‘मंगला जुलूस’ से होगा ‘रामनवमी’ ‌महापर्व का आगाज

(2 अप्रैल, रामनवमी महापर्व का पहला मंगला जुलूस पर विशेष)

‘मंगला जुलूस’ से होगा ‘रामनवमी’ ‌महापर्व का आगाज

4 अप्रैल को हजारीबाग में रामनवमी पर्व का पहला मंगलवारी जुलूस निकाला जाएगा। रामनवमी महापर्व के पूर्व मंगला जुलूस से रामनवमी जुलूस की तैयारी बड़े जोर शोर से शुरू हो जाती है। इस वर्ष रामनवमी का पर्व 17 अप्रैल को है। 17 अप्रैल से शुरू होकर यह रामनवमी महापर्व लगातार 17, 18 और 19 अप्रैल को समाप्त होगा। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मोत्सव पर देशभर में रामनवमी पर्व बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। लेकिन झारखंड प्रांत की बात ही निराली। रामनवमी पर सभी जिलों से इस अवसर पर बहुत ही भव्य तरीके से शोभा यात्रा निकाली जाती है। इस प्रांत की एक विशेष खासियत यह है कि रामनवमी में राम भक्त हनुमान की विशेष रूप से पूजा अर्चना की जाती है । हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों का कथन है कि हनुमान जी का जन्म गुमला जिले के अंजनी ग्राम में हुआ था। एक मान्यता के अनुसार राम भक्त हनुमान की पूजा अर्चना के लिए मंगलवार का दिन विशेष शुभकारी बताया गया है। इसलिए हर मंगलवार को देशभर में हनुमान जी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। रामनवमी मंगला जुलूस का इतिहास बताता है कि हज़ारीबाग में रामनवमी से पूर्व निकलने वाला यह मंगला जुलूस इसी मान्यता को ध्यान में रखकर प्रारंभ किया गया था।

रामनवमी महापर्व से मंगला जुलूस का गौरवपूर्ण इतिहास जुड़ा हुआ है। इस मंगला जुलूस को रामनवमी महापर्व के आगाज के रूप में भी देखा जाता है। इस वर्ष रामनवमी महापर्व से पूर्व 2 अप्रैल को पहला मंगल जुलूस, 9 अप्रैल को दूसरा और 3 अप्रैल को तीसरा मंगला जुलूस निकाले जाएंगे। हजारीबाग के मंगला जुलूस  का इतिहास रामनवमी जुलूस से जुड़ा हुआ है । एक शोध के अनुसार मंगला जुलूस निकालने की परंपरा की शुरुआत देश की आजादी बाद 1949 – 5 0 के आसपास शुरू हुई थी। इस कालखंड तक रामनवमी का जुलूस पहुंचते पहुंचते हिंदू धर्मावलंबियों के बीच काफी लोकप्रिय हो चुका था। नगर और ग्रामीण क्षेत्र से हजारों हजार की संख्या में हिंदू धर्मावलंबी इस जुलूस में सम्मिलित होने लगे थे । मंगला जुलूस निकालने की परंपरा की शुरुआत पर चर्चा को आगे बढ़ाने से पूर्व रामनवमी जुलूस के गौरवमई इतिहास की चर्चा करना बेहद जरूरी हो जाता है । चूंकि रामनवमी जुलूस निकलने के लगभग इकतीस वर्षों बाद ही मंगला जुलूस निकालने की परंपरा की शुरुआत हो पाई थी । यह बात प्रचलित है कि मंगला जुलूस वृहद रामनवमी जुलूस के पूर्व की तैयारी की भूमिका होती है। रामनवमी जुलूस का विस्तार जैसे-जैसे बढ़ता गया । उसी रूप में रामनवमी की लोकप्रियता भी बढ़ती गई । बृहद रामनवमी जुलूस के अवसर पर बेहतर ढंग से शस्त्र प्रदर्शन, पंक्तिबद्ध, जुलूस पूरी तरह अनुशासन में रहे, इस निमित्त हर मंगलवार को जुलूस निकालने की परंपरा शुरू हुई थी।
मंगला जुलूस का इतिहास रामनवमी पर्व से जुड़ा हुआ है। इसलिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि हजारीबाग में रामनवमी की शुरुआत कैसे हुई ? इसकी कहानी बड़ी ही दिलचस्प है।  हर नगर वासियों को इस कहानी को जानना चाहिए ।

हजारीबाग जेपीएम मार्ग निवासी, स्वर्गीय गुरु सहाय ठाकुर ने 1918 में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मदिन (चैत्र नवमी)  पर  अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर पहला महावीरी झंडा का जुलूस निकाला था।  स्व० गुरु सहाय ठाकुर ने हाथ में महावीरी झंडा लेकर बाजे गाजे के साथ नगर के विभिन्न मंदिरों का परिक्रमा कर जुलूस का समापन किया था । इस जुलूस में शामिल उनके मित्रों ने बढ़ चढ़कर उन्हें सहयोग किया था।  तब शायद किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि यह जुलूस आने वाले समय में हजारीबाग की रामनवमी जुलूस के रूप में परिवर्तित हो जाएगा। जिसमें हजारों की संख्या में लोग सम्मिलित होंगे।
चैत्र रामनवमी के दिन  गुरु सहाय ठाकुर द्वारा निकाले गए जुलूस को जन-जन तक पहुंचाने में हजारीबाग नगर के राम नगीना सिंह, तिलकधारी राम, बसंती लाल जैन, राय योगेश्वर चौधरी, हरिहर प्रसाद, सरजू प्रसाद क्रौंच, हरिहर जायसवाल, बृजलाल जैन, हीरा लाल महाजन, टीबर गोप, कर्मवीर , कन्हैया गोप,घनश्याम कहार, पांचू गोप, महावीर मिस्त्री मूर्तिकार, गजाधर महाजन, कस्तूरी मल अग्रवाल जैसे सैकड़ों  जन ने महती भूमिका निभाई थी । बाद के कालखंड में जब मंगला जुलूस हजारीबाग में निकलना प्रारंभ हुआ था, तब उपरोक्त हिंदू धर्मानुरागियों ने बढ़ चढ़कर अपनी मां की भूमिका अदा की थी।

स्वर्गीय गुरु सहाय ठाकुर रामनवमी जुलूस बाद में मंदिर जुलूस के माध्यम से हिंदू समाज में जागृति लाना चाहते थे । वे हिंदुओं में एक संगठन पैदा करना चाहते थे । यह भी जानकारी मिली कि ब्रिटिश शासन काल में ईसाई धर्म प्रचार के क्रम में हजारीबाग सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के कई हिंदू परिवारों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कराया गया था। स्वर्गीय गुरु सहाय ठाकुर  इस महावीरी झंडा जुलूस और मंगला जुलूस के माध्यम से हिंदुओं के भीतर भगवान राम और हनुमान जी की भक्ति का अलख जगाना चाहते थे । स्वर्गीय गुरु सहाय ठाकुर सहित उनके साथियों को हिंदू धर्मावलंबियों के अन्य धर्म में परिवर्तित होने की बात कतई पसंद नहीं थी। वे इस महावीरी जुलूस और मंगला जुलूस  के माध्यम से गुरू सहाय ठाकुर धर्म परिवर्तन को रोकना चाहते थे। इसलिए उन्होंने हर हिंदू के घर में रामचरितमानस और हनुमान चालीसा रखने की बात भी बताई थी। वे समाज में व्याप्त जात पात, कुरीति,अंधविश्वास और अस्पृश्यता को जड़ से मिटा देना चाहते थे।  इस कालखंड में नगर और ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर हिंदू घरों मे शराब का सेवन हुआ करता था।  उन्होंने महावीर झंडे के माध्यम से घर-घर में होने वाले शराब के सेवन को बंद कराने का भी आह्वान किया था । फलत: समाज पर इसका बहुत ही व्यापक असर हुआ था ।  देश की आजादी के बाद जब पहला महावीर झंडा निकाला गया था, तब इसकी सूरत ही बदली हुई नजर आई  थी। देश की आजादी के बाद जुलूस के स्वरूप में कर्मवार विस्तार ही होता चला गया । हजारीबाग नगर में रामनवमी जुलूस हेतु कई छोटी-छोटी समितियों का निर्माण होना शुरु हो गया था।ग्रामीण क्षेत्रों में भी कई समितियों का निर्माण हुआ।  गुरु सहाय ठाकुर महावीर झंडा जुलूस के माध्यम से नगर एवं ग्रामीण क्षेत्र के कई स्थानों पर देवी मंडप एवं अन्य देवी-देवताओं के पूजा स्थलों की स्थापना में अपनी महती भूमिका निभाई थी । यह सब उन्होंने हिंदू धर्म के जागृति पैदा करने के लिए किया था।  आजादी के एक – दो वर्षों के बाद मंगला जुलूस का निकलना प्रारंभ हुआ था। तब आज की तरह मंगला जुलूस का यह स्वरूप नहीं था । मंगला जुलूस हजारीबाग नगर के विभिन्न समितियों द्वारा निकाले जाते थे, तब यह निश्चित हो जाता था कि  इतनी संख्या में रामनवमी जुलूस निकाले जाएंगे।  धीरे धीरे कर मंगला जुलूस के स्वरूप में भी विस्तार होता चला गया। यह मंगला जुलूस नगर के प्रमुख मंदिर राधा कृष्ण मंदिर, बड़ा अखाड़ा ठाकुरबाड़ी, खजांची तालाब मंदिर,  महावीर मंदि, कुमार टोली महावीर  आदि मंदिरों में  महावीरी लगोटा एवं प्रसाद चढ़ाकर,  भ्रमण कर शस्त्र परिचालन प्रदर्शन कर अर्धरात्रि तक समाप्त हो जाया करता है । यह परंपरा आज भी अनवरत जारी है । 
रामनवमी जुलूस के बढ़ते स्वरूप को ध्यान में रखकर हजारीबाग रामनवमी जुलूस के माननीय सदस्यों ने 1951 के आसपास श्री चैत्र रामनवमी महासमिति का गठन किया था । इस सभा में हीरालाल महाजन, भूरालाल खंडेलवाल, रामेश्वर गुप्ता, अटल बिहारी घोष, राम सिहासन साहू, विशेश्वर साहू, करम चंद लाल, दशरथ महतो, धनेश्वर लाल,मुनीम, नागेश्वर प्रसाद वकील, जगदीश प्रसाद वकील, सरजू वकील, राम बिहारी लाल वकील, कौलेश्वरी प्रसाद वकील, टीबर गोप,  कर्मवीर, घनश्याम कहार,पांचू गोप सहित काफी संख्या में लोग सम्मिलित हुए थे । अब चैत्र रामनवमी महासमिति एक केंद्रीय महासमिति के रूप में स्थापित हो गई थी । इस महासमिति का कार्य था कि रामनवमी से पूर्व निकलने वाले मंगला जुलूस और रामनवमी जुलूस को शांतिपूर्ण ढंग से गुजार देना था। ।  बाद के काल खंड  में इस महासमिति से स्वर्गीय दीपचंद जैन, स्वर्गीय काशी लाल अग्रवाल, स्वर्गीय सुरेश केसरी, स्वर्गीय के.डी . केसरी स्वर्गीय राजकुमार लाल, आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। यह सारे विभूतियां हर मंगला जुलूस और रामनवमी जुलूस में माथे पर पगड़ी बांधकर जुलूस का संचालन करते देखे जाते थे। आज भी उनकी चर्चा होती है। समय के साथ मंगला जुलूस का भी विस्तार होता गया। मंगला जुलूस भी एक तरह से मिनी रामनवमी का स्वरूप हथियार कर लिया है। वर्तमान समय में राजकुमार गोप, अमरदीप यादव, प्रमोद यादव, अजय गुप्ता, विधायक मनीष जायसवाल, मनीष गोप, राकेश गुप्ता, बटेश्वर प्रसाद मेहता, अशोक यादव, ललन गुप्ता, शशि भूषण केसरी, सुनील केसरी, विकास केसरी, मंजीत यादव, चंद्र प्रकाश जैन, महावीर चौरसिया, सहित कई प्रमुख लोग माथे पर केसरिया पगड़ी बांधकर मंगल जुलूस और रामनवमी जुलूस का संचालन करते देखे जाते हैं। चूंकि इस वर्ष के प्रारंभ में 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की मूर्ति विराजमान की गई है । इसलिए रामनवमी जुलूस से जुड़े सभी सदस्यों में उत्साह है । इस बार का मंगल जुलूस और रामनवमी का जुलूस अन्य वर्षों की तुलना में ज्यादा बेहतर ढंग से बनाया जाएगा। जिला प्रशासन, मंगल जुलूस और रामनवमी का जुलूस शांति प्रिय ढंग से बीते, इस निमित्त अपनी तैयारी में जुट गया हैं। वही हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एकता से जुड़े सभी समर्पित कार्यकर्ता गण मंगला जुलूस और रामनवमी जुलूस पर सांप्रदायिक सौहार्द बनी रहे, बैठकें प्रारंभ कर दी हैं।