नीम करौली बाबा कोई साधारण पुरुष नहीं बल्कि ईश्वरीय अवतार थे
नीम करौली बाबा का जन्म लगभग 1900 में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। लेकिन उनके जन्म की वास्तविक तिथि उपलब्ध नहीं है । बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में अपनी देह का त्याग दिया था।
बीसवीं सदी के महानतम संतों में एक नीम करौली बाबा का संपूर्ण जीवन मानव सेवा को समर्पित रहा था। उन्होंने जगत के समस्त जीव जंतुओं में विद्यमान ईश्वर तत्व को समझ कर ही आजीवन उन सबों के कष्टों को दूर करते रहे थे। वे दूसरों की पीड़ा खुद पर ले लेते थे। इस सदी के प्रारंभ से ही समाज में छल, प्रपंच, झूठ और फरेब आदि का बोलबाला चरम पर था। इस विषम परिस्थिति में नीम करौली बाबा का जन्म ईश्वरीय चेतना को जन-जन तक पहुंचाने के लिए हुआ था। वे राम भक्त हनुमान के अनन्य भक्त थे। उन्हें भक्त हनुमान पर गहरी आस्था थी। वे आजीवन भक्त हनुमान के उपासक ही बने रहे थे। वे एक आध्यात्मिक चिंतक थे। उनका मत था कि जगत के निर्माता एक ईश्वर हैं । वही जगत के सभी प्राणियों में भी निवास करते हैं। उन्होंने अपने प्रवचनों में कोई लंबा चौड़ा दार्शनिक दर्शन नहीं दिया बल्कि साधारण शब्दों में एक ईश्वर के प्रति आस्था का पाठ पढ़ाया। उन्होंने इस बात को सिद्ध किया कि जब जगत एक है, तब दो ईश्वर कैसे हो सकते हैं ?
बाबा का मूल मंत्र बहुत ही सरल है। सब एक हैं। इसलिए हमेशा सभी जीवों से प्रेम करो। सबकी सेवा करो। भगवान को याद करो । सच बोलो। आज की बदली सामाजिक और वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में उनके उपदेशों की सार्थकता और भी बढ़ गई है। बाहरी तौर पर हम सब सबसे प्रेम करने की बात जरूर करते हैं, वहीं दूसरी ओर एक दूसरे को मारने और काटने से चूकते नहीं हैं। बाबा बिल्कुल इसके खिलाफ थे। वे सहज,सरल और निर्मल मन से एक ईश्वर की भक्ति का उपदेश देते थे। उनके विषय में कई अलौकिक व विश्वसनीय कथाएं प्रचलित हैं कि उनमें हनुमान जी का अंश था। एक बार बाबा एक नाई से दाढ़ी बनवा रहे थे। तब उन्हें नाई से ज्ञात हुआ कि उनका बेटा घर से बाहर भाग कर चला गया था । वह नहीं आ रहा था। इससे नाई बहुत दुःखी था। बाबा उनकी पीड़ा को समझते हुए नाई से 12 आना पैसा लिए और कुछ मिनट के लिए बाहर चले गए तब। बाहर से आकर उन्होंने कहा कि जो तुम्हारा बेटा आ जाएगा । ठीक दो दिनों उनका बेटा घर आ गया। बाबा ने ही नाई के बेटे को बाहर आना रुपया दिए थे।
एक बार बाबा एक भक्त के यहां विश्राम कर रहे थे। उन्हें उक्त भक्त से जानकारी मिली कि उनका बेटा सरहद पर दुश्मनों से मुकाबला कर रहा था। उन्होंने बाबा से आग्रह किया कि मेरे बेटे की रक्षा करें। बाबा तत्क्षण अपने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया। कमरे में बाबा कई घंटे तक कराहते रहें थे। जबकि दूसरी ओर उनके बेटे को सरहद पर दुश्मनों की गोलियां छू भी नहीं पाईं थीं। वह सकुशल घर आकर यह बात अपने परिवार से बताई थी। अर्थात बाबा अपनी अलौकिक शक्ति से दुश्मनों की गोलियों को खुद झेल रहे थे । बाबा मिलने जुलने वाले हजारों लोगों का मत है कि बाबा कोई साधारण पुरुष नहीं बल्कि एक ईश्वरीय अवतार थे। बाबा के अनुयाई उन्हें हनुमान जी का अवतार मानते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब तक महाराजजी सत्रह वर्ष के थे, उनको इतनी छोटी सी आयु मे सारा ज्ञान था। बताते है, भगवान श्री हनुमान उनके गुरु हैं। उन्होंने भारत में कई स्थानों का दौरा किया और विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से जाने जाते थे। गंजम में मां तारा तारिणी शक्ति पीठ की यात्रा के दौरान स्थानीय लोग उन्हें हनुमानजी, चमत्कारी बाबा के नाम से संबोधित किया करते थे।
उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व दोनों बेमिसाल था। उन्होंने कोई नये मार्ग अथवा नए पंथ का बीजारोपण नहीं कर एक ईश्वर भक्ति का उपदेश सारे जगत को दिया था। पिछले दिनों बाबा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक फिल्म हनुमान अंश के नाम से रिलीज हुई। यह फिल्म देखते ही देखते दर्शकों की पहली पसंद बन गई है। साथ ही सुपर हिट भी हो गई है। यह फिल्म जिन-जिन सिनेमा गृह में लग रही है, उतरने का नाम ही नहीं ले रही है। इसका अर्थ यह है कि आज भी भारतीय जनमानस अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से दूर नहीं हुए हैं । उनकी जड़ें पूर्व की तरह पूजा - पाठ, भजन - कीर्तन, साधना और मानव सेवा से जुड़ी हुई हैं। बस जरूरत है, उन्हें जागृत करने की।
नीम करौली बाबा का जन्म लगभग 1900 में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। लेकिन उनके जन्म की वास्तविक तिथि उपलब्ध नहीं है । बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में अपनी देह का त्याग दिया था। अर्थात वे इस धरा पर मात्र 73 वर्षों तक ही रह पाए थे। उनका बचपन का नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। वे बहुत ही छोटी उम्र से हनुमान भक्ति किया करते थे। उन्हें हनुमान जी की मूर्ति के पास बैठना बहुत पसंद था। वे सदैव चिंता और फिक्र से मुक्त रहा करते थे। विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी सहजता और सरलता उसी रूप में बनी रहती थी। उनके चेहरे पर मुस्कान सदा बनी रहती थी। उनका यह स्वभाव जीवन के अंतिम क्षणों तक बना रहा था। मात्र 11 वर्ष की अल्प आयु में उनका विवाह कर दिया गया था । लेकिन उनका मन घर-गृहस्थी में नहीं लगा और वे अध्यात्म की ओर खिंचे चले गए। हालांकि पिता के अनुरोध पर वे वापस गृहस्थ जीवन में लौटे और उनके दो बेटे व एक बेटी हुई। बाद में उन्होंने वर्ष 1958 में पूरी तरह घर त्याग दिया। यात्रा उनके जीवन का एक अनुपम उपहार बन चुका था। वे सदैव यात्रा करते रहते थे। वे जहां जाते उनके भक्तों की भीड़ लग जाती थी। लोग बाबा के सानिध्य में बैठकर बहुत ही हल्का महसूस करते थे। जब तक वे सब बाबा के पास रहते, उनकी समस्त चिंताएं कहीं दूर चली जाती थी। बाबा का यह असाधारण व्यक्तित्व सबसे अलग और अनुपम था।
बाबा कभी भी अपने मुख से खुद की बड़ाई नहीं की। जब कभी कोई व्यक्ति उन्हें अपशब्द कह देता, तब भी उनके मुख पर प्रसन्नता उसी प्रकार बने रहती थी। इसके बावजूद बाबा उन्हें आशीर्वाद ही दिया करते थे। उन्हें कभी भी गुस्सा नहीं आता था। वे सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना करते थे। जरूरत पड़ने पर वे कम शब्दों में अपनी बात रख दिया करते थे। एक बार बाबा ट्रेन में बिना टिकट यात्रा कर रहे थे। फलस्वरूप टीटीआई ने उन्हें नीम करली नामक एक छोटे से स्टेशन पर उतार दिया। बाबा उसी स्टेशन पर एक कोने में बैठ गए और हनुमान की भक्ति में लीन हो गए। उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया, इसका कोई मलाल का भाव उनके चेहरे पर नहीं था। जिस प्रकार वे ट्रेन में प्रसन्न थे, उसी प्रकार स्टेशन पर भी प्रसन्न दिख रहे थे। बाबा के ट्रेन से उतरने के बाद रेलगाड़ी आगे बढ़ने से मना कर दिया । जबकि ट्रेन को आगे बढ़ाने की दिशा में चालक ने पूरी कोशिश कर ली लेकिन रेलगाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। चालक दल, ट्रेन में मौजूद सभी टीटीआई और यात्री गण परेशान हो रहे थे कि आखिर रेलगाड़ी आगे क्यों नहीं बढ़ रही है। तब स्थानीय अधिकारियों और यात्रियों को बाबा नीम करौली की ओर गया। वे सभी यह सोचने के लिए मजबूर हो गए कि बाबा को ट्रेन से उतारने के कारण ही रेलगाड़ी आगे नहीं बढ़ रही है । सबों बाबा की महानता का आभास हुआ। उसके बाद ट्रेन अधिकारियों ने बाबा से माफी मांगी और उन्हें सम्मान के साथ ट्रेन में बैठाया, जिसके बाद ही ट्रेन रवाना हुई। इसी घटना के बाद उन्हें नीम करोली बाबा कहा जाने लगा।
उत्तराखंड के नैनीताल के पास स्थित कैंची धाम आश्रम उनकी प्रमुख साधना स्थली रही है, जिसकी स्थापना उन्होंने 1964 में की थी। यहां हर साल 15 जून को बड़ा मेला और स्थापना दिवस मनाया जाता है। उनके भक्तों में केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स, फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग और हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट्स जैसी कई वैश्विक हस्तियां भी शामिल रहीं। बाबा के उल्लेखनीय शिष्यों में आध्यात्मिक शिक्षक राम दास, आध्यात्मिक शिक्षक भगवान दास, लेखक और ध्यान शिक्षक लामा सूर्य दास और संगीतकार जय उत्तल और कृष्ण दास,मानवतावादी और आध्यात्मिक कार्यकर्ता राहुल वर्मा, मानवतावादी लैरी ब्रिलियंट और उनकी पत्नी गिरिजा, दादा मुखर्जी, विद्वान और लेखक यवेटे रोसेर, अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक मा जया सती भगवती, फिल्म निर्माता जॉन बुश और डैनियल गोले मैन लेखक शामिल हैं।
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