीं हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि हम पशुओं पर क्रूरता करने से बचें। साथ ही पशुओं के कल्याण के सन्दर्भ विश्व पशु कल्याण पखवाड़ा का भी आयोजन करना है। ताकि उनके प्रति संवेदना स्थापित करने के साथ-साथ पशुओं की हत्या और क्रूरता पर रोक लगायी जा सके।
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