'रतन वर्मा और उनका साहित्य' नये रचनाकारों के लिए एक उत्तम कृति
रतन वर्मा एक बहुत ही सूझबूझ वाले व संदेशात्मक नाटककर के रूप में भी अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं।
कथाकर डॉ.विकास कुमार के संपादन में प्रकाशित एक नई पुस्तक 'रतन वर्मा और उनका साहित्य' प्रकाशन के साथ ही चर्चा में आ गई है। यह पुस्तक नए रचनाकरों के लिए एक उत्तम कृति के रूप में देखी जा रही है। इसके साथ ही हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में गतिशील उन तामम रचनाकरों के लिए भी यह कृति एक महत्वपूर्ण साबित हो रही है। पुस्तक के संपादक डॉ.विकास कुमार ने रतन वर्मा के पांच दशकों की रचनाशीलता पर एक तरह से उन्हें इस कृति के माध्यम से लाइफटाइम अवॉर्ड देने जैसा कार्य किया है। विकास कुमार ने न सिर्फ रतन वर्मा के साहित्य पक्ष को ही ऊजागर किया है बल्कि साहित्य से जुड़ उनके उन तामम पक्षों को भी रखा है, जिसका साहित्य से गहरा संबंध है।
विकास कुमार ने यह बताने की कोशिश की है कि रतन वर्मा एक बहुत ही सूझबूझ वाले व संदेशात्मक नाटककर के रूप में भी अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं। उनके कई नाटकों का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों से मंचन हो चुके हैं। इसके साथ ही उन्होंने दर्ज किया है कि रतन वर्मा जितने अच्छे साहित्यकर हैं, उतने ही अच्छे एक इंसान भी हैं। वे हमेशा अपने मित्रों के सुख दुख में साथ खड़े रहते हैं। नए रचनाकरों के लिए रतन वर्मा एक गुरु के रूप में अपनी भूमिका अदा करते रह रहे हैं। उनकी अब तक की साहित्यिक यात्रा में रतन वर्मा जी का भरपूर स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहा है । आशा है कि यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक बेमिसाल कृति साबित होगी। हिंदी के शोधार्थियों को इस पुस्तक से बहुत कुछ सीखने,समझने और लिखने के लिए सामग्रियां मिल पाएगी।
विकास कुमार ने अपने संपादकीय पृष्ठ पर दर्ज किया है कि जब मैं इंटर का छात्र था, तब से आज तक, जब कभी भी सुबह के ग्यारह बजे से पहले मैं रतन वर्मा से उनसे मिलने घर पहुंचा, हमेशा उन्हें पलंग पर ही पालथी मार कर कागज पर कलम साधे, साहित्य की साधना में लीन पाता। उक्त छोटे से वाक्य के माध्यम से संपादक ने एक बड़ी बात कहने की कोशिश की है कि हर रचनाकर को अपने रचना कर्म के लिए समयबद्ध होकर कार्य करना चाहिए। आगे उन्होंने दर्ज किया है कि रतन वर्मा एक जाने माने कथाकर ऐसे ही नहीं बने हैं। उन्हें एक लंबे संघर्ष से गुजरना पड़ा है। उन्हें अपनी जन्म भूमि तक का भी त्याग करना पड़ा था। तब जाकर उनका रचना संसार विस्तृत बन पाया। इतना कुछ लिखने और छपने के बावजूद रतन वर्मा खुद को एक नए रचनाकर के रूप में ही मानते हैं। वे एक नए रचनाकर की तरह ही अन्य रचनाकरों से कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। यह बात उन्हें अन्य रचनाकरों से एक अलग स्थान प्रदान करता है। रतन वर्मा, अपनी जन्म भूमि मुजफ्फरपुर से निकलकर हजारीबाग को अपनी रचनाशीलता की कर्म भूमि बनाकर जो साहित्य सृजन किया है, अपने आप में बेमिसल है । उनका सादगी पूर्ण जीवन, साकारात्मक सोच, अनुशासन और समयबद्ध लेखन ही उन्हें एक सफल लेखक बनाया। उनका अब तक का संपूर्ण जीवन सृजन और नए रचनाकरों को सीख देने में समर्पित रह रहा है।
विकास कुमार ने 'रतन वर्मा और उनका साहित्य' पुस्तक में अठारह रचनाकरों की रचनाओं को स्थान दिया है। पहली रचना के रूप में डॉ.विकास कुमार ने अपने संपादकीय में उनके लेखकीय जीवन संघर्ष पर बहुत ही शानदार तरीके से अपनी बातों को रखा है। उन्होंने दर्ज किया है कि कथाकर, उपन्यासकर रतन वर्मा को समग्राता से समझ पाने के लिए यह पुस्तक पूर्णतः सहायक की भूमिका का निर्वहन करेेगी। इस पुस्तक का दूसरा आलेख 'रतन वर्मा का जीवन और रचना संसार' दर्ज है। इस रचना के लेखक दीपाक कुमार साहू हैं। उन्होंने रतन वर्मा के जीवन संघर्ष और रचना संसार पर बहुत ही विस्तृत रूप से चर्चा की है। उन्होंने दर्ज किया है की रतन वर्मा जी का जीवन पूरी तरह संघर्षों के बीच व्यतित हुआ। जब रतन वर्मा एक वर्ष के शैशवावस्था में थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था । वे एक रचनाकर कैसे बने ? जबकि उन्हें कुछ और बनना था। लेकिन परिस्थितियां और अंदर का साहितयिक मन उन्हें एक साहित्यकर के रूप में निर्मित किया । आगे उन्होंने दर्ज किया है कि वर्मा जी ने लगभग दो सौ कहानियां लिखीं, जिनमें से प्रत्येक समाज के किसी न किसी याथर्थ को सामने रखने का सफल प्रयास है। इसके साथ ही वे एक सफल उपन्यासकर भी हैं। रतन वर्मा को कई राष्ट्रीय पुरास्कारों से भी सम्मानित किया गया है। आगे दीपक जी ने दर्ज किया है कि रतन वर्मा मूलतः मनुष्य के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को साकार रूप देने वाले कथाकर हैं। जब वे अपने पात्रों के भीतर प्रवेश करते हैं, तब ऐसा महसूस होता है, जैसे वे उनके भीतर से खोज कर उन तामम पक्षों को निकाल पाने की चेष्टा सलंग्न हो, जो ऊपरी तौर पर पात्रों को देखने से कतई प्रतित नहीं होता ।
रंगकर्मी मनोज सिंहा ने एक बहुत ही शनदार आलेख रतन वर्मा पर 'हजारीबाग रंगमंच : नेपथ्य के प्रेरणा स्रोत' शीर्षक से दर्ज किया है। यहां यह लिखना जरूरी हो जता है की मनोज सिन्हा एक रंगकर्मी,अभिनेता के कथाकर और कवि भी हैं। उन्होंने कई नाटकों में खुद मंचन किया है। वे इस आलेख में यह बताने में पूरी तरह सफल रहे हैं कि रतन वर्मा रंगमंच के नेपथ्य के प्रेरणा स्रोत कैसे रहे हैं। इसके अलावा इस पुस्तक में 'हिंदी साहित्य जगत के प्राख्यात कथाकर : रतन वर्मा' शीर्षक से कामेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव निरंकुश का एक शानदार आलेख प्रकाशित है । वहीं डॉ.सुबोध सिंह शिवगीत ने 'लोक कला की त्रासद स्थिति का जीवंत दस्तावेज : नेटुआ करम बड़ा दुखदाई' शीर्षक एक बहुत ही महत्वपूर्ण आलेख दर्ज है। लेखिका गुलांचो कुमारी ने 'रतन वर्मा और उनका कथा संग्रह 'बबूल' पर खास चर्चा की है । आलोचक डॉ.बलदेव पांडेय ने 'चांदनी रात गजल : रतनार आंखों के गुलाबी ख्वाब' शीर्षक से अपनी बातों को रखा है। लेखक हितनाथ झा ने 'विवशता और जीजीविषा के अन्रद्वंद की यात्रा कथा' के माध्यम से बहुत बड़ी बात कहने की कोशिश की है । कवि डॉ.सुबोध सिंह शिवगीत ने 'घने अंधेरे के बीच रोशनी की उम्मीद' शीर्षक के माध्यम से रतन वर्मा को रोशनी की उपाधि से अलंकृत किया है । कवि डॉ.विनोद कुमार राज विद्रोही ने 'संवेदना के तारों को झंकृत करती है रतन की कहानियां'शीर्षक के माध्यम से उन्होंने उनकी कहानियों पर बहुत ही सार्थक विश्लेषण किया है । कथाकर डॉ.सुबोध सिंह शिवगीत ने 'दलित चेतना के उभार का दस्तावेज : रसरंग अंगना' शीर्षक के माध्यम से रसरंग अंगना उपन्यास पर बहुत ही सारगर्भित विवेचना। 'सामाजिक याथर्थ की कसौटी पर रतन वर्मा की कहानियां' शीर्षक के माध्यम से दीपाक कुमार साहु ने बहुत सूक्ष्म रूप से विवेचना की है। कथाकर डॉ.विकास कुमार ने 'पेइंग गेस्ट : मनोवैज्ञानिक चिंतन से लवरेज कथा संग्रह' शीर्षक के माध्यम से बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से अपनी बातों को रखा है। कवि प्राणेश कुमार अब वे इस दुनिया में नहीं रहें। उन्होंने अपने मित्र 'सपनों के शहर में रतन वर्मा' शीर्षक से एक बहुत ही मर्म स्पर्शी आलेख दर्ज किया है। डॉ.विकास कुमार ने 'रतन वर्मा की पारखी दृष्टि और मैं' शीर्षक के माध्यम से उन्होंने रतन वर्मा के साथ अपने संबंधों को ऊजागर करने का प्रयास किया है । वहीं विजय केसरी द्वारा दर्ज 'सत्ता की राजनीति और वैचारिक प्रतिबद्धता दोनों की धरातल अलग-अलग है - रतन वर्मा' शीर्षक से एक लंबा इंटरव्यू दर्ज है । इस इंटरव्यू में संपूर्णता में रतन वर्मा के अभी तक के संघर्ष और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है । अरुण अभिषेक द्वारा लिखित 'आलोचकओं की नजर तो रचनाकारों पर पड़ती है,रचना पर नहीं' शीर्षक के माध्यम से उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण आलेख दर्ज किया है। डॉ.प्रामोद कुमार ने 'नेटुआ में अभिनय का जादू बिखेरेंगे मनोज बाजपाई' शीर्षक के माध्यम से उन्होंने उनका एक बहुत ही शानदार भेंटवार्ता दर्ज किया है। इस पुस्तक को प्रयागराज, उत्तर प्रदेश की एक ख्याती प्राप्त प्रकाशन रूद्रादित्य प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।
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