जीविका के 20 साल: गांव की चौखट से कारोबार तक, बदली बिहार की महिलाओं की पहचान

पटना: बिहार में जीविका के 20 साल पूरे हो गए हैं। दो दशक के इस सफर में स्वयं सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण महिलाओं को बचत, बैंकिंग, ऋण, प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया गया। जीविका से जुड़ी महिलाएं अब खेती और पशुपालन से लेकर सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण, छोटे कारोबार और निर्माण कार्य जैसे क्षेत्रों में भी अपनी भूमिका निभा रही हैं।

Oct 2, 2026 - 14:54
जीविका के 20 साल: गांव की चौखट से कारोबार तक, बदली बिहार की महिलाओं की पहचान

पटना: बिहार में जीविका के 20 साल पूरे हो गए हैं। दो दशक के इस सफर में स्वयं सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण महिलाओं को बचत, बैंकिंग, ऋण, प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया गया। जीविका से जुड़ी महिलाएं अब खेती और पशुपालन से लेकर सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण, छोटे कारोबार और निर्माण कार्य जैसे क्षेत्रों में भी अपनी भूमिका निभा रही हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में करीब 11.85 लाख स्वयं सहायता समूहों से लगभग 1.81 करोड़ परिवार जुड़े हैं। वहीं करीब 42 लाख महिला किसान आधुनिक कृषि तकनीकों से जुड़ी हैं। महिलाओं को खेती के साथ बाजार और कारोबार से जोड़ने के लिए 61 महिला किसान उत्पादक कंपनियां भी काम कर रही हैं।

जीविका के जरिए महिलाओं की आय बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। ‘लखपति दीदी’ अभियान के तहत महिलाओं को सालाना एक लाख रुपये या उससे अधिक की आय तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। कृषि, पशुपालन, सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण और छोटे कारोबार के जरिए महिलाएं अपनी आमदनी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। भागलपुर में 85 हजार से अधिक जीविका दीदियों के लखपति दीदी बनने की रिपोर्ट भी सामने आई है।

महिलाओं की भागीदारी अब उन क्षेत्रों में भी बढ़ी है, जिन्हें पारंपरिक रूप से पुरुषों से जोड़कर देखा जाता था। ‘रानी मिस्त्री’ के रूप में महिलाओं की भागीदारी इसका उदाहरण है। इससे महिलाओं के आर्थिक योगदान के साथ-साथ उनकी सामाजिक पहचान और आत्मविश्वास में भी बदलाव देखने को मिला है।

वित्तीय स्तर पर भी जीविका समूहों को बैंकों के माध्यम से 69 हजार करोड़ रुपये से अधिक का संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने का दावा किया गया है। इसकी करीब 99 प्रतिशत ऋण वापसी दर बताई गई है। इससे समूहों की बैंकिंग तक पहुंच और छोटे कारोबार के लिए पूंजी जुटाने के अवसर बढ़े हैं।

हालांकि, जीविका को लेकर राजनीतिक बहस भी जारी है। सरकार और जदयू नेता इसे ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जोड़ते हैं, जबकि विपक्ष की ओर से जीविका जैसे नेटवर्क के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगाए जाते रहे हैं। दूसरी ओर, जीविका से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि बचत, समूह आधारित ऋण, प्रशिक्षण और कारोबार के अवसरों ने उनकी आर्थिक स्थिति बदलने में मदद की है।

जीविका के 20 साल पूरे होने के बाद अब आगे की चुनौती ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें बेहतर बाजार, पूंजी और उद्यमिता के अवसर उपलब्ध कराना है। दो दशक में जीविका ने बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक भूमिका को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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